बिना मंजूरी स्टेम सेल थेरेपी पर चलेगा सरकार का चाबुक: स्वास्थ्य मंत्रालय आया एक्शन में, क्लीनिकों पर होगी सख्त कानूनी कार्रवाई

बिना मंजूरी स्टेम सेल थेरेपी पर चलेगा सरकार का चाबुक: स्वास्थ्य मंत्रालय आया एक्शन में, क्लीनिकों पर होगी सख्त कानूनी कार्रवाई

देश भर में असाध्य और गंभीर बीमारियों के नाम पर चल रहे अवैध 'स्टेम सेल थेरेपी' (Stem Cell Therapy) के फर्जीवाड़े को रोकने के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय पूरी तरह एक्शन मोड में आ गया है। ऑटिज्म, सेरेब्रल पाल्सी, मस्कुलर डिस्ट्रॉफी, पार्किंसंस, अल्जाइमर और रीढ़ की हड्डी की चोट जैसी जटिल समस्याओं का स्टेम सेल से 'जादुई और शत-प्रतिशत इलाज' का दावा करने वाले निजी क्लीनिकों और अस्पतालों के खिलाफ सरकार ने व्यापक अभियान शुरू करने का फैसला किया है। स्वास्थ्य मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि वर्तमान चिकित्सा विज्ञान और भारतीय औषधि महानियंत्रक (DCGI) के नियमों के अनुसार केवल कुछ विशिष्ट रक्त विकारों (जैसे ल्यूकेमिया या थैलेसीमिया में बोन मैरो ट्रांसप्लांट) को छोड़कर अन्य किसी भी बीमारी के लिए स्टेम सेल थेरेपी को व्यावसायिक उपचार के रूप में मंजूरी नहीं दी गई है। इसके बावजूद मरीजों से लाखों रुपये ऐंठने वाले क्लीनिकों और चिकित्सकों पर अब औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम तथा राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) की आचार संहिता के तहत सख्त आपराधिक और दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी।

क्लिनिकल ट्रायल और व्यावसायिक इलाज के बीच का अंतर समझना जरूरी

चिकित्सा विशेषज्ञों और स्वास्थ्य मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, देश में अधिकांश बीमारियों के लिए स्टेम सेल पर केवल शोध और क्लिनिकल ट्रायल (Clinical Trials) की अनुमति है, न कि नियमित क्लिनिकल प्रैक्टिस की। किसी भी नई थेरेपी को अस्पताल में मरीजों पर आजमाने से पहले भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) की 'नेशनल गाइडलाइंस फॉर स्टेम सेल रिसर्च' और केंद्रीय नियामक संस्थाओं से बहुस्तरीय वैज्ञानिक मंजूरी लेनी अनिवार्य होती है। हालांकि, कई निजी केंद्र क्लिनिकल ट्रायल की आड़ लेकर या अंतरराष्ट्रीय मानकों को तोड़-मरोड़ कर मरीजों को यह विश्वास दिला देते हैं कि यह एक स्थापित और प्रमाणित इलाज है। इस धोखे के चलते असहाय मरीज और उनके परिजन अपनी जीवनभर की जमा-पूंजी इन फर्जी पैकेजों पर लुटा देते हैं, जबकि वैज्ञानिक रूप से इन दावों का कोई ठोस आधार नहीं होता।

मरीजों की जान से खिलवाड़: गंभीर साइड इफेक्ट्स और ट्यूमर का खतरा

स्वास्थ्य मंत्रालय की यह सख्ती केवल वित्तीय ठगी को रोकने के लिए नहीं, बल्कि मरीजों की जान बचाने के लिहाज से भी अत्यंत संवेदनशील है। अप्रमाणित और अनियंत्रित प्रयोगशालाओं में तैयार किए गए स्टेम सेल्स को जब सीधे मरीजों की नसों, रीढ़ या मस्तिष्क में इंजेक्ट किया जाता है, तो इसके बेहद घातक परिणाम सामने आते हैं। अंतरराष्ट्रीय शोधों में यह साबित हो चुका है कि अमान्य स्टेम सेल इंजेक्शन से शरीर के भीतर अनियंत्रित कोशिका विभाजन शुरू हो सकता है, जिससे खतरनाक ट्यूमर (Teratoma) बनने का जोखिम रहता है। इसके अलावा, मरीजों में गंभीर बैक्टीरियल संक्रमण, रीढ़ की हड्डी में सूजन, स्ट्रोक और एलर्जी के कारण अचानक मौत के मामले भी दर्ज किए गए हैं। बच्चों में ऑटिज्म जैसी न्यूरोलॉजिकल स्थितियों में स्टेम सेल का अनैतिक इस्तेमाल उनके दिमागी संतुलन को सुधारने के बजाय और अधिक बिगाड़ देता है।

भ्रामक विज्ञापनों और सोशल मीडिया प्रचार पर डिजिटल निगरानी

स्वास्थ्य मंत्रालय ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के स्वास्थ्य विभागों तथा औषधि नियंत्रकों को निर्देश दिए हैं कि वे अपने-अपने अधिकार क्षेत्रों में चल रहे वेलनेस सेंटर्स, रीजेनेरेटिव मेडिसिन क्लीनिकों और कॉस्मेटिक सेंटरों की औचक जांच करें। इसके साथ ही, इंटरनेट और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर चलने वाले भ्रामक विज्ञापनों (Misleading Advertisements) पर भी कड़ा पहरा बैठाया गया है। क्लीनिक संचालक अक्सर यूट्यूब, इंस्टाग्राम और फेसबुक पर 'चमत्कारी सुधार' के झूठे टेस्टिमोनियल वीडियो डालकर गरीब व मध्यमवर्गीय परिवारों को लुभाते हैं। मंत्रालय ने कंज्यूमर प्रोटेक्शन अथॉरिटी (CCPA) के साथ मिलकर ऐसे विज्ञापनों को तत्काल हटाने और संबंधित डॉक्टरों के मेडिकल लाइसेंस निरस्त करने की रूपरेखा बनाई है। दोषी पाए जाने वाले क्लीनिकों को सील करने के साथ-साथ उनके संचालकों पर गैर-जमानती धाराओं में मुकदमा दर्ज कराया जाएगा।

मरीजों और परिजनों के लिए सरकारी दिशानिर्देश

स्वास्थ्य विभाग ने आम जनता से भी अपील की है कि वे किसी भी लुभावने और असत्यापित दावे के जाल में न फंसें। यदि कोई डॉक्टर या संस्थान किसी लाइलाज बीमारी को स्टेम सेल इंजेक्शन से पूरी तरह ठीक करने की गारंटी देता है और इसके बदले मोटी रकम की मांग करता है, तो तुरंत सतर्क हो जाएं। इलाज शुरू कराने से पहले यह जरूर जांच लें कि क्या उस प्रक्रिया को डीसीजीआई या आईसीएमआर से औपचारिक स्वीकृति प्राप्त है या नहीं। सरकार ने नागरिकों को यह अधिकार दिया है कि वे ऐसे किसी भी संदिग्ध क्लीनिक की शिकायत राष्ट्रीय स्वास्थ्य पोर्टल या राज्य मेडिकल काउंसिल में सीधे दर्ज करा सकते हैं। सरकार का यह कड़ा रुख देश में बायोमेडिकल एथिक्स को मजबूत करने और मरीजों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ साबित होगा।

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