गटागट पानी पीने के बाद भी सूख रहा है गला और बार-बार लग रही है प्यास? इसे सिर्फ गर्मी मानकर न करें नजरअंदाज
गर्मियों के मौसम में, धूप से आने के बाद, तीखा-मसालेदार खाना खाने पर या जिम में पसीना बहाने के बाद प्यास लगना मानव शरीर की एक बिल्कुल सामान्य और स्वाभाविक जैविक प्रक्रिया है। आमतौर पर ऐसा होने पर जब कोई व्यक्ति एक या दो गिलास पानी पी लेता है, तो मस्तिष्क के थर्स्ट सेंटर (Thirst Center) को तृप्ति का संदेश मिल जाता है और गला तर हो जाता है। लेकिन कई लोगों के साथ यह अजीबोगरीब स्थिति देखने को मिलती है कि वे लगातार पानी पीते रहते हैं, पेट पानी से पूरी तरह भर जाता है, फिर भी जुबान सूखी महसूस होती है और कुछ ही मिनटों में दोबारा पानी पीने की तीव्र इच्छा होने लगती है।
अधिकांश लोग इसे सामान्य डिहाइड्रेशन मानकर और अधिक पानी पीना शुरू कर देते हैं, जो स्थिति को सुधारने के बजाय और अधिक बिगाड़ सकता है। मानव शरीर का जलीय संतुलन (Fluid Balance) केवल इस बात पर निर्भर नहीं करता कि आपने कितने लीटर पानी पिया है, बल्कि यह इस बात पर टिका होता है कि आपकी कोशिकाओं और रक्त में पानी और जरूरी मिनरल्स का अनुपात क्या है। जब यह संतुलन बिगड़ता है, तो अत्यधिक पानी पीने के बावजूद दिमाग को लगातार प्यास का ही सिग्नल मिलता रहता है।
इलेक्ट्रोलाइट्स का असंतुलन: ज्यादा पानी कैसे कोशिकाओं से खींच लेता है जरूरी तत्व?
हमारे शरीर की हर जीवित कोशिका को सही ढंग से काम करने के लिए सिर्फ शुद्ध H2O यानी पानी की नहीं, बल्कि उसके साथ सोडियम, पोटैशियम, मैग्नीशियम और क्लोराइड जैसे आवश्यक इलेक्ट्रोलाइट्स की भी एक निश्चित मात्रा में आवश्यकता होती है। ये इलेक्ट्रोलाइट्स शरीर में विद्युत आवेश (Electrical Charge) पैदा करते हैं और कोशिकाओं के भीतर और बाहर तरल पदार्थों के दबाव यानी ऑस्मोटिक बैलेंस (Osmotic Balance) को नियंत्रित रखते हैं।
जब कोई व्यक्ति बहुत कम समय के अंतराल में जरूरत से ज्यादा पानी पी लेता है, तो रक्त में मौजूद सोडियम और अन्य मिनरल्स अत्यधिक डाइल्यूट (पतले) हो जाते हैं। इसे मेडिकल भाषा में 'डायल्यूशनल इफ़ेक्ट' कहा जाता है। जब खून में सोडियम का घनत्व गिर जाता है, तो शरीर का ऑस्मोरिसेप्टर सिस्टम भ्रमित हो जाता है। कोशिकाएं पानी को अपने भीतर रोककर रखने में असमर्थ होने लगती हैं और मस्तिष्क को यह आभास होने लगता है कि शरीर का फ्लूइड बैलेंस अभी भी सामान्य नहीं है। नतीजा यह होता है कि व्यक्ति का पेट पानी से लबालब भरा होने के बावजूद उसका तंत्रिका तंत्र बार-बार प्यास का अलार्म बजाता रहता है।
वॉटर इंटॉक्सिकेशन और हाइपोनेट्रेमिया: जब बहुत ज्यादा पानी पीना बन जाता है जानलेवा
अक्सर स्वास्थ्य जगत में 'खूब पानी पियो' का संदेश इतना ज्यादा प्रचारित कर दिया गया है कि लोग इसकी वैज्ञानिक सीमा को भूल जाते हैं। चिकित्सा विज्ञान में बहुत अधिक मात्रा में पानी पीने से पैदा होने वाली एक बेहद खतरनाक स्थिति को 'हाइपोनेट्रेमिया' (Hyponatremia) या आम बोलचाल में 'वॉटर इंटॉक्सिकेशन' कहा जाता है। यह स्थिति तब उत्पन्न होती है जब किडनी की पानी निकालने की सामान्य क्षमता (जो आमतौर पर प्रति घंटे 800 से 1000 मिलीलीटर होती है) से कहीं ज्यादा तेजी से पानी शरीर के भीतर उड़ेल दिया जाता है।
रक्त में सोडियम का स्तर जब 135 मिलीमोल प्रति लीटर से नीचे गिरता है, तो ऑस्मोसिस की प्रक्रिया के तहत अतिरिक्त पानी कोशिकाओं के भीतर घुसने लगता है, जिससे कोशिकाओं में सूजन आने लगती है। जब यह सूजन मस्तिष्क की कोशिकाओं (Brain Cells) में होती है, तो यह स्थिति सिरदर्द, भ्रम, मितली, अत्यधिक थकान और गंभीर मामलों में दौरे पड़ने या कोमा तक ले जा सकती है। दिलचस्प और हैरान करने वाली बात यह है कि हाइपोनेट्रेमिया के शुरुआती चरणों में मरीज को गला सूखने और विचित्र रूप से बेचैनी भरी प्यास का एहसास हो सकता है। यदि कोई व्यक्ति बिना प्यास के केवल 'टारगेट पूरा करने' के चक्कर में जबरन 5-6 लीटर पानी पी रहा है और फिर भी प्यासा महसूस कर रहा है, तो यह ओवर-हाइड्रेशन का सीधा संकेत हो सकता है।
हर पानी से नहीं मिलता एक जैसा हाइड्रेशन: मिनरल्स और टीडीएस की क्या है भूमिका?
हम जो पानी पीते हैं, उसकी गुणवत्ता और संरचना भी इस बात को तय करती है कि शरीर उसे कितनी कुशलता से अवशोषित करेगा। आज के शहरी जीवन में अधिकांश घरों में रिवर्स ऑस्मोसिस (RO) प्यूरीफायर का इस्तेमाल किया जाता है। आरओ तकनीक पानी से हानिकारक अशुद्धियों, भारी धातुओं और कीटनाशकों को तो साफ कर देती है, लेकिन इसके साथ ही यह पानी में प्राकृतिक रूप से घुले हुए जरूरी खनिजों जैसे कैल्शियम और मैग्नीशियम को भी बड़े पैमाने पर बाहर निकाल देती है। इसे 'डीमिनरलाइज्ड वाटर' या अत्यधिक लो-टीडीएस वाटर कहा जाता है।
जब आप ऐसा पानी पीते हैं जिसमें मिनरल्स का स्तर बेहद कम होता है, तो यह पानी आंतों से रक्तप्रवाह में तो तेजी से जाता है, लेकिन इलेक्ट्रोलाइट्स न होने के कारण कोशिकाएं इसे लंबे समय तक बांधकर नहीं रख पाती हैं। यह पानी सीधे किडनी के रास्ते पेशाब बनकर शरीर से बाहर निकल जाता है और अपने साथ शरीर में पहले से मौजूद थोड़े-बहुत मिनरल्स को भी बहा ले जाता है। यही कारण है कि शून्य या बहुत कम टीडीएस वाला पानी पीने के थोड़ी ही देर बाद दोबारा मुंह सूखने लगता है। प्राकृतिक झरनों, कुओं या सुरक्षित मटके का पानी जिसमें संतुलित खनिज होते हैं, वह शरीर को ज्यादा गहरा और स्थाई सेलुलर हाइड्रेशन प्रदान करता है।
पसीना, भीषण गर्मी और थकाऊ वर्कआउट: सिर्फ पानी नहीं, शरीर मांगता है संपूर्ण रीहाइड्रेशन
तेज चिलचिलाती धूप में लंबे समय तक रहने, कड़ी शारीरिक मेहनत करने या इंटेंस वर्कआउट के दौरान जब शरीर से पसीना बहता है, तो त्वचा के रोमछिद्रों से केवल पानी बाहर नहीं निकलता। पसीने का स्वाद नमकीन होता है क्योंकि उसके साथ भारी मात्रा में सोडियम, पोटैशियम और थोड़ा मैग्नीशियम भी शरीर से बाहर निकल जाता है।
ऐसी स्थिति में यदि कोई व्यक्ति केवल साधारण सादा पानी गटागट पी लेता है, तो वह पसीने से निकले पानी की भरपाई तो कर देता है, लेकिन खोए हुए इलेक्ट्रोलाइट्स की भरपाई शून्य रह जाती है। इससे शरीर के भीतर इलेक्ट्रोलाइट्स का अनुपात और ज्यादा बिगड़ जाता है, जिसे 'पसीना जनित हाइपोनेट्रेमिया' कहते हैं। ऐसी स्थिति में केवल पानी पीने से प्यास की संतुष्टि नहीं मिलती। यही वजह है कि स्पोर्ट्स साइंस और एथलीट गाइडलाइंस में वर्कआउट के बाद सादे पानी के बजाय ओआरएस (ORS), नींबू पानी में चुटकी भर सेंधा नमक, नारियल पानी या इलेक्ट्रोलाइट ड्रिंक पीने की सख्त सलाह दी जाती है ताकि पानी और नमक दोनों की एक साथ भरपाई हो सके।
कुछ दवाइयां, डायबिटीज और शारीरिक समस्याएं: जब प्यास बन जाए अंदरूनी बीमारी का आईना
हर बार बार-बार प्यास लगने का संबंध केवल पानी और नमक से ही नहीं होता, बल्कि कई बार यह कुछ अंदरूनी चिकित्सीय स्थितियों का पहला लक्षण हो सकता है:
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डायबिटिक पॉलीडिप्सिया (हाई ब्लड शुगर): यदि रक्त में ग्लूकोज (शुगर) का स्तर अनियंत्रित रूप से बढ़ जाता है, तो किडनी अतिरिक्त शुगर को पेशाब के रास्ते बाहर निकालने के लिए शरीर के सारे पानी का इस्तेमाल करने लगती है। इसके कारण मरीज को बार-बार पेशाब आता है और गला लगातार रेगिस्तान की तरह सूखा महसूस होता है। टाइप-1 और टाइप-2 डायबिटीज का यह सबसे क्लासिक और शुरुआती लक्षण है।
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डाययूरेटिक्स और ब्लड प्रेशर की दवाएं: उच्च रक्तचाप (हाइपरटेंशन), हार्ट फेलियर या किडनी की समस्याओं के लिए दी जाने वाली 'डाययूरेटिक' (वाटर पिल्स) दवाएं शरीर से अतिरिक्त तरल और नमक को पेशाब के जरिए तेजी से बाहर निकालती हैं, जिससे मरीज को हर समय तेज प्यास लग सकती है।
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एंटी-डिप्रेसेंट और एलर्जी की दवाएं: डिप्रेशन, एंग्जायटी, सर्दी-जुकाम की एंटीहिस्टामाइन और एसिडिटी की कुछ दवाएं मुंह में लार ग्रंथियों (Salivary Glands) के स्राव को सुखा देती हैं। इस स्थिति को 'जेरोस्टोमिया' (Dry Mouth) कहा जाता है। इसमें व्यक्ति को लगता है कि उसे प्यास लगी है, जबकि असल में उसकी लार बनना कम हो गई होती है।
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डायबिटीज इनसिपिडस: यह एक दुर्लभ हार्मोनल विकार है जो एंटी-डाययूरेटिक हार्मोन (ADH/Vasopressin) की कमी या किडनी द्वारा उसके प्रति संवेदनशीलता खो देने के कारण होता है। इसमें शरीर पानी को रोक ही नहीं पाता और मरीज दिन भर में 10 से 20 लीटर तक पेशाब करता है और लगातार भयानक प्यास से तड़पता रहता है।
कब इसे सामान्य मानकर नजरअंदाज न करें और क्या है सही हाइड्रेशन का नियम?
पानी पीने के बाद भी अगर कभी-कभार ऐसा महसूस हो कि गला पूरी तरह तर नहीं हुआ, तो यह तात्कालिक थकान, मौसम के रूखेपन या मुंह से सांस लेकर सोने (Mouth Breathing) की वजह से हो सकता है। लेकिन यदि यह सिलसिला कई दिनों या हफ्तों से लगातार बना हुआ है, तो इसे केवल 'गर्मी का असर' मानकर नजरअंदाज करना सेहत के साथ बड़ा खिलवाड़ हो सकता है।
यदि आपको बहुत अधिक प्यास लगने के साथ-साथ बार-बार पेशाब जाना पड़ रहा हो, रात में प्यास की वजह से नींद टूट रही हो, बिना किसी वजह के वजन घट रहा हो, सिर चकरा रहा हो या पैरों में कमजोरी महसूस हो रही हो, तो बिना देर किए डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। ऐसे मामलों में फास्टिंग ब्लड शुगर, एचबीए1सी (HbA1c), सीरम इलेक्ट्रोलाइट्स टेस्ट और यूरिन रूटीन जांच के जरिए असली वजह का तुरंत पता लगाया जा सकता है।
सेहतमंद रहने का नियम यह नहीं है कि घड़ी देखकर हर आधे घंटे में जबरन पानी पिया जाए, बल्कि शरीर के संकेतों को सुनना सबसे जरूरी है। जब स्वाभाविक प्यास लगे तभी पानी पिएं, पानी को हमेशा घूंट-घूंट (Sip by Sip) करके पिएं ताकि मुंह की लार उसमें मिल सके, और बहुत ज्यादा पसीना आने की स्थिति में सादे पानी की जगह नींबू-नमक का पानी या नारियल पानी को प्राथमिकता दें। शरीर संतुलन का नाम है, और जब पानी और मिनरल्स का यह संतुलन सही रहेगा, तो आपका गला भी तर रहेगा और शरीर भी पूरी तरह ऊर्जावान बना रहेगा।