Gen-Z Protests: दिल्ली की सड़कों पर लाठियां और आंसू गैस, लेकिन कोलकाता का 'सांस्कृतिक जगत' चुप क्यों? जानिए बंगाल सिविल सोसाइटी के मौन का सच

Gen-Z Protests: दिल्ली की सड़कों पर लाठियां और आंसू गैस, लेकिन कोलकाता का 'सांस्कृतिक जगत' चुप क्यों? जानिए बंगाल सिविल सोसाइटी के मौन का सच

देशभर में Gen-Z (जनरेशन जेड) युवाओं और छात्रों द्वारा किए जा रहे विरोध प्रदर्शनों के बीच पश्चिम बंगाल के सांस्कृतिक, साहित्यिक और बौद्धिक जगत का मौन चर्चा का विषय बन गया है। ऐतिहासिक रूप से सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर सबसे पहले सड़कों पर उतरने वाला कोलकाता का सिविल सोसाइटी वर्ग इस बार पूरी तरह से शांत नजर आ रहा है।

दिल्ली में प्रदर्शनकारी छात्रों और जनप्रतिनिधियों पर लाठीचार्ज और आंसू गैस के गोले छोड़े जाने की घटनाओं के बाद जहाँ देश के कई दिग्गज कलाकार समर्थन में आ चुके हैं, वहीं बंगाल के पारंपरिक विरोध चेहरों का यह मौन सवाल खड़े कर रहा है।

देशभर से मिल रहा समर्थन, पर कोलकाता में सन्नाटा

दिल्ली आंदोलन के समर्थन में बॉलीवुड और कला जगत की कई हस्तियां सामने आई हैं:

  • नसीरुद्दीन शाह ने वीडियो संदेश जारी कर छात्रों पर हुई पुलिस कार्रवाई पर रोष जताया।

  • शबाना आजमी और प्रकाश राज सीधे जंतर-मंतर पहुँचकर प्रदर्शनकारियों के साथ खड़े हुए।

  • कॉमेडियन जॉनी लीवर और गायक अरिजीत सिंह ने भी सरकार से छात्रों के साथ तुरंत संवाद करने की अपील की।

दूसरी ओर, कोलकाता में केवल जादवपुर विश्वविद्यालय के छात्रों और कोलकाता मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों ने 12 घंटे की भूख हड़ताल कर एकजुटता दिखाई है। हालांकि, बंगाल का मुख्य बुद्धिजीवी वर्ग पूरी तरह से बैकफुट पर दिख रहा है।

बंगाल सिविल सोसाइटी का इतिहास: सत्ता और सुविधा का गणित

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, बंगाल की सिविल सोसाइटी का इतिहास हमेशा से सत्ता के साथ राजनीतिक संतुलन और 'कॉस्ट-बेनिफिट एनालिसिस' से जुड़ा रहा है:

1. वाममोर्चा का दौर (Left Front Era)

सीपीएम (CPM) शासनकाल में मार्क्सवादी विचारधारा से जुड़े लेखकों, नाटककारों और चित्रकारों को काफी संरक्षण मिला। वर्ष 1990 के बंटाला बलात्कार कांड जैसे गंभीर घटनाक्रमों के बाद भी तत्कालीन वामपंथी सरकार के समर्थन में कलाकारों का बड़ा वर्ग लामबंद रहा था।

2. तृणमूल शासन और कला जगत को प्रोत्साहन

2011 में सत्ता में आने के बाद ममता बनर्जी ने कलाकारों और बुद्धिजीवियों को विशेष स्थान दिया।

  • बजट और पद: सूचना एवं सांस्कृतिक विभाग का बजट बढ़ाकर 110 करोड़ रुपये किया गया।

  • संसद का सफर: जोगेन चौधरी, अर्पिता घोष, मिथुन चक्रवर्ती, देव अधिकारी, नुसरत जहां, मिमी चक्रवर्ती और सायोनी घोष जैसी हस्तियों को राज्यसभा और लोकसभा भेजा गया।

2026 की नई राजनीतिक हकीकत: 54 साल बाद बदला समीकरण

1972 के बाद पहली बार ऐसा राजनीतिक परिदृश्य बना है जहाँ राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल चुके हैं।

अभिनेता कौशिक सेन का बयान:

"हमारी एक्सपायरी डेट निकल चुकी है, हमने जनता का भरोसा खो दिया है। पिछले 15 वर्षों में जो कलाकार सत्ता के मंचों पर दिखे, उन्होंने निष्पक्षता खो दी। हमें अपनी कला, नाटकों और फिल्मों के माध्यम से जनता का विश्वास फिर से हासिल करना होगा।"

राजनीतिक विश्लेषक शुभमय मैत्रा का मत:

शुभमय मैत्रा के अनुसार, कोलकाता सिविल सोसाइटी की यह चुप्पी सिर्फ सत्ता परिवर्तन तक सीमित नहीं है। जिस वर्ग ने बिना किसी ठोस विचारधारा के केवल अवसरवादिता के तहत वामपंथ का छोड़कर तृणमूल का हाथ थामा था, अब सत्ता समीकरण बदलते ही उनकी सड़कों पर उतरने की इच्छा समाप्त हो गई है।

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