साइलेंट किलर: डायबिटीज और हाई बीपी के मरीजों में किडनी फेलियर का सबसे पहला लक्षण, भूलकर भी न करें नजरअंदाज

साइलेंट किलर: डायबिटीज और हाई बीपी के मरीजों में किडनी फेलियर का सबसे पहला लक्षण, भूलकर भी न करें नजरअंदाज

नोएडा (हेल्थ डेस्क): भारत सहित दुनिया भर में डायबिटीज (मधुमेह) और हाई ब्लड प्रेशर (उच्च रक्तचाप) के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। अक्सर इन बीमारियों से पीड़ित लोगों को लगता है कि दवाइयां खाकर सिर्फ शुगर लेवल या बीपी को नॉर्मल रख लेना ही काफी है। लेकिन यह एक बेहद खतरनाक सोच हो सकती है। लंबे समय तक रहने वाली डायबिटीज और हाइपरटेंशन हमारे शरीर के सबसे महत्वपूर्ण अंगों में से एक—किडनी (वृक्क) को धीरे-धीरे और चुपके से खोखला कर देते हैं।

क्रोनिक किडनी डिजीज (Chronic Kidney Disease - CKD) और डायबिटीज-हाई बीपी के इसी घातक संबंध पर कैलाश हॉस्पिटल, नोएडा के कंसल्टेंट नेफ्रोलॉजिस्ट (किडनी विशेषज्ञ) डॉ. अनीश नंदा ने कई महत्वपूर्ण जानकारियां और चेतावनी साझा की हैं। डॉ. नंदा के अनुसार, यदि समय रहते इन लक्षणों को नहीं पहचाना गया, तो स्थिति किडनी फेलियर तक पहुंच सकती है, जहां डायलिसिस या किडनी ट्रांसप्लांट के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता।

क्या है क्रोनिक किडनी डिजीज (CKD)?

हमारे शरीर में किडनी का मुख्य काम खून को फिल्टर करना, उसमें से हानिकारक टॉक्सिन्स (गंदगी) को बाहर निकालना और अतिरिक्त पानी को यूरिन (पेशाब) के रास्ते शरीर से बाहर करना है। जब किसी व्यक्ति को क्रोनिक किडनी डिजीज होती है, तो किडनी की काम करने की क्षमता अचानक नहीं, बल्कि धीरे-धीरे कम होने लगती है। जब किडनी फिल्टर करना बंद कर देती है, तो शरीर के अंदर जहरीले तत्व जमा होने लगते हैं, जो पूरे शरीर के लिए जानलेवा साबित हो सकते हैं।

किडनी खराब होने का सबसे पहला और सबसे बड़ा लक्षण

डॉ. अनीश नंदा बताते हैं कि टाइप-2 डायबिटीज और हाई बीपी के मरीजों में किडनी डैमेज होने का सबसे शुरुआती और कॉमन लक्षण पेशाब (यूरिन) से जुड़ा होता है।

  • पेशाब में प्रोटीन आना (झाग बनना): जब डायबिटीज के कारण किडनी की फिल्टर करने वाली छोटी नसें डैमेज हो जाती हैं, तो शरीर के लिए जरूरी प्रोटीन (एल्ब्यूमिन) छनकर पेशाब के रास्ते बाहर निकलने लगता है। अगर पेशाब में सामान्य से ज्यादा झाग बन रहा हो, तो यह किडनी की बीमारी का पहला अलार्म है।

  • पैरों और टखनों में सूजन: शरीर में एक्स्ट्रा पानी और सोडियम जमा होने के कारण पैरों, टखनों (Ankles) और चेहरे पर सूजन आने लगती है।

  • यूरिन की मात्रा में बदलाव: रात के समय बार-बार पेशाब आना या अचानक पेशाब की मात्रा बहुत कम हो जाना।

स्टेज 5 में पहुंचना यानी सीधे डायलिसिस का खतरा

डॉ. नंदा चेतावनी देते हुए कहते हैं, "हमारे पास अक्सर मरीज तब आते हैं जब उनकी किडनी की बीमारी स्टेज 5 (अंतिम चरण) में पहुंच चुकी होती है। इस स्टेज पर आकर बीमारी को रिवर्स करना नामुमकिन होता है और मरीज के पास केवल डायलिसिस या किडनी ट्रांसप्लांट का ही रास्ता बचता है।" इसलिए, जो लोग हाई-रिस्क जोन (डायबिटीज और बीपी के मरीज) में हैं, उन्हें शुरुआती स्टेज में ही इसके लक्षणों और जांच के बारे में पता होना चाहिए।

किडनी को फेल होने से बचाने के लिए एक्सपर्ट की सलाह

अगर आप अपनी किडनी को सुरक्षित रखना चाहते हैं, तो डॉ. अनीश नंदा द्वारा बताए गए इन नियमों को अपनी दिनचर्या में जरूर शामिल करें:

  • हर 6 महीने में कराएं यूरिन टेस्ट: डायबिटीज और हाई बीपी के मरीजों को साल में कम से कम दो बार (हर 6 महीने में) 'यूरिन माइक्रोएल्ब्यूमिन टेस्ट' (Urine Microalbumin Test) जरूर कराना चाहिए। यह टेस्ट पेशाब में प्रोटीन के रिसाव को शुरुआती दौर में ही पकड़ लेता है।

  • नियमित ब्लड टेस्ट: डॉक्टर की सलाह पर हर 6 महीने में ब्लड क्रिएटिनिन (Creatinine) और eGFR टेस्ट कराएं, जिससे किडनी की फिल्टर क्षमता का सटीक पता चल सके।

  • नेफ्रोलॉजिस्ट से तुरंत संपर्क: यदि टेस्ट रिपोर्ट में थोड़ा सा भी उतार-चढ़ाव या क्रिएटिनिन बढ़ा हुआ दिखे, तो सामान्य डॉक्टर के बजाय तुरंत किसी विशेषज्ञ नेफ्रोलॉजिस्ट (किडनी स्पेशलिस्ट) से कंसल्ट करें। अर्ली स्टेज में सही दवाओं से किडनी को आगे डैमेज होने से पूरी तरह रोका जा सकता है।

 

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