4 महीने पहले जेल में कैद 'देशद्रोही'... फिर 26 दिन के अनशन से सोनम वांगचुक को आखिर क्या मिला?
शिक्षा व्यवस्था में सुधार और पेपर लीक के मुद्दों को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर चला आ रहा आंदोलन एक नए मोड़ पर पहुंच गया है। सामाजिक कार्यकर्ता और प्रसिद्ध पर्यावरणविद सोनम वांगचुक ने केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा के हाथों सरकार का लिखित आश्वासन पत्र मिलने के बाद अपना 26 दिनों से जारी कड़ा अनशन समाप्त कर दिया है।
हालांकि, केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मुख्य मांग पूरी हुए बिना अनशन टूटने के बाद कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के सूत्रधार अभिजीत दीपके ने आंदोलन की कमान संभाल ली है। ऐसे में बड़ा सवाल यह उठता है कि कुछ महीने पहले तक जेल में बंद रहे 59 वर्षीय सोनम वांगचुक को इस अनशन से क्या हासिल हुआ?
26 दिनों के अनशन और सरकारी आश्वासन के मायने
जंतर-मंतर पर 28 जून से अनशन पर बैठे वांगचुक को स्वास्थ्य बिगड़ने के कारण अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा था। सरकार द्वारा तीन प्रमुख मांगों पर लिखित पत्र सौंपे जाने के बाद उन्होंने अनशन तोड़ा। भले ही शिक्षा मंत्री का इस्तीफा नहीं हुआ हो, लेकिन इस आंदोलन ने राष्ट्रीय राजनीति में वांगचुक के प्रभाव को नए सिरे से स्थापित किया है।
"अगर मैं देशद्रोही था, तो मुझे छोड़ा क्यों गया? जेल जाने से किसी भी सामाजिक मुद्दे पर निडर होकर बोलने का साहस मिलता है।"
— सोनम वांगचुक
'देशद्रोही' के ठप्पे से राष्ट्रीय पहचान तक का सफर
लद्दाख को छठी अनुसूची (6th Schedule) में शामिल करने और राज्य का दर्जा देने की मांग को लेकर 2025 में सोनम वांगचुक को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत जोधपुर जेल भेज दिया गया था। लगभग 170 दिन जेल में बिताने और मीडिया के एक वर्ग द्वारा 'देशद्रोही' करार दिए जाने के बाद, 14 मार्च को उन्हें रिहा किया गया।
जेल से निकलने के महज चार महीने के भीतर ही केंद्र सरकार का उनके साथ बातचीत करना और लिखित आश्वासन देना वांगचुक की बड़ी नैतिक जीत मानी जा रही है।
इस आंदोलन से सोनम वांगचुक को क्या-क्या मिला?
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राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान और प्रासंगिकता: रासुका (NSA) हटने के बाद केंद्र सरकार के दो वरिष्ठ मंत्रियों द्वारा वार्ता करना उनके खिलाफ उठी तमाम अफवाहों का करारा जवाब है।
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लद्दाख के मुद्दों पर मजबूती: सरकार के साथ बनी नई 'केमिस्ट्री' से लद्दाख में स्वायत्तता और पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी मांगों को गति मिल सकती है।
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संस्थाओं को राहत की उम्मीद: जेल जाने के बाद उनके संस्थान HIAL और SECMOL पर शुरू हुई कानूनी व वित्तीय जांचों के रवैये में ढील मिलने की संभावना जगी है।
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गांधीवादी नेता की छवि: अन्ना हजारे के आंदोलन के बाद दिल्ली के जंतर-मंतर पर अहिंसक अनशन के जरिए सरकार को टेबल पर लाने वाले वह बड़े चेहरे बनकर उभरे हैं।