पाकिस्तान क्रिकेट में सीनियर खिलाड़ियों की अनदेखी पर भड़के पूर्व दिग्गज, बोर्ड की 'यूज एंड थ्रो' नीति पर उठाए तीखे सवाल
पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (PCB) एक बार फिर अपने आंतरिक विवादों, कड़े फैसलों और सीनियर खिलाड़ियों के साथ किए जा रहे कथित अमानवीय और अपमानजनक व्यवहार को लेकर चौतरफा घिर गया है। हाल के समय में बाबर आजम, शाहीन शाह अफरीदी, नसीम शाह, फखर जमां और सरफराज अहमद जैसे देश के सबसे बड़े और स्थापित खिलाड़ियों को बिना किसी स्पष्ट संवाद के अहम दौरों और मैचों से बाहर किए जाने के बाद क्रिकेट जगत में भारी आक्रोश देखने को मिल रहा है। इसी कड़ी में अब देश के पूर्व दिग्गज क्रिकेटरों ने मोर्चा खोलते हुए पीसीबी की कार्यप्रणाली पर गंभीर आरोप लगाए हैं। पूर्व दिग्गजों का साफ कहना है कि पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड अपनी प्रशासनिक नाकामियों और गलत नीतियों का ठीकरा हमेशा सीनियर खिलाड़ियों के सिर पर फोड़ता है और जब टीम हारती है, तो उन्हें बलि का बकरा बनाकर बेआबरू कर बाहर का रास्ता दिखा देता है।
'यूज एंड थ्रो' नीति का शिकार हो रहे हैं स्टार खिलाड़ी: पूर्व दिग्गजों का पीसीबी पर सीधा हमला
पाकिस्तान के पूर्व क्रिकेटरों और विश्लेषकों ने एक स्वर में कहा है कि पीसीबी में खिलाड़ियों के आत्मसम्मान की कोई कद्र नहीं बची है। जिन खिलाड़ियों ने सालों तक अपने पसीने और खून से देश को अनगिनत मैच जिताए, उन्हें आज चंद खराब पारियों या एक-दो सीरीज की नाकामी के बाद बिना किसी सम्मान के किनारे कर दिया जा रहा है। पूर्व खिलाड़ियों का आरोप है कि बोर्ड में बैठे उच्चाधिकारी और बिना रणनीतिक सोच वाली चयन समितियां अपनी कुर्सियां बचाने के लिए सीनियर खिलाड़ियों को निशाना बनाती हैं।
हालिया उदाहरणों का जिक्र करते हुए दिग्गजों ने कहा कि बाबर आजम और शाहीन अफरीदी जैसे विश्वस्तरीय मैच विनर्स के साथ जिस तरह का बर्ताव किया गया, वह दुनिया के किसी भी अन्य पेशेवर क्रिकेट बोर्ड में देखने को नहीं मिलता। दुनिया की शीर्ष टीमें अपने बड़े खिलाड़ियों के खराब दौर में उनके साथ खड़ी होती हैं, उन्हें तकनीकी और मानसिक रूप से मजबूत बनाती हैं, लेकिन पाकिस्तान में खिलाड़ियों के फॉर्म में गिरावट आते ही उन्हें सार्वजनिक रूप से अपमानित कर टीम से निकाल दिया जाता है। इस 'यूज एंड थ्रो' संस्कृति ने राष्ट्रीय ड्रेसिंग रूम के भीतर एक बेहद असुरक्षित और तनावपूर्ण माहौल पैदा कर दिया है।
ड्रेसिंग रूम का टूटा विश्वास और बोर्ड की तानाशाही पर सवाल
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे घातक असर पाकिस्तानी टीम के ड्रेसिंग रूम कल्चर पर पड़ा है। जब टीम के सबसे बड़े सुपरस्टार्स को यह भरोसा नहीं है कि उनका स्थान कल सुरक्षित रहेगा या नहीं, तो ऐसी स्थिति में युवा और नए खिलाड़ियों के भीतर असुरक्षा की भावना चरम पर पहुंच चुकी है। पूर्व खिलाड़ियों के अनुसार, बोर्ड में लगातार होने वाले राजनीतिक हस्तक्षेप और अध्यक्षों के बार-बार बदलने से पूरी व्यवस्था चरमरा गई है। हर नया अध्यक्ष अपनी मर्जी से कप्तान, कोच और चीफ सिलेक्टर बदलता है, जिससे खिलाड़ियों के मन में बोर्ड के प्रति विश्वास पूरी तरह खत्म हो चुका है।
सीनियर खिलाड़ियों के खिलाफ सेंट्रल कॉन्ट्रैक्ट में कटौती, शो-कॉज नोटिस जारी करने की धमकियां और विदेशी लीग्स में खेलने के लिए एनओसी (No Objection Certificate) रोकने जैसे कदमों को पूर्व क्रिकेटरों ने बोर्ड की तानाशाही करार दिया है। फखर जमां जैसे निस्वार्थ खिलाड़ी, जिन्होंने हमेशा टीम के लिए ओपनिंग से लेकर मध्यक्रम तक किसी भी स्थान पर खेलने का त्याग किया, उनके साथ हुए हालिया विवाद ने यह साबित कर दिया है कि पीसीबी सच बोलने वाले खिलाड़ियों को बर्दाश्त नहीं कर पाता।
इतिहास गवाह है: इमरान खान, वसीम अकरम से लेकर यूनिस खान तक किसी को नहीं मिला सम्मान
पाकिस्तान क्रिकेट का यह काला इतिहास कोई नया नहीं है। अगर अतीत के पन्नों को पलटकर देखा जाए, तो पाकिस्तान के लगभग हर महान क्रिकेटर का अंत बेहद दुखद और विवादित रहा है। 1992 विश्व कप विजेता कप्तान इमरान खान के संन्यास के बाद से लेकर वसीम अकरम, वकार यूनिस, शोएब अख्तर, जावेद मियांदाद, मोहम्मद यूसुफ, अब्दुल रज्जाक और शाहिद अफरीदी जैसे सर्वकालिक महान खिलाड़ियों को कभी भी एक गरिमापूर्ण और सम्मानजनक विदाई का मौका नहीं दिया गया।
यूनिस खान और मिस्बाह-उल-हक जैसे शांत और अनुशासित कप्तानों को भी अपने करियर के अंतिम पड़ाव में बोर्ड की गंदी राजनीति का शिकार होना पड़ा था। पूर्व दिग्गजों का कहना है कि जब देश अपने सबसे बड़े प्रतीकों को इज्जत नहीं दे सकता, तो नई पीढ़ी के युवा क्रिकेटर कभी भी देश के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने की प्रेरणा कैसे हासिल करेंगे। यह परंपरा आज की पीढ़ी के बाबर आजम, शाहीन अफरीदी और मोहम्मद रिजवान के साथ भी हूबहू दोहराई जा रही है।
गलत समय पर युवाओं पर बोझ: टीम का पतन और घरेलू क्रिकेट की बदहाली
पूर्व क्रिकेटरों ने इस बात पर भी गंभीर चिंता जताई कि सीनियर खिलाड़ियों को अचानक बाहर करके बिना पूरी तैयारी के युवा खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट की भट्टी में झोंकना दोनों के साथ नाइंसाफी है। युवा खिलाड़ियों को सीनियरों के मार्गदर्शन और ड्रेसिंग रूम के अनुभव की सख्त जरूरत होती है। जब आप रातोंरात पूरी कोर टीम को बदल देते हैं, तो युवा खिलाड़ी दबाव के क्षणों में बिखर जाते हैं, जिससे उनका आत्मविश्वास भी हमेशा के लिए टूट जाता है।
इसके अलावा, घरेलू क्रिकेट के ढांचे में लगातार होने वाले बदलावों ने स्थिति को और बदतर बना दिया है। डिपार्टमेंटल क्रिकेट को कभी बंद करना, कभी फिर से चालू करना, नए टूर्नामेंट्स लाकर बिना प्लानिंग के लागू कर देना पीसीबी की दिशाहीनता को दर्शाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक फर्स्ट क्लास क्रिकेट मजबूत नहीं होगा और खिलाड़ियों के चयन में पारदर्शिता नहीं आएगी, तब तक पाकिस्तान की टीम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सिर्फ हंसी का पात्र बनती रहेगी।
पीसीबी मैनेजमेंट और चयन समिति को आत्ममंथन की सख्त जरूरत
पूर्व दिग्गजों ने पीसीबी अध्यक्ष मोहसिन नकवी और वरिष्ठ चयनकर्ताओं को आईना दिखाते हुए कहा है कि उन्हें अपनी जिद और तानाशाही रवैये को छोड़कर खिलाड़ियों के साथ संवाद स्थापित करना चाहिए। क्रिकेट मैदान पर बल्ले और गेंद से खेला जाता है, बोर्ड के वातानुकूलित कमरों में बैठकर फरमान जारी करने से मैच नहीं जीते जाते। यदि पाकिस्तान क्रिकेट को अपने अस्तित्व के सबसे बड़े संकट से बाहर निकालना है, तो बोर्ड को अपने खिलाड़ियों के साथ एक संरक्षक (गार्डियन) की तरह पेश आना होगा, न कि एक क्रूर मालिक की तरह।
वरिष्ठ खिलाड़ियों का सम्मान बहाल करना, एक पारदर्शी और स्थिर चयन नीति बनाना, और कप्तानी को म्यूजिकल चेयर का खेल बनाने से रोकना ही इस पतन को थामने का एकमात्र रास्ता है। अगर पीसीबी ने अब भी अपनी गलतियों से सबक नहीं लिया, तो आने वाले समय में पाकिस्तान का हाल भी जिम्बाब्वे या वेस्टइंडीज जैसा होने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा।