सावन में बना दुर्लभ महासंयोग: एक ही दिन भौम प्रदोष और मंगला गौरी व्रत, जानें शिव-शक्ति पूजन का शुभ मुहूर्त
पवित्र सावन मास में जब भगवान शिव और माता पार्वती के प्रिय दिन एक साथ आते हैं, तो वह तिथि अत्यंत फलदायी और आध्यात्मिक दृष्टि से विशेष मानी जाती है। सावन के मंगलवार के दिन त्रयोदशी तिथि का पड़ना यानी 'भौम प्रदोष' और 'मंगला गौरी व्रत' का एक साथ होना एक दुर्लभ महासंयोग निर्मित करता है। ज्योतिष और धर्मशास्त्रों के अनुसार, यह अद्भुत योग दांपत्य जीवन में मधुरता, संतान सुख, अखंड सौभाग्य और गंभीर आर्थिक संकटों या कर्ज से मुक्ति दिलाने के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है। जहां सुबह का समय मां गौरी की आराधना को समर्पित होता है, वहीं प्रदोष काल की संध्या में महादेव के रुद्राभिषेक का विशेष महत्व है।
सावन भौम प्रदोष और मंगला गौरी व्रत का शुभ मुहूर्त
भौम प्रदोष और मंगला गौरी व्रत के दिन पूजा का सही समय जानना बेहद आवश्यक है। शास्त्रों के अनुसार, मंगला गौरी की पूजा सूर्योदय के बाद प्रातः काल में की जाती है, जबकि प्रदोष व्रत का मुख्य पूजन सूर्यास्त के समय यानी 'प्रदोष काल' में संपन्न होता है।
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मंगला गौरी प्रातः पूजन मुहूर्त: सूर्योदय से लेकर पूर्वाह्न के समय अमृत और शुभ चौघड़िया में मां गौरी का अभिषेक और सोलह श्रृंगार अर्पित करना अत्यंत फलदायी होता है।
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प्रदोष काल पूजन समय: सूर्यास्त से लगभग 45 मिनट पहले और सूर्यास्त के 45 मिनट बाद तक का समय 'प्रदोष काल' कहलाता है। इस काल में शिवलिंग पर जल, दूध और बेलपत्र चढ़ाने से समस्त पापों का नाश होता है।
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अभिजीत मुहूर्त: दिन के मध्य में दोपहर के समय अभिजीत मुहूर्त में किए गए जप, तप और दान का अनंत गुना फल प्राप्त होता है।
सावन भौम प्रदोष व्रत की पौराणिक कथा और महत्व
पौराणिक मान्यता के अनुसार, एक नगर में एक अत्यंत धर्मनिष्ठ ब्राह्मणी अपने पुत्र के साथ निवास करती थी। उसके पति का देहांत हो चुका था, जिसके कारण वह भिक्षा मांगकर अपना और अपने बेटे का भरण-पोषण करती थी। एक दिन भिक्षा मांगकर लौटते समय उसे विदर्भ देश का एक राजकुमार मिला, जो शत्रुओं द्वारा राज्य छीन लिए जाने के कारण अत्यंत दयनीय अवस्था में भटक रहा था। दयालु ब्राह्मणी ने उस राजकुमार को भी अपने घर में शरण दी और अपने पुत्र की तरह उसका पालन किया।
एक दिन दोनों बालक वन में खेल रहे थे, तभी गंधर्व कन्याएं वहां विहार कर रही थीं। राजकुमार की दृष्टि गंधर्व कन्या 'अंशुमती' पर पड़ी और दोनों एक-दूसरे पर मोहित हो गए। कुछ समय बाद अंशुमती के पिता गंधर्व राज ने भगवान शिव की प्रेरणा से राजकुमार का विवाह अपनी पुत्री से करा दिया। इसके बाद गंधर्व सेना की सहायता से राजकुमार ने अपने पैतृक राज्य पर पुनः अधिकार प्राप्त कर लिया।
राजकुमार ने राजपद पाते ही उस निर्धन ब्राह्मणी और उसके पुत्र को राजमहल में सर्वोच्च स्थान दिया। ब्राह्मणी नियमपूर्वक भौम प्रदोष का व्रत करती थी और महादेव के पंचाक्षर मंत्र का जाप करती थी। उसी व्रत के प्रभाव से ब्राह्मणी के परिवार की दरिद्रता दूर हुई और राजकुमार को उसका खोया हुआ राज्य वापस मिला। मान्यता है कि भौम प्रदोष का व्रत करने से व्यक्ति को भूमि-भवन का लाभ होता है और पुराने से पुराने कर्जों से मुक्ति मिलती है।
मां मंगला गौरी व्रत कथा और अखंड सौभाग्य का वरदान
मंगला गौरी व्रत की प्रचलित कथा के अनुसार, प्राचीन काल में धर्मपाल नाम का एक अत्यंत धनी और परोपकारी सेठ रहता था। उसके पास धन, वैभव और सम्मान की कोई कमी नहीं थी, परंतु उसकी कोई संतान नहीं थी, जिससे वह और उसकी पत्नी सदैव दुखी रहते थे। सेठ ने कठिन तपस्या और भगवान शिव की आराधना की। प्रसन्न होकर भगवान ने उसे एक पुत्र का वरदान तो दिया, लेकिन साथ ही यह भी बताया कि बालक अल्पायु होगा और सोलह वर्ष की आयु में सर्पदंश से उसकी मृत्यु हो जाएगी।
पुत्र के जन्म के बाद माता-पिता ने उसका विवाह सोलह वर्ष पूर्ण होने से पहले ही एक ऐसी कन्या से कर दिया, जिसकी माता सदैव सावन के मंगलवार को मां मंगला गौरी का विधिवत व्रत रखती थी। मंगला गौरी व्रत के पुण्य प्रभाव से उस कन्या को कभी न विधवा होने (अखंड सौभाग्य) का वरदान प्राप्त था। जब सेठ के पुत्र की आयु 16 वर्ष हुई और काल स्वरूप सर्प उसे डसने आया, तो कन्या के सतीत्व और मंगला गौरी के आशीर्वाद के कारण वह सर्प बालक का अहित नहीं कर सका। इस प्रकार देवी गौरी की कृपा से सेठ के पुत्र को नया जीवन मिला और वह दीर्घायु हुआ। तभी से सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, सुखी वैवाहिक जीवन और संतान प्राप्ति के लिए यह व्रत श्रद्धापूर्वक करती हैं।
प्रदोष और मंगला गौरी व्रत की संयुक्त पूजन विधि
इस पावन संयोग पर सुबह और शाम दोनों समय की पूजा का विशेष विधान है:
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प्रातः काल की पूजा (मंगला गौरी पूजन): सुबह स्नान कर स्वच्छ लाल या पीले वस्त्र धारण करें। पूजा स्थान पर लाल कपड़ा बिछाकर मां पार्वती या मंगला गौरी की प्रतिमा स्थापित करें। मां को 16 की संख्या में सामग्रियां अर्पित की जाती हैं, जिनमें 16 सुहाग की वस्तुएं, 16 लौंग, 16 इलायची, 16 फल और 16 आटे के दीपक शामिल हैं। आटे के दीपक जलाकर मंगला गौरी की कथा पढ़ें और आरती करें।
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संध्या काल की पूजा (प्रदोष पूजन): शाम को पुनः स्नान कर या हाथ-पैर धोकर स्वच्छ वस्त्र पहनें। शिवलिंग का गंगाजल, गाय के कच्चे दूध, दही, शहद, घी और शर्करा (पंचामृत) से अभिषेक करें। महादेव को प्रिय 108 बेलपत्र, धतूरा, भांग, सफेद चंदन और भस्म अर्पित करें। इसके बाद भौम प्रदोष व्रत कथा का श्रवण करें और 'ॐ नमः शिवाय' का 108 बार जाप करें।
इस महासंयोग पर किए जाने वाले विशेष उपाय
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कर्ज मुक्ति के लिए: भौम प्रदोष के दिन तांबे के लोटे में जल भरकर उसमें थोड़ा लाल चंदन, लाल फूल और गुड़ मिलाकर शिवलिंग पर अर्पित करें। इसके बाद शिव मंदिर में बैठकर 'ऋणमुक्तेश्वर महादेव स्तोत्र' का पाठ करें।
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वैवाहिक कलह दूर करने के लिए: पति-पत्नी मिलकर माता पार्वती और भगवान शिव को लाल और सफेद पुष्पों की माला अर्पित करें और शिव-शक्ति के समक्ष शुद्ध घी का दीपक जलाकर सुखी दांपत्य जीवन की प्रार्थना करें।
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मंगल दोष निवारण: यदि कुंडली में मंगल दोष या विवाह में बाधा आ रही हो, तो सावन मंगलवार और प्रदोष के दिन शिवलिंग पर मसूर की दाल और शहद अर्पित करने से मंगल ग्रह के क्रूर प्रभाव शांत होते हैं।