2027 तक आएगी भारत की पहली स्वदेशी डेंगू वैक्सीन, जानें कितनी असरदार होगी?

2027 तक आएगी भारत की पहली स्वदेशी डेंगू वैक्सीन, जानें कितनी असरदार होगी?

भारत में हर साल मॉनसून के बाद कहर बरपाने वाले डेंगू बुखार के खिलाफ चिकित्सा विज्ञान को एक ऐतिहासिक कामयाबी मिलने जा रही है। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) के महानिदेशक डॉ. राजीव बहल ने हाल ही में पुष्टि की है कि यदि मौजूदा क्लिनिकल ट्रायल और नियामक अनुमतियों की प्रक्रिया तय योजना के मुताबिक आगे बढ़ी, तो भारत को 2027 के अंत तक अपनी पहली स्वदेशी टेट्रावेलेंट डेंगू वैक्सीन 'डेन्गीऑल' (DengiAll) मिल सकती है। प्रमुख भारतीय फार्मास्युटिकल कंपनी पैनेशिया बायोटेक (Panacea Biotec) और आईसीएमआर के संयुक्त तत्वावधान में तैयार की जा रही यह लाइव-एटेन्यूएटेड वैक्सीन देश भर में डेंगू के मामलों में कमी लाने और गंभीर संक्रमण से होने वाली मौतों को रोकने के उद्देश्य से विकसित की गई है। भारत में अब तक डेंगू का कोई विशिष्ट एंटीवायरल उपचार उपलब्ध नहीं है और मरीजों का इलाज केवल लाक्षणिक और सहायक थेरेपी के जरिए किया जाता है। ऐसे में स्वदेशी स्तर पर एक सुरक्षित, किफायती और असरदार टीके का आगमन न केवल भारत के सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करेगा, बल्कि विकासशील देशों के लिए भी एक जीवन रक्षक ढाल साबित होगा।

चारों सीरोटाइप पर वार: कितनी असरदार होगी यह वैक्सीन?

डेंगू वायरस के चार अलग-अलग सीरोटाइप—DENV-1, DENV-2, DENV-3 और DENV-4 पाए जाते हैं, जिसके चलते इसकी वैक्सीन तैयार करना वैज्ञानिकों के लिए हमेशा से एक बड़ी वैश्विक चुनौती रहा है। जब कोई व्यक्ति किसी एक स्ट्रेन से संक्रमित होता है, तो उसके शरीर में केवल उसी स्ट्रेन के खिलाफ आजीवन इम्युनिटी बनती है, जबकि दूसरे स्ट्रेन से दोबारा संक्रमित होने पर 'एंटीबॉडी-डिपेंडेंट एन्हांसमेंट' (ADE) के कारण मरीज के गंभीर डेंगू, ब्लीडिंग और शॉक सिंड्रोम में जाने का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है। पैनेशिया बायोटेक की 'डेन्गीऑल' एक टेट्रावेलेंट वैक्सीन है, जिसे विशेष रूप से इन चारों सीरोटाइप के खिलाफ एक समान और मजबूत प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया (Immune Response) पैदा करने के लिए डिजाइन किया गया है। शुरुआती फेज़-1 और फेज़-2 क्लिनिकल ट्रायल्स के दौरान इस वैक्सीन ने प्रतिभागियों में चारों स्ट्रेन के खिलाफ मजबूत न्यूट्रलाइजिंग एंटीबॉडीज उत्पन्न करने में 80 से 90 प्रतिशत से अधिक की इम्युनोजेनिसिटी प्रदर्शित की थी। इसके साथ ही, इस टीके की सबसे बड़ी यूएसपी इसका 'सिंगल-डोज' फॉर्मूलेशन होना है। जहां विदेशी वैक्सीनों में दो या तीन खुराकों की जरूरत पड़ती है, वहीं डेन्गीऑल की एकल खुराक ही संपूर्ण सुरक्षा चक्र प्रदान करने के लिए जांची जा रही है, जो सामूहिक टीकाकरण अभियानों को बेहद आसान और प्रभावी बना सकती है।

18 राज्यों के 20 केंद्रों में 13 हजार वालंटियर्स पर फेज-3 ट्रायल

स्वदेशी डेंगू वैक्सीन की प्रभावकारिता और सुरक्षा को पुख्ता करने के लिए इसका देशव्यापी फेज-3 क्लिनिकल ट्रायल बेहद कड़े वैज्ञानिक मानकों पर संचालित किया जा रहा है। देश के 18 राज्यों में फैले लगभग 20 प्रमुख चिकित्सा अनुसंधान संस्थानों और मेडिकल कॉलेजों में 10,300 से लेकर 13,000 से अधिक वयस्क और युवा वालंटियर्स को इस अध्ययन में नामांकित किया गया है। इस ट्रायल को रैंडमाइज्ड, डबल-ब्लाइंड और प्लेसीबो-कंट्रोल्ड पद्धति पर रखा गया है, जिसमें हर दो प्रतिभागियों को वास्तविक टीका और एक प्रतिभागी को प्लेसीबो डोज दी गई है। शोधकर्ता लगभग एक वर्ष से अधिक समय से इन सभी वालंटियर्स की सेहत, एंटीबॉडी स्तर और किसी भी संभावित प्रतिकूल प्रभाव की बारीकी से मॉनिटरिंग कर रहे हैं। आईसीएमआर के अधिकारियों के अनुसार, ट्रायल का डेटा अगले साल के अंत तक अनब्लाइंड (Unblind) कर विश्लेषित किए जाने की उम्मीद है। यदि अंतिम आंकड़े यह प्रमाणित करते हैं कि टीका अस्पताल में भर्ती होने की दर और लक्षणयुक्त डेंगू संक्रमण को रोकने में वैश्विक मानकों पर खरा उतरता है, तो केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) से त्वरित बाजार स्वीकृति हासिल कर 2027 के मॉनसून सीजन से पहले इसे आम जनता के लिए रोलआउट किया जा सकेगा।

विदेशी टीकों की मौजूदगी और भारत के लिए स्वदेशी टीके का महत्व

वैश्विक स्तर पर डेंगू के खिलाफ जापानी कंपनी टाकेडा (Takeda) की 'क्यूडेंगा' (QDENGA) और सनोफी की 'डेंगवैक्सिया' (Dengvaxia) जैसी वैक्सीन पहले से मौजूद हैं, जिनमें से क्यूडेंगा को हाल ही में भारतीय नियामक द्वारा 4 से 60 वर्ष के आयु वर्ग के लिए निजी बाजार में सीमित स्वीकृति भी मिली है। हालांकि, विदेशी टीकों की भारी लागत, दो खुराकों की जटिल समय-सारणी और भारत में सर्कुलेट होने वाले विशिष्ट वायरस म्यूटेशन पर उनकी व्यापक प्रभावशीलता को लेकर स्वास्थ्य विशेषज्ञों के बीच निरंतर बहस रही है। भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश में जहां डेंगू हर साल लाखों लोगों को प्रभावित करता है और स्वास्थ्य बजट पर भारी बोझ डालता है, वहां एक सस्ती, स्वदेशी और स्थानीय वायरस स्ट्रेन के अनुकूल वैक्सीन की जरूरत सबसे ज्यादा महसूस की जा रही थी। पैनेशिया बायोटेक के साथ-साथ सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (SII) और इंडियन इम्युनोलॉजिकल्स भी डेंगू के टीकों पर समानांतर काम कर रहे हैं, जिससे आने वाले वर्षों में देश में टीकों की भरपूर आपूर्ति और सस्ती दरें सुनिश्चित हो सकेंगी।

वैक्सीन के साथ-साथ मच्छरों की रोकथाम रहेगी पहली प्राथमिकता

यद्यपि 2027 तक स्वदेशी डेंगू वैक्सीन का आगमन चिकित्सा जगत के लिए एक मील का पत्थर साबित होगा, लेकिन जनस्वास्थ्य विशेषज्ञों और महामारी विज्ञानियों ने आगाह किया है कि टीका कभी भी मच्छरों के नियंत्रण का संपूर्ण विकल्प नहीं बन सकता। डेंगू फैलाने वाला एडीज एजिप्टी (Aedes aegypti) मच्छर साफ ठहरे हुए पानी में पनपता है और दिन के समय काटता है। विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि जब तक समुदाय स्तर पर जलभराव को रोकने, कूलरों और गमलों की नियमित सफाई करने, कीटनाशक फॉगिंग और व्यक्तिगत बचाव के उपायों को सख्ती से लागू नहीं किया जाएगा, तब तक अकेले टीके के दम पर डेंगू का संपूर्ण उन्मूलन संभव नहीं है। टीका केवल संक्रमण की गंभीरता और आईसीयू में भर्ती होने के खतरे को न्यूनतम कर सकता है, लेकिन बीमारी के प्रसार की प्राथमिक कड़ी को तोड़ना नागरिकों की सतर्कता और स्वच्छता पर ही निर्भर करेगा।

Latest Posts