10वीं फेल उपकार लूथरा ऐसे बना 'चिल्लर किंग': सहारनपुर में 17 करोड़ के नकली सिक्कों की फैक्ट्री का भंडाफोड़
उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों ने जाली मुद्रा के एक ऐसे अनोखे और बड़े सिंडिकेट का भंडाफोड़ किया है, जिसके तार कई राज्यों से लेकर नेपाल तक जुड़े हुए हैं। आमतौर पर जाली नोटों के तस्कर 500 रुपये के नोट छापने में सक्रिय रहते हैं, लेकिन इस गिरोह के मास्टरमाइंड ने कानून की नजरों से बचने के लिए चिल्लर यानी सिक्कों को अपना जरिया बनाया। महज 10वीं तक पढ़ा उपकार लूथरा उर्फ अभय प्रताप सिंह नकली सिक्के बनाकर अपराध जगत में 'चिल्लर किंग' बन बैठा था। सहारनपुर पुलिस ने कार्रवाई करते हुए इस अवैध टकसाल से पांच आरोपियों को गिरफ्तार किया है और करोड़ों रुपये के तैयार व अधबने नकली सिक्के, भारी मशीनें और डाई बरामद की हैं। पुलिस के मुताबिक, यह गिरोह अब तक बाजार में 70 करोड़ रुपये से ज्यादा के नकली सिक्के खपा चुका है।
उत्तम नगर की चोरी से शुरू हुआ सफर, तिहाड़ जेल में पड़ी सिंडिकेट की नींव
पुलिस की प्राथमिक पूछताछ में इस अंतरराज्यीय गिरोह के सरगना उपकार लूथरा के आपराधिक सफर की कई चौंकाने वाली परतें खुली हैं। शुरुआती दिनों में दिल्ली के उत्तम नगर स्थित एक ज्वैलरी शॉप में चोरी के बाद उसका नाम सामने आया था। इसके बाद उसने कपड़ों की दुकान खोली, लेकिन व्यापार ठप हो गया।
वर्ष 1997 में उसकी मुलाकात देहरादून निवासी गुलशन गंभीर से हुई, जिसने उसे नकली सिक्के ढालने और डाई बनाने का हुनर सिखाया। 1999 में कनॉट प्लेस पुलिस और बाद में 2017 में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने एक लाख के इनामी लूथरा को हरियाणा से गिरफ्तार किया था। पुलिस के अनुसार, तिहाड़ जेल में रहने के दौरान उपकार की मुलाकात सहारनपुर के हिमांशु उर्फ गुल्लू से हुई। जेल से बाहर आने के बाद दोनों ने मिलकर सहारनपुर में एक गुप्त फैक्ट्री स्थापित की, जहां से बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू किया गया।
छह रुपये की लागत में बनता था 20 का सिक्का, 12 से 15 रुपये में एजेंटों को सप्लाई
पुलिस जांच में नकली सिक्कों के इस काले कारोबार के अर्थशास्त्र का भी खुलासा हुआ है। फैक्ट्री में आधुनिक छह मशीनों और 59 डाई की मदद से रोजाना 10 से 12 हजार नकली सिक्के तैयार करने का सेटअप तैयार किया गया था।
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₹20 का एक नकली सिक्का तैयार करने में कच्चे माल, बिजली और मेटल की कुल लागत करीब ₹5 से ₹6 आती थी।
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तैयार सिक्के को गिरोह के एजेंटों को ₹12 से ₹15 प्रति सिक्के की दर से थोक में बेचा जाता था।
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एजेंट इसे बाजार में असली मुद्रा (₹20 मूल्य) के रूप में चलाकर प्रति सिक्के पर ₹5 से ₹8 का मोटा मुनाफा कमाते थे।
शराब के ठेकों, टोल प्लाजा और किराना दुकानों पर खपाते थे चिल्लर
जांच में सामने आया है कि गिरोह कभी भी खुद सीधे बाजार में जाकर सिक्के नहीं चलाता था। इसके लिए उन्होंने एजेंटों की एक लंबी चेन बनाई हुई थी। नकली 20 रुपये के सिक्के खपाने के लिए सबसे आसान और सुरक्षित ठिकाना शराब के ठेके, हाईवे के टोल प्लाजा, पेट्रोल पंप और व्यस्त किराना मंडियां होती थीं।
शराब के ठेकों और टोल प्लाजा पर नकदी का भारी लेनदेन होता है और भारी भीड़ के चलते कोई भी चिल्लर की प्रामाणिकता की बारीकी से जांच नहीं करता। एजेंट 20 के इन सिक्कों को शराब की बोतलों के बदले चिल्लर लौटाने या टोल टैक्स के खुले पैसे देने में आसानी से चला देते थे।
सात रजिस्टर और आठ मोबाइल से खुलेंगे एजेंटों के नाम
सहारनपुर पुलिस ने मौके से 6400 तैयार नकली सिक्के, करीब 5 लाख रुपये के अधबने सिक्के, डाई, डाई पॉलिश मशीन, घिसाई पत्थर, वजन कांटा और हीटिंग ओवन जब्त किए हैं। इसके साथ ही पुलिस को मौके से सात महत्वपूर्ण रजिस्टर और आठ मोबाइल फोन मिले हैं।
इन रजिस्टरों में कोडवर्ड में सिक्कों की डिलीवरी, एजेंटों के नाम और पैसों के लेनदेन का पूरा हिसाब दर्ज है। पुलिस अब फॉरेंसिक और साइबर सेल की मदद से उन सभी एजेंटों और व्यापारियों की सूची तैयार कर रही है, जिन्होंने कमीशन के लालच में इस सिंडिकेट से नकली सिक्के खरीदे थे।