सीओ जियाउल हक मर्डर केस में राजा भैया को बड़ी राहत: CBI की फाइनल रिपोर्ट को कोर्ट ने दी मंजूरी, खारिज की आगे की कार्रवाई

सीओ जियाउल हक मर्डर केस में राजा भैया को बड़ी राहत: CBI की फाइनल रिपोर्ट को कोर्ट ने दी मंजूरी, खारिज की आगे की कार्रवाई

उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के कुंडा में साल 2013 में हुए बहुचर्चित पुलिस उपाधीक्षक (सीओ) जियाउल हक हत्याकांड मामले में जनसत्ता दल (लोकतांत्रिक) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और कुंडा से विधायक रघुराज प्रताप सिंह उर्फ 'राजा भैया' को अदालत से बहुत बड़ी कानूनी राहत मिल गई है। लखनऊ स्थित विशेष सीबीआई अदालत की विशेष न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रतिभा सिंह ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) द्वारा मामले की दोबारा जांच के बाद दाखिल की गई अंतिम रिपोर्ट (क्लोजर रिपोर्ट) को विधिवत स्वीकार कर लिया है। इसके साथ ही अदालत ने राजा भैया के खिलाफ मामले में किसी भी प्रकार की आगे की न्यायिक या दंडात्मक कार्रवाई चलाने की मांग को सिरे से खारिज कर दिया है। अदालत के इस फैसले के साथ ही राजा भैया की कथित संलिप्तता को लेकर पिछले एक दशक से अधिक समय से चल रही लंबी कानूनी खींचतान पर प्रभावी विराम लग गया है।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर हुई थी दोबारा जांच, नहीं मिले कोई ठोस साक्ष्य

इस बहुचर्चित हत्याकांड के बाद शहीद सीओ जियाउल हक की पत्नी परवीन आजाद ने राजा भैया समेत उनके कुछ करीबियों के खिलाफ हत्या की साजिश का आरोप लगाते हुए नामजद एफआईआर दर्ज कराई थी। सीबीआई ने प्राथमिक विवेचना के बाद राजा भैया के खिलाफ कोई सबूत न मिलने की बात कहते हुए क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की थी। हालांकि, परवीन आजाद ने उस रिपोर्ट का विरोध किया और कानूनी लड़ाई लड़ते हुए मामला देश की शीर्ष अदालत (सुप्रीम कोर्ट) तक ले गईं। सुप्रीम कोर्ट के कड़े निर्देश के बाद सीबीआई ने इस पूरे प्रकरण में राजा भैया की भूमिका की नए सिरे से व्यापक और गहन री-इन्वेस्टिगेशन शुरू की थी। केंद्रीय जांच एजेंसी ने अपनी विस्तृत पुनर्विचार जांच पूरी करने के बाद अदालत में दोबारा क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की और स्पष्ट किया कि राजा भैया के खिलाफ आपराधिक षड्यंत्र रचने या हत्याकांड में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष भागीदारी का कोई भी दस्तावेजी, इलेक्ट्रॉनिक या प्रत्यक्षदर्शी साक्ष्य मौजूद नहीं है।

अदालत ने रिकॉर्ड और तकनीकी रिपोर्ट का परीक्षण कर खारिज की याचिका

विशेष सीबीआई अदालत ने दोनों पक्षों की लंबी दलीलें सुनने के बाद केस डायरी, फॉरेंसिक साक्ष्य, विशेषज्ञ राय और सीबीआई की अंतिम रिपोर्ट का बारीकी से परीक्षण किया। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री और सीबीआई की निष्पक्ष विवेचना को देखते हुए शिकायतकर्ता द्वारा उठाए गए तर्कों को पर्याप्त कानूनी आधार नहीं मिलता। इस आधार पर कोर्ट ने राजा भैया के खिलाफ अभियोजन चलाने से इनकार करते हुए सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट पर मुहर लगा दी। फैसले के बाद राजा भैया के विधिक सलाहकारों और समर्थकों ने इसे सत्य की विजय करार दिया है और कहा है कि पूर्व कैबिनेट मंत्री पर लगाए गए आरोप शुरू से ही पूरी तरह निराधार और राजनीति से प्रेरित थे।

2 मार्च 2013 की वो खौफनाक रात: बलीपुर गांव में हुआ था तिहरा हत्याकांड

प्रतापगढ़ के कुंडा थाना क्षेत्र स्थित बलीपुर गांव में 2 मार्च 2013 को यह खौफनाक घटनाक्रम हुआ था। सबसे पहले गांव के ग्राम प्रधान नन्हे यादव की चुनावी रंजिश में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी, जिसके बाद गांव में भारी तनाव फैल गया। सूचना मिलते ही जब तत्कालीन सीओ जियाउल हक भारी पुलिस बल के साथ स्थिति को संभालने पहुंचे, तो वहां नन्हे यादव के भाई सुरेश यादव की भी गोली लगने से मौत हो गई। इसके बाद उग्र भीड़ ने पुलिस टीम पर लाठी-डंडों और हथियारों से जानलेवा हमला बोल दिया था। इस दौरान अन्य पुलिसकर्मी मौके से हट गए और सीओ जियाउल हक हिंसक भीड़ के बीच अकेले घिर गए, जहां पीट-पीटकर और गोली मारकर उनकी नृशंस हत्या कर दी गई थी। इस घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था और तत्कालीन अखिलेश यादव सरकार में भारी राजनीतिक दबाव के चलते राजा भैया को अपने मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था।

10 दोषियों को पहले ही हो चुकी है उम्रकैद, मूल केस में फैसला आ चुका

सीओ जियाउल हक हत्याकांड में सीबीआई की विशेष अदालत पहले ही मुख्य मुकदमे की सुनवाई पूरी कर चुकी है। अक्टूबर 2024 में अदालत ने इस हत्याकांड में शामिल 10 प्रमुख आरोपियों—फूलचंद यादव, पवन यादव, मंजीत यादव, घनश्याम सरोज, राम लखन गौतम, छोटेलाल यादव, राम आसरे, मुन्ना पटेल, शिवराम पासी और जगत बहादुर पाल उर्फ बुल्ले पाल को दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास (उम्रकैद) की कठोर सजा सुनाई थी। वहीं एक अन्य आरोपी सुधीर यादव को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया गया था। अब विशेष सीबीआई अदालत द्वारा राजा भैया की भूमिका पर सीबीआई की दोबारा जांच वाली क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार किए जाने से इस बहुचर्चित मुकदमे का सबसे संवेदनशील राजनीतिक अध्याय भी कानूनी रूप से समाप्त हो गया है।

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