इस बार रक्षाबंधन पर लग रहा आंशिक चंद्रग्रहण, जानें राखी बांधने का सबसे सटीक शुभ मुहूर्त, सूतक काल का समय और राहु-केतु दोष मुक्ति के अचूक मंत्र
भाई-बहन के असीम स्नेह और रक्षा के संकल्प का पावन पर्व रक्षाबंधन इस बार एक अत्यंत दुर्लभ और ज्योतिषीय दृष्टि से महत्वपूर्ण संयोग में मनाया जा रहा है। इस वर्ष रक्षाबंधन के दिन आंशिक चंद्रग्रहण (Partial Lunar Eclipse) का साया रहने वाला है। सनातन धर्म में चंद्रग्रहण और सूर्यग्रहण की घटनाओं को आध्यात्मिक और धार्मिक रूप से बहुत संवेदनशील माना जाता है। जब भी किसी प्रमुख त्योहार पर ग्रहण का योग बनता है, तो पूजा-पाठ, शुभ कार्यों के मुहूर्त और नियमों में विशेष सतर्कता बरतनी पड़ती है। इस बार बहनें अपने भाइयों की कलाई पर रक्षासूत्र बाँधने से पहले समय का विशेष ध्यान रखेंगी, क्योंकि ग्रहण से पहले लगने वाले सूतक काल में सभी प्रकार के मांगलिक और शुभ कार्य पूर्णतः वर्जित होते हैं। ज्योतिषविदों और कुरुक्षेत्र व वाराणसी के प्रसिद्ध पंचांगविदों के अनुसार, चंद्रग्रहण के समय ब्रह्मांड में ऊर्जा का प्रवाह काफी तीव्र होता है। ऐसे में यदि सही विधि और मुहूर्त का पालन करते हुए रक्षाबंधन मनाया जाए, तो इसका फल कई गुना शुभ हो सकता है।
चंद्रग्रहण और रक्षाबंधन का दुर्लभ संयोग: जानें सूतक काल का समय और राखी बांधने का शुभ मुहूर्त
शास्त्रों में विधान है कि चंद्रग्रहण शुरू होने से ठीक 9 घंटे पहले सूतक काल प्रारंभ हो जाता है। सूतक काल लगते ही मंदिरों के कपाट बंद कर दिए जाते हैं, देवी-देवताओं की मूर्तियों का स्पर्श वर्जित हो जाता है और किसी भी प्रकार के नए या शुभ कार्य की शुरुआत नहीं की जाती है। इस आंशिक चंद्रग्रहण के कारण रक्षाबंधन पर राखी बाँधने का समय बेहद सीमित और महत्वपूर्ण हो गया है। धार्मिक नियमों के अनुसार, बहनों को सूतक काल शुरू होने से पहले ही अपने भाइयों को राखी बाँध लेनी चाहिए। यदि सूतक काल प्रारंभ हो जाता है, तो उसके बाद ग्रहण की समाप्ति और स्नान-दान के पश्चात ही रक्षासूत्र बाँधा जा सकता है। शुभ मुहूर्त में बांधी गई राखी भाई के जीवन में दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और सफलता लेकर आती है, जबकि भद्रा या सूतक काल में राखी बाँधना शास्त्रों में अशुभ माना गया है। इसलिए इस दिन पंचांग के अनुसार प्रात:काल से लेकर सूतक काल शुरू होने तक के समय का ही चयन करें।
राखी बांधने के समय रखें इन बातों का ध्यान, सूतक काल में भूलकर भी न करें ये गलतियां
रक्षाबंधन के दिन बहनें अपने भाई के तिलक और आरती की तैयारी बड़े उत्साह से करती हैं। लेकिन इस बार चंद्रग्रहण के कारण कुछ विशेष नियमों का पालन करना अनिवार्य है। सूतक काल से पूर्व जब आप भाई को राखी बांधें, तो सबसे पहले राखी की थाली को भगवान श्री कृष्ण या अपने ईष्ट देव के चरणों में स्पर्श कराएं। थाली में अक्षत (अखंडित चावल), रोली, चंदन, घी का दीपक और मिठाई रखें। भाई को पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बिठाएं और सिर पर रुमाल या कपड़ा अवश्य रखवाएं। इसके बाद भाई के माथे पर तिलक लगाएं, अक्षत लगाएं और दाहिनी कलाई पर तीन गांठें लगाकर रक्षासूत्र बाँधें।
दूसरी ओर, जैसे ही सूतक काल और चंद्रग्रहण की अवधि शुरू हो, घर में पका हुआ भोजन ढककर रखें और उसमें तुलसी के पत्ते अवश्य डाल दें। तुलसी पत्र डालने से ग्रहण की नकारात्मक तरंगों का असर भोजन और जल पर नहीं पड़ता है। ग्रहण काल के दौरान गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और रोगियों को छोड़कर अन्य लोगों को भोजन ग्रहण करने से बचना चाहिए। सूतक काल में चाकू, कैंची या नुकीली वस्तुओं का प्रयोग न करें और न ही किसी प्रकार का विवाद या क्लेश करें।
रक्षाबंधन पर राहु-केतु के मंत्रों का जाप क्यों है विशेष? जानें अचूक मंत्र और विधि
ज्योतिष शास्त्र में ग्रहण की घटना का सीधा संबंध राहु और केतु ग्रहों से माना गया है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब राहु और केतु चंद्रमा को ग्रसते हैं, तभी चंद्रग्रहण की स्थिति निर्मित होती है। चंद्रमा व्यक्ति के मन, मस्तिष्क और भावनाओं का कारक ग्रह है। ग्रहण के समय चंद्रमा पीड़ित होता है, जिससे लोगों में तनाव, मानसिक अशांति और निर्णय लेने में भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है। लेकिन शास्त्रों में यह भी कहा गया है कि ग्रहण काल सिद्धियों को प्राप्त करने का सबसे श्रेष्ठ समय होता है। इस समय किया गया मंत्र जाप साधारण दिनों की तुलना में हजारों गुना अधिक फल प्रदान करता है।
यदि किसी जातक की कुंडली में राहु-केतु की महादशा, अंतर्दशा या कालसर्प दोष चल रहा है, तो रक्षाबंधन के दिन चंद्रग्रहण के समय राहु और केतु के मंत्रों का जाप करना अचूक रामबाण उपाय सिद्ध होता है।
राहु मंत्र: 'ॐ रां राहवे नमः' या 'ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं सः राहवे नमः'
केतु मंत्र: 'ॐ कें केतवे नमः' या 'ॐ स्रां स्रीं स्रौं सः केतवे नमः'
ग्रहण काल के दौरान किसी स्वच्छ आसन पर बैठकर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुंह करके इन मंत्रों का कम से कम 108 बार (एक माला) जाप करें। इसके अतिरिक्त चंद्रमा को मजबूत करने के लिए 'ॐ सों सोमाय नमः' अथवा भगवान शिव के महामृत्युंजय मंत्र 'ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥' का जाप भी अत्यंत कल्याणकारी माना जाता है। यह जाप न केवल मानसिक शांति देता है बल्कि आपके जीवन से अज्ञात भय और बाधाओं को भी नष्ट करता है।
चंद्रग्रहण के प्रभाव से बचने और धन-समृद्धि पाने के लिए रक्षाबंधन पर करें ये महाउपाय
चंद्रग्रहण की समाप्ति के तुरंत बाद पूरे घर की शुद्धि करना और दान-पुण्य करना बेहद फलदायी माना जाता है। जैसे ही ग्रहण समाप्त हो, सबसे पहले पूरे घर में गंगाजल का छिड़काव करें। इसके बाद स्वयं स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। घर के पूजा घर में भगवान की मूर्तियों को स्नान कराकर उनका श्रृंगार करें और दीप प्रज्ज्वलित करें।
इसके बाद पितरों और ग्रहों की शांति के लिए दान सामग्री निकालें। चंद्रग्रहण के बाद सफेद वस्तुओं जैसे - दूध, चावल, दही, सफेद वस्त्र, चीनी, चांदी और शक्कर का दान करना सबसे उत्तम माना गया है। राहु-केतु के अशुभ प्रभाव से बचने के लिए काले तिल, उड़द की दाल, काला कंबल या सरसों के तेल का दान निर्धन व्यक्ति या किसी मंदिर के पुजारी को दें। जो बहनें और भाई ग्रहण के बाद स्नान करके दान करते हैं, उनके घर में पूरे वर्ष अन्न और धन की कोई कमी नहीं रहती तथा भाई-बहन के रिश्ते में मिठास और सुरक्षा का भाव सदैव बना रहता है।
प्रमुख तीर्थ स्थलों पर ग्रहण का असर और धार्मिक परंपराएं
चंद्रग्रहण और सूतक काल का असर देश भर के प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों पर भी देखने को मिलता है। हरिद्वार में हर की पौड़ी, वाराणसी में दशाश्वमेध घाट, प्रयागराज में संगम तट और मथुरा-वृंदावन के प्रमुख मंदिरों में सूतक काल शुरू होते ही दर्शन और आरती स्थगित कर दी जाती है। जगन्नाथ पुरी, तिरुपति बालाजी और उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में ग्रहण के नियमों का कड़ाई से पालन किया जाता है।
ग्रहण समाप्त होने के बाद नदियों के तटों पर श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ता है, जहाँ लोग मोक्षदायिनी नदियों में आस्था की डुबकी लगाते हैं। मान्यता है कि ग्रहण के बाद गंगा, यमुना या क्षिप्रा नदी में स्नान करने से जन्म-जन्मांतर के पाप धुल जाते हैं और व्यक्ति को आरोग्य का आशीर्वाद मिलता है। यदि आप किसी पवित्र नदी तक नहीं पहुँच सकते, तो अपने घर पर ही नहाने के पानी में थोड़ा सा गंगाजल और तिल मिलाकर स्नान करें, इससे भी तीर्थ स्नान के समान ही पुण्य फल की प्राप्ति होती है।