'पहले बजेगा वंदे मातरम, फिर ध्वजारोहण और राष्ट्रगान', मद्रास हाईकोर्ट के सर्कुलर से तमिलनाडु में नया घमासान; सीएम थलपति विजय के 'तमिल थाई वाज्थु' अनिवार्य करने वाले सरकारी आदेश के बाद अब क्या करेगी राज्य सरकार?
देश के 80वें स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त) से ठीक पहले तमिलनाडु की सियासत और कानूनी गलियारों में एक बार फिर राष्ट्रीय प्रतीक बनाम क्षेत्रीय भाषाई अस्मिता को लेकर बड़ा टकराव सामने आ गया है। मद्रास हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल द्वारा जारी किए गए एक ताजा प्रशासनिक सर्कुलर ने राज्य की नवगठित सी. जोसेफ विजय (थलपति विजय) सरकार के हालिया फैसले को सीधी चुनौती दे दी है। हाईकोर्ट ने अपने सर्कुलर में स्पष्ट निर्देश दिया है कि 15 अगस्त को चेन्नई की मुख्य पीठ, मदुरै बेंच और राज्य भर की जिला अदालतों में स्वतंत्रता दिवस समारोह की शुरुआत राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम' के वादन से होगी। इसके बाद ध्वजारोहण किया जाएगा और अंत में राष्ट्रगान 'जन गण मन' गाया जाएगा। यह सर्कुलर उस वक्त आया है जब महज दो दिन पहले ही मुख्यमंत्री विजय के नेतृत्व वाली तमिलनाडु कैबिनेट ने विधानसभा में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास कर राज्य के सभी सरकारी और आधिकारिक कार्यक्रमों में राज्य गीत 'तमिल थाई वाज्थु' (Tamil Thaai Vaazhthu) को सर्वप्रथम गाना अनिवार्य कर दिया था।
मद्रास हाईकोर्ट का सर्कुलर: 'वंदे मातरम' के 150 साल और आधिकारिक प्रोटोकॉल
मद्रास हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल की ओर से जारी आधिकारिक अधिसूचना में बताया गया कि राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम' के 150 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में 'हर घर तिरंगा अभियान' के तहत भारत सरकार द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के अनुरूप यह क्रम तय किया गया है।
हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार, 15 अगस्त के मुख्य समारोहों का क्रम इस प्रकार रहेगा:
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प्रथम चरण: राष्ट्रीय गीत "वंदे मातरम" का वादन/गायन।
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द्वितीय चरण: राष्ट्रीय ध्वज (तिरंगा) फहराना।
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तृतीय चरण: राष्ट्रगान "जन गण मन" का गायन।
इस सर्कुलर में राज्य गीत 'तमिल थाई वाज्थु' को शुरुआती स्थान पर न रखे जाने के बाद राज्य के राजनीतिक और सामाजिक संगठनों में तीखी प्रतिक्रियाएं शुरू हो गई हैं। यह मामला पहले से ही एक जनहित याचिका (PIL) के रूप में अदालत के विचाराधीन है, जहां याचिकाकर्ताओं ने मांग की थी कि तमिलनाडु में सभी आयोजनों की शुरुआत राज्य गीत से ही होनी चाहिए।
सीएम विजय का दांव: विधानसभा में पास हुआ था 'तमिल फर्स्ट' का ऐतिहासिक प्रस्ताव
इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि कुछ दिन पहले तब तैयार हुई थी जब मुख्यमंत्री थलपति विजय ने 10 अगस्त को तमिलनाडु विधानसभा में एक ऐतिहासिक प्रस्ताव पेश किया था। इस प्रस्ताव को राज्य के सभी राजनीतिक दलों ने सर्वसम्मति से पारित किया था। इसके बाद 12 अगस्त को मुख्य सचिव द्वारा बाकायदा एक शासकीय आदेश (GO) जारी किया गया।
इस आदेश के तहत राज्य के सभी सरकारी कार्यालयों, शैक्षणिक संस्थानों, विश्वविद्यालयों, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) और स्वायत्त निकायों के कार्यक्रमों में सबसे पहले 'तमिल थाई वाज्थु' का गायन अनिवार्य किया गया।
विधानसभा में अपने संबोधन के दौरान मुख्यमंत्री विजय ने भावुक होते हुए कहा था, "तमिल हमारी भावना, हमारा अस्तित्व और हमारी पहचान है। कोई भी राज्य अपनी मातृभाषा के गौरव की अनदेखी नहीं कर सकता। हमारी मातृभाषा हमारी मां की तरह पवित्र है और यह केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति और विचार है। इसलिए तमिलनाडु की धरती पर होने वाले हर कार्यक्रम की शुरुआत मां तमिल की वंदना से ही होगी।"
दशकों पुरानी परंपरा: 1970 से लेकर 2021 तक 'तमिल थाई वाज्थु' का सफर
तमिलनाडु में किसी भी सार्वजनिक और सरकारी कार्यक्रम की शुरुआत 'तमिल थाई वाज्थु' से करने की परंपरा आधी सदी से भी अधिक पुरानी है। यह गीत 1891 में प्रख्यात विद्वान मनोनमनियम सुंदरनार (पी. सुंदरम पिल्लई) द्वारा रचित प्रसिद्ध नाटक 'मनोनमनियम' की प्रस्तावना से लिया गया है।
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1970 का ऐतिहासिक आदेश: 23 नवंबर 1970 को तत्कालीन मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि की सरकार ने इसे सरकारी कार्यक्रमों की शुरुआत में प्रार्थना गीत के रूप में गाने का पहला औपचारिक आदेश जारी किया था।
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2021 में राज्य गीत का दर्जा: दिसंबर 2021 में पूर्ववर्ती डीएमके सरकार ने इसे आधिकारिक तौर पर तमिलनाडु के 'राज्य गीत' (State Song) का दर्जा दिया था और इसके गायन के समय सभी नागरिकों (दिव्यांगों को छोड़कर) के लिए सम्मानपूर्वक खड़े होना अनिवार्य किया था।
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लगभग 55 सेकंड के इस गीत को राज्य के हर स्कूल, कॉलेज और सरकारी दफ्तर में दशकों से सबसे पहले गाने का अटूट नियम रहा है।
केंद्र सरकार की नई गाइडलाइंस और विवाद की असली शुरुआत
हाल के महीनों में यह विवाद उस वक्त गरमाया जब केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को एक विस्तृत प्रोटोकॉल भेजा। इस गाइडलाइन में कहा गया था कि स्वतंत्रता दिवस और औपचारिक कार्यक्रमों में राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम' की सभी 6 कड़ियों को राष्ट्रगान से पहले गाया जाए।
इस प्रोटोकॉल के चलते हाल ही में मनोनमनियम सुंदरनार विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह और अन्य केंद्रीय संस्थानों के कार्यक्रमों में 'तमिल थाई वाज्थु' को पहले स्थान से हटाकर तीसरे नंबर पर धकेल दिया गया। यहां तक कि मुख्यमंत्री पद की शपथ के दौरान भी क्रम में आए इस बदलाव को लेकर राज्य में कड़ा विरोध हुआ था। तमिल संगठनों और राज्य सरकार का मानना है कि केंद्र का यह नया क्रम राज्य की भाषाई स्वायत्तता और स्थापित परंपराओं को दबाने का प्रयास है।
हाईकोर्ट के आदेश के बाद अब क्या करेंगे मुख्यमंत्री थलपति विजय?
मद्रास हाईकोर्ट द्वारा अपने स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम में राज्य सरकार के आदेश के विपरीत 'वंदे मातरम' को पहला स्थान दिए जाने के बाद मुख्यमंत्री विजय और उनकी सरकार के सामने गंभीर प्रशासनिक और संवैधानिक दुविधा खड़ी हो गई है:
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न्यायपालिका की स्वायत्तता बनाम कार्यपालिका का आदेश: भारत के संविधान के तहत उच्च न्यायालय एक स्वायत्त संवैधानिक संस्था है। राज्य सरकार का कोई भी सरकारी आदेश (GO) सीधे तौर पर हाईकोर्ट के आंतरिक प्रोटोकॉल और आयोजनों पर बाध्यकारी नहीं होता। ऐसे में विजय सरकार सीधे तौर पर हाईकोर्ट के सर्कुलर को रद्द नहीं कर सकती।
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सुप्रीम कोर्ट का रुख करने का विकल्प: राज्य सरकार इस प्रशासनिक सर्कुलर और केंद्र के दिशा-निर्देशों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर कर सकती है, जिसमें राज्यों के सांस्कृतिक अधिकारों और संघीय ढांचे (Federalism) का हवाला दिया जा सकता है।
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सचिवालय और सरकारी दफ्तरों में सख्ती: जानकारों का मानना है कि राज्य सरकार हाईकोर्ट के परिसर को छोड़कर राज्य के बाकी सभी सरकारी स्कूलों, कलेक्ट्रेट, सचिवालय और सार्वजनिक मंचों पर अपने 'तमिल फर्स्ट' आदेश को कड़ाई से लागू रखेगी।
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राजनीतिक संतुलन की चुनौती: अभिनेता से राजनेता बने थलपति विजय के लिए यह अपनी 'तमिल राष्ट्रवाद' और 'द्रविड़ पहचान' की राजनीति को साबित करने का सबसे बड़ा इम्तिहान है। यदि वे इस पर आक्रामक रुख अपनाते हैं, तो केंद्र से टकराव बढ़ेगा, और यदि वे नरम पड़ते हैं, तो विपक्षी दल उन पर तमिल अस्मिता से समझौता करने का आरोप लगाएंगे।
राष्ट्रीय एकता बनाम संघीय स्वायत्तता: 15 अगस्त पर टिकीं निगाहें
यह विवाद केवल दो गीतों के क्रम (Sequence) का नहीं है, बल्कि यह केंद्र सरकार की राष्ट्रव्यापी एकरूपता की नीति और तमिलनाडु की दशकों पुरानी भाषाई व सांस्कृतिक संप्रभुता के बीच के गहरे वैचारिक टकराव का प्रतीक है। केंद्र का तर्क है कि 'वंदे मातरम' स्वतंत्रता संग्राम का मूल मंत्र रहा है और इसका सम्मान सर्वोपरि है, जबकि तमिलनाडु का रुख यह है कि राज्य गीत का गायन किसी भी तरह से राष्ट्रगान या राष्ट्रीय गीत का अनादर नहीं करता, बल्कि यह विविधता में एकता के भारतीय दर्शन को मजबूती देता है।
15 अगस्त के पावन अवसर पर जब एक तरफ मद्रास हाईकोर्ट परिसर में 'वंदे मातरम' के साथ ध्वजारोहण का आगाज होगा, वहीं दूसरी तरफ फोर्ट सेंट जॉर्ज (सचिवालय) में मुख्यमंत्री विजय तिरंगा फहराने से पहले 'तमिल थाई वाज्थु' की गूंज सुनिश्चित करेंगे। यह देखना दिलचस्प होगा कि स्वतंत्रता दिवस के बाद यह कानूनी और राजनीतिक जंग अदालतों में क्या नया मोड़ लेती है।