14 सालों में किसी CM ने नहीं किया जो काम, वो करने जा रहे थलपति विजय; कावेरी विवाद पर क्यों उठ रहे सवाल?

14 सालों में किसी CM ने नहीं किया जो काम, वो करने जा रहे थलपति विजय; कावेरी विवाद पर क्यों उठ रहे सवाल?

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय (Thalapathy Vijay) राज्य की राजनीति और प्रशासन में लगातार लीक से हटकर फैसले ले रहे हैं। लंबे समय से चले आ रहे कावेरी जल विवाद को सुलझाने के लिए सीएम विजय ने एक ऐसा कदम उठाया है, जो पिछले 14 वर्षों में तमिलनाडु का कोई भी मुख्यमंत्री नहीं उठा सका। थलपति विजय ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के साथ 31 जुलाई से 3 अगस्त के बीच कावेरी मुद्दे पर सीधी द्विपक्षीय बातचीत करने का प्रस्ताव रखा है।

विजय का यह कदम तमिलनाडु के तीन दशक पुराने उस पारंपरिक रुख से बिल्कुल अलग है, जिसमें राज्य हमेशा सीधी बातचीत के बजाय अदालती फैसलों, ट्रिब्यूनल और कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) के आदेशों पर ही निर्भर रहता आया है।

क्यों पड़ी सीधी बातचीत की जरूरत? कावेरी डेल्टा में गहराया जल संकट

तमिलनाडु के कावेरी डेल्टा क्षेत्र में इस समय किसान पानी की भारी किल्लत का सामना कर रहे हैं और फसलें सूखने के कगार पर हैं। ट्रिब्यूनल के तय मानकों के अनुसार, 1 जून से 23 जुलाई के बीच तमिलनाडु को कर्नाटक से लगभग 32,000 मिलियन क्यूबिक फीट (TMC) पानी मिलना चाहिए था। हालांकि, तमिलनाडु को इस अवधि में केवल 3.5 TMC पानी ही प्राप्त हुआ है।

कमजोर मॉनसून के बीच राज्य के किसानों को राहत दिलाने के लिए सीएम विजय ने कानूनी अधिकारों से समझौता किए बिना दोनों राज्यों के बीच संवाद का एक नया रास्ता खोलने का फैसला किया है, ताकि आपात स्थिति में पानी की आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके।

विपक्ष और किसान संगठनों ने उठाए सवाल: क्या है मेकेदातु का खतरा?

थलपति विजय की इस पहल का स्वागत होने के साथ-साथ इसका विरोध भी शुरू हो गया है। विपक्षी दलों और स्थानीय किसान संगठनों ने इस बातचीत पर गंभीर चिंता जताई है:

  • CWMA को दरकिनार करने की आशंका: आलोचकों का तर्क है कि मुख्यमंत्रियों के स्तर पर सीधी वार्ता से कर्नाटक को 'कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण' (CWMA) जैसी वैधानिक संस्थाओं को दरकिनार करने का मौका मिल सकता है।

  • मेकेदातु डैम का दबाव: कयास लगाए जा रहे हैं कि कर्नाटक पानी छोड़ने के बदले तमिलनाडु पर मेकेदातु (Mekedatu) में प्रस्तावित बांध निर्माण का विरोध वापस लेने का दबाव बना सकता है।

  • कानूनी विशेषज्ञों की राय: पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश के. कन्नन का मानना है कि मुख्यमंत्रियों के बीच बातचीत से सद्भावना का माहौल तो बन सकता है, लेकिन यह वार्ता ट्रिब्यूनल और सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय कानूनी अधिकारों का विकल्प नहीं हो सकती।

थलपति विजय के लिए बड़ा राजनीतिक दांव: कूटनीतिक जीत या अपरिपक्वता?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कर्नाटक में सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी और तमिलनाडु में विजय के राजनीतिक समीकरणों के चलते इस बैठक के लिए अनुकूल माहौल बना है। हालांकि, जल विवाद जैसे संवेदनशील राज्य-स्तरीय मुद्दों पर अक्सर राजनीतिक संबंध बेअसर साबित होते हैं, क्योंकि दोनों ही नेताओं को अपने राज्य की जनता और किसानों के प्रति जवाबदेह होना पड़ता है।

यदि थलपति विजय इस वार्ता के जरिए मेकेदातु परियोजना पर तमिलनाडु के रुख से समझौता किए बिना कावेरी का पानी लाने में सफल रहते हैं, तो इसे उनकी बहुत बड़ी कूटनीतिक जीत माना जाएगा। वहीं, अगर यह बातचीत बेनतीजा खत्म होती है, तो विरोधी इसे उनकी राजनीतिक अपरिपक्वता करार देने में देर नहीं करेंगे।

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