थलपति विजय का 'मास्टरस्ट्रोक': सरकारी ठेकों से खत्म हुआ कमीशन कल्चर, 30% तक कैसे घट गए टेंडर के दाम; विरोधी चारों खाने चित्त

थलपति विजय का 'मास्टरस्ट्रोक': सरकारी ठेकों से खत्म हुआ कमीशन कल्चर, 30% तक कैसे घट गए टेंडर के दाम; विरोधी चारों खाने चित्त

तमिलनाडु की सियासत में कदम रखते ही मुख्यमंत्री थलपति विजय (CM Thalapathy Vijay) ने भ्रष्टाचार के खिलाफ एक ऐसी प्रशासनिक सर्जिकल स्ट्राइक की है, जिसने विपक्षी दलों की बोलती बंद कर दी है। शपथ लेने के बमुश्किल दो महीने के भीतर सीएम विजय की 'पारदर्शिता नीति' के कारण राज्य के लोक निर्माण और नागरिक अनुबंधों (Civic Contracts) में टेंडर की दरें 25 से 30 प्रतिशत तक गिर गई हैं। इस ऐतिहासिक कदम से न सिर्फ सरकारी खजाने में करोड़ों रुपये की बचत हो रही है, बल्कि राज्य की वित्तीय स्थिति सुधारने की दिशा में इसे 'विजय मॉडल' के रूप में देखा जा रहा है।

10 लाख करोड़ के कर्ज के बीच शुरू हुआ 'ओपन टेंडर सिस्टम'

गौरतलब है कि 10 मई को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के तुरंत बाद थलपति विजय ने जनता के सामने ऐलान किया था कि उनकी सरकार राज्य की वित्तीय स्थिति पर एक विस्तृत श्वेत पत्र जारी करेगी। उन्होंने साफ किया था कि तमिलनाडु पर फिलहाल 10 लाख करोड़ रुपये से अधिक का भारी-भरकम कर्ज है। इस वित्तीय संकट से उबरने और प्रशासनिक जवाबदेही तय करने के लिए सीएम विजय ने सालों से चले आ रहे पुराने 'फिक्स्ड टेंडर' सिस्टम को तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दिया। इसकी जगह 'ओपन टेंडर सिस्टम' (खुली प्रतिस्पर्धी बोली) लागू करने के कड़े निर्देश दिए गए।

बचत के चौंकाने वाले आंकड़े: ₹25 लाख का प्रोजेक्ट ₹16 लाख में हुआ फाइनल

'टाइम्स ऑफ इंडिया' (TOI) की एक होनहार ग्राउंड रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रेटर चेन्नई कॉर्पोरेशन (GCC) के सड़क-मरम्मत कार्यों के नए टेंडरों में ठेकेदारों ने आधिकारिक अनुमान से 25% से 30% तक कम दरें (कोट) दर्ज की हैं। यह पहले की उस व्यवस्था से बिल्कुल उलट है, जहां ठेके अक्सर अनुमानित लागत से काफी ऊपर (महंगे दामों पर) दिए जाते थे।

बचत के कुछ लाइव उदाहरण इस प्रकार हैं:

  • अंबत्तूर ज़ोन: सड़क मरम्मत के एक प्रोजेक्ट की सरकारी अनुमानित लागत 25 लाख रुपये तय की गई थी। ओपन टेंडर के तहत इसमें 9 ठेकेदारों ने हिस्सा लिया। जीतने वाले कॉन्ट्रैक्टर ने सरकारी अनुमान से 25.9% कम की बोली लगाई, जिससे प्रोजेक्ट की असल लागत घटकर मात्र 16 लाख रुपये रह गई। यानी सरकार को एक ही झटके में 9 लाख रुपये की सीधी बचत हुई।

  • टोंडियारपेट ज़ोन: यहां भी 30 लाख रुपये से अधिक के प्रोजेक्ट के लिए कांट्रैक्टर्स ने अनुमानित लागत से करीब 25% कम रेट कोट किए।

  • शोलिंगनल्लूर ज़ोन: इस इलाके में तो बोलियां अनुमानित सरकारी लागत से रिकॉर्ड 36% तक कम आईं, जिसने अधिकारियों को भी हैरान कर दिया।

पिछली सरकारों का खुला राज: पहले क्यों बढ़ा-चढ़ाकर बनता था बजट?

ग्रेटर चेन्नई कॉन्ट्रैक्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष रामा राव ने इस बड़े बदलाव का स्वागत करते हुए पिछली व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने बताया कि पिछली सरकारों के कार्यकाल में यही काम अनुमानित लागत से 10% अधिक मूल्य पर आवंटित किए जाते थे। अब सवाल यह उठ रहा है कि आखिर पहले के दौर में सरकारी प्रोजेक्ट्स के बजट को 35 से 40% तक बढ़ाकर क्यों दिखाया जाता था?

तमिलनाडु के नवनियुक्त लोक निर्माण मंत्री आधव अर्जुन ने पिछली सरकारों के कार्यकाल में कॉन्ट्रैक्ट आवंटन में बड़े पैमाने पर सेंट्रलाइज़्ड करप्शन, रिश्वतखोरी और नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाया है। उन्होंने स्पष्ट संदेश देते हुए कहा, > "विजय सरकार में अब किसी भी स्तर पर कोई कमीशन या रिश्वत नहीं मांगी जाएगी। सभी अनुबंध पूरी तरह पारदर्शी और डिजिटल तरीके से ही दिए जाएंगे।"

'40% कमीशन संस्कृति' का अंत, पूरे देश के लिए मॉडल बनेगा सुशासन

राजनीतिक और वित्तीय विश्लेषकों का मानना है कि ठेकेदार (Contractors) अब इतने कम दामों पर काम करने के लिए इसलिए तैयार हैं, क्योंकि उन्हें अब नेताओं या अफसरों की "निजी जेबों" में भारी-भरकम कमीशन नहीं भरना पड़ रहा है। यदि मुख्यमंत्री थलपति विजय इस "40% कमीशन संस्कृति" को पूरी तरह खत्म करने में सफल रहते हैं, तो यह पूरे भारत के लिए सुशासन (Good Governance) का एक बेजोड़ मॉडल साबित होगा।

हालांकि, इस पारदर्शी व्यवस्था के बीच सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि इतनी कम लागत में होने वाले निर्माण कार्यों की क्वालिटी (गुणवत्ता) और समय-सीमा से कोई समझौता न हो। फिलहाल, टीवीके (TVK) सरकार का 'नो कमीशन-नो करप्शन' का यह फॉर्मूला पूरे राज्य में वाहवाही बटोर रहा है।

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