'ABCD जैसे लोग कुछ भी कहें, कोई वैल्यू नहीं': इस्तीफे की मांग पर भड़के BCI चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा, सदाशिव रेड्डी के आरोपों को बताया 'पॉलिटिकल स्टंट'

'ABCD जैसे लोग कुछ भी कहें, कोई वैल्यू नहीं': इस्तीफे की मांग पर भड़के BCI चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा, सदाशिव रेड्डी के आरोपों को बताया 'पॉलिटिकल स्टंट'

बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के शीर्ष नेतृत्व और देश के कानूनी गलियारों में उस समय बड़ा सियासी घमासान मच गया, जब बीसीआई के चेयरमैन और राज्यसभा सांसद मनन कुमार मिश्रा ने अपने खिलाफ लगे वित्तीय और प्रशासनिक आरोपों पर खुलकर प्रहार किया। बीसीआई के पूर्व सदस्य वाईआर सदाशिव रेड्डी द्वारा इस्तीफा मांगे जाने पर मिश्रा ने बेहद तल्ख लहजे में कहा कि बीसीआई एक स्वायत्त, संवैधानिक और लोकतांत्रिक संस्था है और किसी 'रेड्डी या एबीसीडी (ABCD) जैसे लोगों के कुछ भी कहने से उसकी कोई वैल्यू नहीं रह जाती'।

मनन कुमार मिश्रा ने नई दिल्ली में पत्रकारों और कानूनी प्रतिनिधियों से बात करते हुए साफ किया कि संस्था को बदनाम करने की यह पूरी कवायद एक सुनियोजित 'पॉलिटिकल स्टंट' और राजनीतिक प्रतिशोध का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया आज भी वकीलों के हितों की रक्षा करने वाली एक बेहद मजबूत संस्था है और भविष्य में भी इसकी गरिमा पर कोई आंच नहीं आने दी जाएगी।

सदाशिव रेड्डी ने लगाए थे गंभीर आरोप: 15 दिन में मांगा था इस्तीफा

इस पूरे विवाद की शुरुआत तब हुई जब कर्नाटक से आने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता वाईआर सदाशिव रेड्डी ने मनन कुमार मिश्रा को एक औपचारिक पत्र लिखकर कई गंभीर सवाल उठाए। रेड्डी ने अपने पत्र में आरोप लगाया था कि काउंसिल के फंड का दुरुपयोग हो रहा है, विभिन्न पदों पर नियुक्तियों में अनियमितताएं बरती जा रही हैं और लॉ कॉलेजों व विश्वविद्यालयों से मिलने वाले डोनेशन व पेमेंट्स में पारदर्शिता की भारी कमी है।

रेड्डी ने यह भी दावा किया कि वर्ष 2012 से लगातार 14 सालों तक चेयरमैन पद पर एक ही व्यक्ति का बने रहना लोकतांत्रिक मर्यादाओं के विपरीत है। उन्होंने मनन मिश्रा को पत्र मिलने के 15 दिनों के भीतर पद छोड़ने का अल्टीमेटम दिया था और साथ ही बीसीआई की विशेष बैठक बुलाने व बीसीआई ट्रस्ट 'पर्ल-फर्स्ट' (PEARL-First) का स्वतंत्र ऑडिट कराने की मांग की थी।

'वह को-चेयरमैन भी नहीं, 8.5 साल तक क्यों साधी थी चुप्पी?'

आरोपों का बिंदुवार जवाब देते हुए मनन कुमार मिश्रा ने सदाशिव रेड्डी की वैधानिक स्थिति पर ही सवाल खड़े कर दिए। मिश्रा ने कहा कि मीडिया में खुद को बीसीआई का को-चेयरमैन बताने वाले रेड्डी असल में आज न तो बीसीआई के को-चेयरमैन हैं और न ही वह किसी स्टेट बार काउंसिल के सदस्य बचे हैं।

मिश्रा ने तीखा सवाल पूछते हुए कहा कि रेड्डी पिछले साढ़े आठ साल से बार काउंसिल ऑफ इंडिया के सदस्य रहे हैं और उस ट्रस्ट (PEARL-First) के खुद ट्रस्टी रहे हैं, जिस पर आज वे सवाल उठा रहे हैं। साढ़े आठ साल तक पद पर रहते हुए उन्होंने कभी कोई अनियमितता का मुद्दा नहीं उठाया, लेकिन अब जब वे किसी पद पर नहीं हैं, तो विपक्षी दलों (कांग्रेस समर्थकों) की शह पर अनर्गल आरोप लगा रहे हैं। मिश्रा ने कहा कि बिना किसी ठोस आधार के लगाए गए इन मनगढ़ंत आरोपों का कानूनी बिरादरी में कोई वजूद नहीं है।

'मैं चुनकर आया हूं, किसी के दबाव में इस्तीफा नहीं दूंगा'

चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा ने अपने इस्तीफे की संभावना को पूरी तरह सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि वे सरकार द्वारा किसी पिछले दरवाजे से मनोनीत (Nominated) किए गए अधिकारी नहीं हैं, बल्कि देश भर के वकीलों द्वारा चुनी गई लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं।

उन्होंने चुनाव प्रणाली को समझाते हुए बताया कि सबसे पहले राज्य स्तर पर लाखों अधिवक्ता अपने-अपने स्टेट बार काउंसिल के प्रतिनिधियों को चुनते हैं। इसके बाद सभी राज्यों के प्रतिनिधि मिलकर बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के लिए सदस्यों का चयन करते हैं और वे सदस्य मिलकर चेयरमैन व वाइस-चेयरमैन का चुनाव करते हैं। मिश्रा ने कहा कि जब तक उन्हें देश के विभिन्न राज्यों के बार काउंसिल प्रतिनिधियों और अधिवक्ताओं का पूर्ण समर्थन व विश्वास प्राप्त है, तब तक वे किसी व्यक्तिगत विरोध या दबाव की राजनीति के आगे झुककर इस्तीफा नहीं देंगे।

सुप्रीम कोर्ट में भी पहुंची 12 साल के लंबे कार्यकाल की कानूनी जंग

यह विवाद केवल जुबानी बयानबाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि अब देश की शीर्ष अदालत की चौखट तक पहुंच चुका है। सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दाखिल कर मनन कुमार मिश्रा के 12 से अधिक वर्षों के कार्यकाल और उस गजट अधिसूचना को चुनौती दी गई है जिसके जरिए उनके कार्यकाल को आगे बढ़ाया गया था।

अदालत में दायर याचिका में यह दलील दी गई है:

  • नियम 12(2) का उल्लंघन: बीसीआई नियमों के तहत चेयरमैन का कार्यकाल दो साल के लिए तय है, लेकिन बार-बार दोबारा चुने जाने पर स्पष्ट कैपिंग न होने से एक ही व्यक्ति लंबे समय से पद पर काबिज है।

  • रोटेशन और कूलिंग-ऑफ की मांग: याचिका में सुप्रीम कोर्ट से मांग की गई है कि विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधियों को मौका देने के लिए रोटेशन प्रणाली और एक निश्चित कूलिंग-ऑफ अवधि लागू की जाए।

  • स्वतंत्र जांच और ऑडिट: बीसीआई ट्रस्ट के वित्तीय लेन-देन, ऑल इंडिया बार एग्जामिनेशन (AIBE) से होने वाली प्राप्तियों और फंड्स के आवंटन की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज की अध्यक्षता में स्वतंत्र समिति गठित करने का आग्रह किया गया है।

बीसीआई की साख और कानूनी बिरादरी में तेज हुई हलचल

एडवोकेट्स एक्ट 1961 के तहत गठित बार काउंसिल ऑफ इंडिया देश भर के 20 लाख से अधिक अधिवक्ताओं का नियमन करने वाली सर्वोच्च संस्था है। देश में विधिक शिक्षा के मानक तय करने से लेकर लॉ कॉलेजों की मान्यता और अधिवक्ताओं के आचरण संहिता को लागू करने की अहम जिम्मेदारी इसी परिषद पर होती है।

वरिष्ठ वकीलों के दो गुटों में बंटने और एक-दूसरे पर तीखे हमले बोलने से कानूनी बिरादरी में चिंता का माहौल है। जहां एक पक्ष इसे संस्थागत सुधार, पारदर्शिता और नए नेतृत्व को मौका देने की स्वाभाविक मांग बता रहा है, वहीं मनन मिश्रा समर्थक खेमा इसे पेशेवर ईर्ष्या और आगामी सांगठनिक चुनावों से पहले संस्था को अस्थिर करने का असफल प्रयास मान रहा है। आने वाले दिनों में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और बीसीआई की आगामी बैठकों पर पूरे देश की निगाहें टिकी रहेंगी कि भारतीय बार का यह सबसे बड़ा नेतृत्व विवाद किस दिशा में आगे बढ़ता है।

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