बचपन के गहरे जख्म! यादों से निकलकर शरीर को कैसे बीमार कर देता है 'चाइल्डहुड ट्रॉमा'? डॉक्टरों ने दी चेतावनी
बचपन की तकलीफें और कड़वे अनुभव हमेशा सिर्फ यादों के धुंधलके तक सीमित नहीं रहते। कई बार उनका असर इंसान के शरीर और दिमाग पर इतनी गहराई से बैठ जाता है कि दशकों बाद भी लोग समझ नहीं पाते कि उनकी शारीरिक बीमारियों की असली शुरुआत आखिर कहां से हुई थी। मेडिकल साइंस की नई रिसर्च अब यह साफ तौर पर मानने लगी हैं कि बचपन में झेला गया डर, घरेलू हिंसा, माता-पिता की उपेक्षा या भावनात्मक अस्थिरता (Emotional Instability) बड़े होने के बाद गंभीर शारीरिक और मानसिक बीमारियों का मुख्य कारण बन सकती है। आइए जानते हैं कि बचपन के अनसुलझे तनाव कैसे बड़े होने पर हमारे शरीर को अंदर ही अंदर खोखला करने लगते हैं।
तमाम गंभीर शारीरिक बीमारियों की जड़ हैं बचपन के अनुभव
अक्सर लोग सालों तक माइग्रेन (आधे सिर का दर्द), पेट की पुरानी बीमारियों, नींद न आना, हर वक्त थकावट रहना, एंग्जायटी या पूरे शरीर में बेवजह दर्द (Fibromyalgia) जैसी समस्याओं का इलाज करवाते रहते हैं। तमाम महंगी दवाइयां खाने और रिपोर्ट्स नॉर्मल आने के बावजूद बीमारी ठीक नहीं होती। डॉक्टरों के अनुसार, इसकी असली वजह उनके बचपन के दर्दनाक अनुभव हो सकते हैं। आधुनिक विज्ञान अब यह साबित कर चुका है कि बचपन का ट्रॉमा (Childhood Trauma) सिर्फ एक मानसिक या इमोशनल समस्या नहीं है, बल्कि यह सीधे हमारे नर्वस सिस्टम, स्ट्रेस हार्मोन्स और रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) को हमेशा के लिए प्रभावित कर देता है।
जब मेडिकल रिपोर्ट्स आएं नॉर्मल, लेकिन शरीर में बना रहे दर्द
हेल्थ एक्सपर्ट डॉ. प्रितिका सिंह के अनुसार, क्लीनिकल प्रैक्टिस में कई ऐसे मरीज सामने आते हैं जिनकी सारी पैथोलॉजी रिपोर्ट्स पूरी तरह नॉर्मल होती हैं, लेकिन उनका शरीर गंभीर रूप से बीमार होता है। उन्होंने एक 40 वर्षीय महिला का उदाहरण देते हुए बताया कि वह पिछले कई सालों से लगातार पीठ दर्द, पेट की गंभीर समस्याओं और पैनिक अटैक (एंग्जायटी) से जूझ रही थी। जब उसकी काउंसलिंग की गई, तो पता चला कि वह बचपन में घरेलू हिंसा और माता-पिता की गंभीर इमोशनल उपेक्षा का शिकार रही थी। जब तक बचपन के उस डर (ट्रॉमा) को हील नहीं किया गया, तब तक शारीरिक दर्द में आराम नहीं मिला।
'फाइट या फ्लाइट' मोड: कैसे बचपन का डर बदल देता है शरीर की बायोलॉजी?
विशेषज्ञों के मुताबिक, जब कोई बच्चा लंबे समय तक डर, तनाव या असुरक्षा वाले माहौल में रहता है, तो उसका कोमल मस्तिष्क इसे एक परमानेंट खतरा मान लेता है। परिणाम स्वरूप:
स्ट्रेस हार्मोन का ओवरडोज: बच्चे का नर्वस सिस्टम लगातार 'फाइट या फ्लाइट' (Fight or Flight) मोड में रहने लगता है। इससे शरीर में 'कोर्टिसोल' और 'एड्रेनालाईन' जैसे स्ट्रेस हार्मोन्स का स्तर चौबीसों घंटे बढ़ा रहता है। लंबे समय तक इन हार्मोन्स का हाई लेवल शरीर के अंगों पर एसिड की तरह काम करता है, जिससे बड़े होने पर हाई ब्लड प्रेशर, नसों की कमजोरी, डिप्रेशन, मोटापा, क्रोनिक फटीग और दिल की बीमारियां जन्म लेती हैं।
अमेरिकी रिसर्च 'एसीई' (ACE Study) का चौंकाने वाला खुलासा
इस विषय पर दुनिया की सबसे प्रामाणिक और चर्चित रिसर्च अमेरिका में हुई 'एसीई' (Adverse Childhood Experiences) स्टडी मानी जाती है, जिसे 'सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन' (CDC) और 'कैसर परमानेंटे' ने मिलकर किया था। 17 हजार से ज्यादा लोगों पर की गई इस स्टडी में सामने आया कि जिन लोगों ने बचपन में शारीरिक या मानसिक हिंसा, माता-पिता का अलगाव, घरेलू तनाव या परिवार में नशेबाजी जैसी परिस्थितियां देखी थीं, उनमें वयस्क होने पर कैंसर, हार्ट अटैक और लिवर की बीमारियों का खतरा आम लोगों की तुलना में कई गुना ज्यादा पाया गया।
इसके अलावा 'JAMA पीडियाट्रिक्स' जर्नल में प्रकाशित एक अन्य रिसर्च में यह भी देखा गया कि बचपन के ट्रॉमा का सीधा संबंध 'ऑटोइम्यून बीमारियों' (जैसे सोरायसिस, थायराइड, रुमेटाइड अर्थराइटिस) से है, जिसमें शरीर की इम्युनिटी खुद अपने ही अंगों को नष्ट करने लगती है। इन शोधों ने दुनिया भर के डॉक्टरों के सोचने का नजरिया बदल दिया है। अब ट्रॉमा को सिर्फ एक 'बुरी याद' नहीं, बल्कि शरीर को प्रभावित करने वाली एक गंभीर 'बायोलॉजिकल कंडीशन' माना जा रहा है।
अगर आप या आपके आसपास कोई व्यक्ति लंबे समय से ऐसी शारीरिक बीमारियों से जूझ रहा है जिसका कारण डॉक्टरों को समझ नहीं आ रहा, तो किसी अच्छे साइकोलॉजिस्ट या थेरेपिस्ट की मदद से ट्रॉमा-इन्फॉर्मड थेरेपी लेना बेहद जरूरी है।