नेपाल में जलप्रलय के बीच मसीहा बना स्कूल प्रिंसिपल: मात्र 10 मिनट के अंदर 900 मासूमों को मौत के मुंह से निकाला बाहर
पहाड़ों से उतरती विनाशकारी जलधारा और चारों तरफ मची चीख-पुकार के बीच नेपाल के एक सुदूर इलाके में स्थित विद्यालय में आम दिनों की तरह ही कक्षाएं चल रही थीं। बच्चे अपनी किताबों में व्यस्त थे और शिक्षक पाठ समझाने में लीन थे। किसी को भी यह अंदाजा नहीं था कि अगले कुछ पलों में प्रकृति अपना सबसे भयानक रूप दिखाने वाली है। लगातार हो रही मूसलाधार बारिश की वजह से पास ही बहने वाली पहाड़ी नदी ने विकराल रूप धारण कर लिया था। नदी का जलस्तर इतनी तेजी से बढ़ा कि चंद मिनटों में ही बाढ़ का मटमैला पानी स्कूल के मुख्य द्वार को तोड़ते हुए परिसर में दाखिल होने लगा।
खतरे की पहली आहट और 10 मिनट का जीवन रक्षक निर्णय
जैसे ही स्कूल के प्रिंसिपल ने कार्यालय की खिड़की से नदी के जलस्तर को खतरे के निशान से ऊपर जाते देखा, उन्होंने बिना एक भी सेकंड गंवाए खतरे का सायरन बजाने का आदेश दिया। आमतौर पर ऐसी परिस्थितियों में भगदड़ मचने का सबसे बड़ा खतरा रहता है, जिससे जान-माल का नुकसान कई गुना बढ़ जाता है। प्रिंसिपल ने तुरंत अपनी आपातकालीन योजना को लागू किया और पूरे स्टाफ को शांत रहकर तेजी से काम करने के निर्देश दिए।
प्राथमिक कक्षाओं के नन्हें बच्चों से लेकर उच्च कक्षाओं के किशोरों तक, कुल 900 छात्र स्कूल परिसर के अंदर मौजूद थे। पानी घुटनों तक आ चुका था और उसका बहाव हर सेकंड तेज हो रहा था। प्रिंसिपल ने सभी शिक्षकों को कमरों के बाहर तैनात किया और बड़ी कक्षाओं के छात्रों को छोटे बच्चों का हाथ पकड़कर कतारबद्ध तरीके से बाहर निकालने का जिम्मा सौंपा।
बिना भगदड़ के 900 बच्चों का सुरक्षित रेस्क्यू
प्रिंसिपल खुद कमर तक पानी में उतर गए और स्कूल के सबसे निचले हिस्से की कक्षाओं की ओर दौड़े। वहां पानी सबसे पहले भर रहा था। उन्होंने शिक्षकों के साथ मिलकर बच्चों को एक-एक कर सुरक्षित ऊंचे टीले और पास के पक्के सामुदायिक भवन की तरफ भेजना शुरू किया।
इस रेस्क्यू की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि पूरे घटनाक्रम के दौरान किसी भी बच्चे में दहशत नहीं फैलने दी गई। शिक्षकों ने बच्चों को यह विश्वास दिलाया कि यह केवल एक सुरक्षा ड्रिल है, जिससे बच्चे घबराए नहीं और अनुशासित तरीके से एक-दूसरे का हाथ थामे सुरक्षित मार्ग से बाहर निकलते रहे। महज 10 मिनट के भीतर स्कूल की सभी कक्षाओं को पूरी तरह खाली करवा लिया गया। जैसे ही आखिरी बच्चा सुरक्षित ऊंचाई वाले स्थान पर पहुंचा, स्कूल की चारदीवारी का एक बड़ा हिस्सा पानी के तेज बहाव में ढह गया।
माता-पिता की आंखों में आंसू और पूरे इलाके में गूंजी बहादुरी की दास्तान
बाढ़ की खबर मिलते ही गांव और आसपास के इलाकों से बदहवास माता-पिता स्कूल की तरफ दौड़ पड़े थे। हर किसी के चेहरे पर अपने जिगर के टुकड़े को खोने का डर साफ झलक रहा था। जब वे मौके पर पहुंचे और देखा कि सभी 900 बच्चे सुरक्षित स्थान पर खड़े हैं, तो हर आंख से खुशी और कृतज्ञता के आंसू बह निकले। ग्रामीणों ने प्रिंसिपल और शिक्षकों को कंधों पर उठा लिया।
स्थानीय प्रशासन और राहत-बचाव दल जब तक मौके पर पहुंचे, तब तक प्रिंसिपल और उनके स्टाफ की बदौलत सबसे बड़ा खतरा टल चुका था। जिला आपदा प्रबंधन अधिकारियों ने मौके का मुआयना करने के बाद कहा कि अगर फैसले लेने में 2 से 3 मिनट की भी देरी होती, तो यह एक भयावह मानवीय त्रासदी में बदल सकता था।
पहाड़ी और बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के लिए बना प्रेरणादायक मॉडल
नेपाल और उससे सटे भारतीय सीमावर्ती क्षेत्रों में मानसूनी सीजन के दौरान बादल फटने, भूस्खलन और अचानक बाढ़ (फ्लैश फ्लड) आने का खतरा लगातार बना रहता है। ऐसे भौगोलिक क्षेत्रों में स्थित शिक्षण संस्थानों के लिए यह घटना एक बेहतरीन सबक प्रस्तुत करती है।
प्रिंसिपल द्वारा दिखाई गई त्वरित निर्णय क्षमता, शांत दिमाग से संकट का सामना करना और छात्रों के बीच पूर्व-नियोजित अनुशासन का होना ही वह मूल मंत्र साबित हुआ जिसने 900 परिवारों के चिरागों को बुझने से बचा लिया। आज पूरा देश इस जांबाज शिक्षक की सूझबूझ और कर्तव्यनिष्ठा को सलाम कर रहा है।