कौन थे स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती? हत्या के 18 साल बाद मुख्य आरोपी माओवादी 'आजाद' कोर्ट से बरी, CMO से जांच रिपोर्ट गायब होने पर गरमाई ओडिशा की सियासत

कौन थे स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती? हत्या के 18 साल बाद मुख्य आरोपी माओवादी 'आजाद' कोर्ट से बरी, CMO से जांच रिपोर्ट गायब होने पर गरमाई ओडिशा की सियासत

ओडिशा के बहुचर्चित स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती हत्याकांड में करीब 18 साल बाद एक बड़ा कानूनी मोड़ सामने आया है। गजपति जिले के पारलाखेमुंडी स्थित अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (विशेष अदालत) ने मुख्य साजिशकर्ता और आरोपी बताए गए सीपीआई (माओवादी) के शीर्ष नेता डी. केशब राव उर्फ 'आजाद' को सभी आरोपों से बरी कर दिया है। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष (पुलिस) आरोपी के खिलाफ हत्या, आपराधिक साजिश, दंगा और आर्म्स एक्ट के तहत लगाए गए आरोपों को पुख्ता सबूतों के साथ साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा है।

आजाद को वर्ष 2011 में आंध्र प्रदेश पुलिस के सामने आत्मसमर्पण के बाद ओडिशा पुलिस ने हिरासत में लिया था और वह पिछले 15 वर्षों से भुवनेश्वर की झारपाड़ा जेल में बंद था। अन्य मामलों में पहले ही बरी हो चुके आजाद को इस फैसले के बाद जेल से रिहा कर दिया गया है। इस बहुचर्चित फैसले और साथ ही राज्य सचिवालय के मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) से न्यायिक जांच आयोग की मूल रिपोर्ट के रहस्यमय तरीके से गायब होने की खबर ने ओडिशा की राजनीति में भारी भूचाल ला दिया है।

कौन थे स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती? जिन्होंने जनजातीय इलाके में बिताया जीवन

विश्व हिंदू परिषद (VHP) के वरिष्ठ नेता और प्रखर संन्यासी स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती ओडिशा के सुदूर और पिछड़े जनजातीय बहुल कंधमाल जिले में एक सम्मानित आध्यात्मिक व सामाजिक व्यक्तित्व थे। उन्होंने 1960 के दशक के उत्तरार्ध में कंधमाल के दुर्गम वनवासी अंचल में कदम रखा और अपना पूरा जीवन स्थानीय जनजातीय समाज के उत्थान, शिक्षा और सेवा कार्यों में समर्पित कर दिया।

स्वामी जी ने कंधमाल के जलेस्पेटा और चकापाद में आश्रमों की स्थापना की। उन्होंने विशेष रूप से वनवासी बालिकाओं की शिक्षा के लिए आवासीय विद्यालय (कन्याश्रम) शुरू किए, जहां सैकड़ों आदिवासी बेटियों को निशुल्क शिक्षा, संस्कार और आत्मनिर्भरता का प्रशिक्षण दिया जाता था। इसके साथ ही, स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती ने क्षेत्र में अवैध गोहत्या और जनजातीय लोगों के कथित जबरन धर्मांतरण के खिलाफ लंबा जनजागरण अभियान चलाया। अपने इन्हीं सामाजिक अभियानों के कारण वे अक्सर कुछ असामाजिक और कट्टरपंथी गुटों के निशाने पर रहते थे और उन पर पहले भी कई बार जानलेवा हमले हो चुके थे। उनके योगदान को सम्मान देते हुए ओडिशा सरकार ने हाल ही में फूलबनी मेडिकल कॉलेज का नामकरण उनके नाम पर किया है।

23 अगस्त 2008: जन्माष्टमी की रात आश्रम में हुआ था खूनी हमला

23 अगस्त 2008 की रात कंधमाल जिले के तुमुडीबंधा ब्लॉक स्थित जलेस्पेटा कन्याश्रम में जन्माष्टमी का पावन पर्व उल्लास के साथ मनाया जा रहा था। आश्रम में भजन-कीर्तन चल रहे थे, तभी रात के समय करीब 20 से 25 नकाबपोश हथियारबंद हमलावरों ने आश्रम परिसर पर धावा बोल दिया।

हमलावरों ने अत्याधुनिक स्वचालित हथियारों से अंधाधुंध गोलीबारी शुरू कर दी। इस नृशंस हमले में 84 वर्षीय स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती, माता भक्तिमयी, किशोर बाबा, अमृतानंद और पूरंजन गांता सहित कुल पांच लोगों की मौके पर ही गोली मारकर हत्या कर दी गई। इस नृशंस हत्याकांड ने न केवल पूरे ओडिशा बल्कि पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था।

अदालत ने माओवादी नेता को क्यों किया बरी? जांच की कमजोर कड़ियां

पारलाखेमुंडी की विशेष अदालत ने अपने 45 पृष्ठों के आदेश में पुलिस और जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए। अदालत ने अपने ऐतिहासिक फैसले में कहा कि महज अपराध के जघन्य होने से किसी संदेह को कानूनी सबूत में नहीं बदला जा सकता (Suspicion cannot substitute proof)।

अदालत द्वारा आरोपी को बरी करने के पीछे मुख्य आधार निम्नलिखित रहे:

  • पहचान का अभाव: घटना के समय मौजूद 22 गवाहों में से केवल शिकायतकर्ता ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए आरोपी की पहचान का दावा किया। अदालत ने पाया कि शुरुआती एफआईआर में सभी हमलावरों के चेहरे मंकी कैप और नकाब से ढके होने की बात कही गई थी, इसलिए बिना टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड (TIP) के यह पहचान विश्वसनीय नहीं मानी जा सकती।

  • दावे वाला माओवादी पत्र कोर्ट में पेश नहीं: घटना के समय पुलिस ने दावा किया था कि माओवादियों ने बंसधारा डिवीजन के नाम से लाल स्याही में लिखा एक पत्र छोड़ा था जिसमें 'आजाद' के हस्ताक्षर थे और हत्या की जिम्मेदारी ली गई थी। हालांकि, अभियोजन पक्ष मुकदमे के दौरान अदालत के समक्ष न तो वह मूल पत्र पेश कर सका और न ही किसी हैंडराइटिंग एक्सपर्ट की फॉरेंसिक रिपोर्ट प्रस्तुत की गई।

  • हथियार व फॉरेंसिक साक्ष्य की कमी: आरोपी आजाद के पास से कोई हथियार, कारतूस या अपराध से जुड़ी कोई सामग्री बरामद नहीं हुई थी और न ही कोई बैलिस्टिक रिपोर्ट उसे घटनास्थल से सीधे जोड़ सकी।

गौरतलब है कि इससे पहले वर्ष 2013 में फूलबनी की एक सत्र अदालत ने इस हत्याकांड में माओवादी नेता उदय सहित 8 अन्य आरोपियों को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी, जिनमें से अधिकांश वर्तमान में लगभग एक दशक जेल काटने के बाद जमानत पर बाहर हैं।

जांच आयोग की रिपोर्ट मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) से कैसे हुई गायब?

स्वामी लक्ष्मणानंद की हत्या के बाद कंधमाल जिले में बड़े पैमाने पर भीषण सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठी थी। इस हिंसा में 38 से अधिक लोगों की जान चली गई थी और 25,000 से अधिक लोग बेघर होकर विस्थापित हुए थे। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए तत्कालीन राज्य सरकार ने पहले न्यायमूर्ति एस.सी. महापात्रा और उनके निधन के बाद सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति ए.एस. नायडू की अध्यक्षता में एक न्यायिक जांच आयोग का गठन किया था।

जस्टिस ए.एस. नायडू आयोग ने सैकड़ों गवाहों के बयान और साक्ष्य दर्ज करने के बाद दिसंबर 2015 में अपनी विस्तृत अंतिम जांच रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंप दी थी। लेकिन तत्कालीन बीजेडी सरकार ने इसे कभी विधानसभा के पटल पर नहीं रखा और न ही सार्वजनिक किया।

वर्ष 2024 में राज्य में सरकार बदलने के बाद यह सनसनीखेज खुलासा हुआ कि कंधमाल दंगों की यह संवेदनशील न्यायिक जांच रिपोर्ट और 2016 के सम (SUM) अस्पताल अग्निकांड की रिपोर्ट राज्य सचिवालय के मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) से रहस्यमय तरीके से गायब हो चुकी है। मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने इसे एक सोची-समझी प्रशासनिक साजिश करार देते हुए मामले की जांच सीआईडी-क्राइम ब्रांच को सौंप दी है। जांच एजेंसी पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के करीबी पूर्व नौकरशाह वी.के. पांडियन और तत्कालीन प्रधान सचिवों से भी पूछताछ कर रही है।

ओडिशा की सियासत और 2009 का ऐतिहासिक गठबंधन टूटना

स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या का प्रभाव केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं था, बल्कि इसने ओडिशा के राजनीतिक परिदृश्य को हमेशा के लिए बदल दिया। वर्ष 2000 से राज्य में बीजू जनता दल (BJD) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) का मजबूत गठबंधन सत्ता में था।

2008 में स्वामी जी की हत्या और उसके बाद भड़की हिंसा के कारण दोनों सहयोगी दलों के बीच गहरे मतभेद पैदा हो गए। नतीजतन, 2009 के आम और विधानसभा चुनावों से ठीक एक महीने पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने भाजपा के साथ अपना 9 साल पुराना गठबंधन तोड़ लिया था। अब जब भाजपा सत्ता में है, तो इस रिपोर्ट के गायब होने और मुख्य आरोपी के बरी होने ने एक बार फिर दोनों दलों के बीच तीखा वाकयुद्ध शुरू कर दिया है।

वीएचपी की सीबीआई (CBI) जांच की मांग और आगे की राह

अदालत द्वारा माओवादी नेता आजाद को बरी किए जाने के बाद विश्व हिंदू परिषद (VHP) और अन्य संगठनों ने गहरा असंतोष व्यक्त किया है। संगठनों का कहना है कि कमजोर पुलिस जांच के कारण मुख्य षड्यंत्रकारी बच निकले। उन्होंने इस पूरे मामले और इसके पीछे की अंतरराष्ट्रीय साजिश की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) से कराने की मांग दोहराई है।

मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने स्पष्ट किया है कि स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा और उनकी सरकार मामले की सभी गायब फाइलों को खोजने के साथ-साथ इस हत्याकांड के वास्तविक अपराधियों और साजिशकर्ताओं को कानून के कटघरे में खड़ा करने के लिए हर संभव कानूनी कदम उठाएगी।

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