'पानी को हथियार बना सकता है भारत', सिंधु समझौते पर क्यों कांप रहा है पाकिस्तान? जानें शहबाज के मंत्री के बयान और 'वॉटर स्ट्राइक' के डर की पूरी इनसाइड स्टोरी

'पानी को हथियार बना सकता है भारत', सिंधु समझौते पर क्यों कांप रहा है पाकिस्तान? जानें शहबाज के मंत्री के बयान और 'वॉटर स्ट्राइक' के डर की पूरी इनसाइड स्टोरी

परमाणु हथियारों की धौंस दिखाने वाले और वर्षों से सीमा पार आतंकवाद को हवा देने वाले पाकिस्तान के हुक्मरानों के माथे पर इन दिनों एक नए और भयानक संकट की लकीरें खिंची हुई हैं। यह डर किसी पारंपरिक युद्ध या हवाई हमले का नहीं, बल्कि 'जल युद्ध' (Water War) का है। पाकिस्तान की शहबाज शरीफ सरकार के वरिष्ठ मंत्री अहसान इकबाल ने एक वैश्विक मंच पर खुलकर यह आशंका जाहिर की है कि भारत पानी की आपूर्ति को नियंत्रित कर उसे एक रणनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर सकता है। इस्लामाबाद में बैठे रणनीतिकारों और राजनेताओं की रातों की नींद इस बात से उड़ी हुई है कि यदि भारत ने सिंधु नदी तंत्र (Indus River Basin) की पश्चिमी नदियों के बहाव में थोड़ा सा भी फेरबदल किया, तो पाकिस्तान की कृषि व्यवस्था, खाद्यान्न सुरक्षा और अर्थव्यवस्था ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगी।

पाकिस्तानी मंत्री का छलका दर्द: 'पानी को हथियार बना सकता है भारत'

एशिया सोसाइटी के एक वैश्विक कार्यक्रम में बोलते हुए पाकिस्तान के योजना एवं विकास मंत्री अहसान इकबाल ने भारत के खिलाफ अपना गहरा डर व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि आधुनिक इतिहास में पहली बार पाकिस्तान इस वास्तविक खतरे का सामना कर रहा है कि भारत जल आपूर्ति को रोककर या अचानक पानी छोड़कर 'वॉटर वेपन' की तरह प्रयोग कर सकता है। अहसान इकबाल ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि जब पाकिस्तान को फसलों की सिंचाई के लिए पानी की सख्त जरूरत होगी, तब पानी की आपूर्ति घटाई जा सकती है और जब मांग नहीं होगी या मॉनसून का मौसम होगा, तब अतिरिक्त पानी छोड़कर बाढ़ की स्थिति बनाई जा सकती है।

इससे पहले खुद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने भी कड़े शब्दों में कहा था कि पानी की हर एक बूंद पाकिस्तान के लिए 'रेड लाइन' है और यदि पानी रोका गया तो इसका सीधा जवाब दिया जाएगा। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि बयानबाजी से इतर पाकिस्तान के पास भारत के इस रणनीतिक बढ़त का मुकाबला करने के लिए कोई ठोस बुनियादी ढांचा मौजूद नहीं है, जिसके कारण इस्लामाबाद लगातार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बेचैनी दिखा रहा है।

पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत का कड़ा रुख: 'खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते'

भारत और पाकिस्तान के बीच जल संबंधों में यह ऐतिहासिक मोड़ तब आया जब अप्रैल 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए कायरतापूर्ण आतंकी हमले के बाद भारत सरकार ने 1960 की सिंधु जल संधि (IWT) को आधिकारिक रूप से स्थगित (Abeyance) करने का कड़ा फैसला किया। भारत ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय और पाकिस्तान को दो टूक संदेश दिया कि आतंकवाद और कूटनीतिक सहयोग एक साथ नहीं चल सकते। भारत का स्पष्ट सिद्धांत रहा है कि 'खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते।'

भारत ने 'वियना कन्वेंशन ऑन द लॉ ऑफ ट्रीटीज' (VCLT) के अनुच्छेद 60 के प्रावधानों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि जब एक पक्ष सीमा पार आतंकवाद और शत्रुतापूर्ण गतिविधियों के जरिए संधि की मूल भावना का लगातार उल्लंघन करता है, तो दूसरे पक्ष को संधि को निलंबित करने का पूरा अधिकार है। इसके बाद से ही भारत ने जम्मू-कश्मीर में पश्चिमी नदियों पर अपने जलविद्युत और स्टोरेज प्रोजेक्ट्स की गति को तेज कर दिया है, जिससे पाकिस्तान में हड़कंप मचा हुआ है।

1960 की सिंधु जल संधि और भारत का भौगोलिक 'अपर-रिपेरियन' एडवांटेज

1960 में विश्व बैंक की मध्यस्थता से हुई सिंधु जल संधि के तहत छह प्रमुख नदियों के पानी का बंटवारा किया गया था। इसके तहत तीन पूर्वी नदियों—रावी, ब्यास और सतलुज के पानी पर भारत को पूर्ण अधिकार मिला, जबकि तीन पश्चिमी नदियों—सिंधु, झेलम और चिनाब का अधिकांश पानी पाकिस्तान के हिस्से में गया। भारत को इन पश्चिमी नदियों पर बिना पानी रोके (Run-of-the-river) पनबिजली परियोजनाएं बनाने और सीमित कृषि उपयोग की छूट दी गई थी।

भौगोलिक दृष्टि से भारत एक 'अपर-रिपेरियन' (ऊपरी बहाव वाला) देश है, जिसका अर्थ है कि सभी छह नदियां पहले भारत से होकर ही पाकिस्तान में प्रवेश करती हैं। भारत ने पिछले कुछ वर्षों में किशनगंगा, रतले, सलाल, दुलहस्ती और शाहपुर कांडी जैसी अत्याधुनिक जलविद्युत परियोजनाओं को तेजी से पूरा कर अपनी तकनीकी क्षमता को कई गुना बढ़ा लिया है। यदि भारत इन नदियों पर पानी के बहाव को नियंत्रित करने या डिसिल्टिंग (गाद निकालने) के लिए गेट खोलने का निर्णय लेता है, तो इसका सीधा असर निचले इलाके यानी पाकिस्तान पर पड़ना तय है।

पाकिस्तान में क्यों मचा है भारी संकट? 90 दिन की स्टोरेज और सूखती फसलें

पाकिस्तान का यह डर केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि जमीनी हकीकत से जुड़ा है। पाकिस्तान की कुल कृषि भूमि का 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा सीधे तौर पर सिंधु नदी और उसकी सहायक नदियों की नहरों पर निर्भर करता है। पाकिस्तान की संपूर्ण अर्थव्यवस्था और उसकी 24 करोड़ से अधिक आबादी का पेट भरने वाले पंजाब और सिंध प्रांत पूरी तरह से इसी जल प्रणाली से संचालित होते हैं।

पाकिस्तान के योजना मंत्रालय द्वारा जारी हालिया आंकड़ों के मुताबिक, देश में जल भंडारण (वॉटर स्टोरेज) की क्षमता घटकर महज 90 दिनों की रह गई है। जबकि वैश्विक मानक 300 दिनों का है और इसी तरह की अन्य एशियाई अर्थव्यवस्थाओं के पास 120 से 150 दिनों का पानी जमा रखने की क्षमता होती है। पाकिस्तान अपने आंतरिक राजनीतिक विवादों—खासकर पंजाब और सिंध प्रांत के बीच पानी के झगड़ों और अक्षमता के कारण पिछले सात दशकों में बड़े बांध बनाने में नाकाम रहा है। नतीजतन, वह भारत से मिलने वाले अपने हिस्से के 45% से अधिक पानी को बिना इस्तेमाल किए अरब सागर में बहा देता है। ऐसे में यदि भारत पानी के बहाव को कुछ दिनों के लिए भी धीमा कर दे, तो पाकिस्तान में भयंकर सूखा, फसलों की बर्बादी और बड़े पैमाने पर बिजली संकट (ब्लैकआउट) पैदा हो सकता है।

दुनिया के सामने गिड़गिड़ाता इस्लामाबाद: अंतरराष्ट्रीय मंचों पर नहीं मिल रही राहत

अपनी इसी लाचारी को छिपाने के लिए पाकिस्तान पिछले कुछ महीनों से अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता अदालत (Court of Arbitration), संयुक्त राष्ट्र (UN) और यूरोपीय संघ में जाकर गुहार लगा रहा है कि भारत सिंधु जल संधि का उल्लंघन कर रहा है। ब्रुसेल्स और अन्य वैश्विक मंचों पर पाकिस्तान ने सेमिनार आयोजित कर यह साबित करने की कोशिश की कि जल संसाधनों का राजनीतिकरण किया जा रहा है।

हालांकि, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान की इस दलील को ज्यादा समर्थन नहीं मिल रहा है। भारत ने साफ कर दिया है कि हेग की कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन का गठन एकतरफा और अवैध है और जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद पर पूरी तरह लगाम नहीं लगाता, तब तक द्विपक्षीय संधियों को सामान्य तरीके से चलाना संभव नहीं है। दुनिया के अधिकांश प्रमुख देश भी इस बात से सहमत हैं कि आतंकवाद को पनाह देने वाला मुल्क अंतरराष्ट्रीय सहयोग और संधियों की आड़ में अपनी सुरक्षा की उम्मीद नहीं कर सकता।

दक्षिण एशिया में भारत की निर्विवाद केंद्रीय भूमिका और भविष्य का समीकरण

अहसान इकबाल ने अपने भाषण में एक और बेहद अहम बात स्वीकार की, जिसने पाकिस्तान के पारंपरिक रुख को बदल कर रख दिया। उन्होंने माना कि दक्षिण एशिया के नक्शे में भारत बिल्कुल केंद्र (Center) में स्थित है और बाकी सभी देश उसकी परिधि पर हैं। उन्होंने कहा कि पूरे क्षेत्र की स्थिरता और कामकाज के लिए भारत की सकारात्मक भूमिका सबसे अनिवार्य है। यह बयान इस बात का साफ प्रमाण है कि पाकिस्तान भी अब यह मानने को मजबूर हो गया है कि वह भारत की विशाल भौगोलिक और आर्थिक शक्ति को नजरअंदाज नहीं कर सकता।

भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि उसकी मंशा किसी निर्दोष नागरिक को प्यासा रखने की नहीं है, बल्कि वह अपने कानूनी अधिकारों का उपयोग करते हुए अपने किसानों, केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर और पंजाब के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता देगा। पाकिस्तान यदि सचमुच जल सुरक्षा चाहता है, तो उसे भारत पर आरोप लगाने के बजाय आतंकवाद की अपनी नीति को हमेशा के लिए त्यागना होगा, क्योंकि भारत अब अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा की कीमत पर कोई भी एकतरफा समझौता करने के मूड में बिल्कुल नहीं है।

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