नेपाल में बालेन शाह का सबसे बड़ा 'गोरखा टेस्ट': भारतीय सेना में अग्निवीर भर्ती को लेकर सड़कों पर उतरे पूर्व सैनिक; 200 साल पुरानी सैन्य विरासत पर मंडराया संकट या सुलझेगा काठमांडू-दिल्ली विवाद?
नेपाल और भारत के बीच दो सदियों से अधिक पुराने अटूट सैन्य व सांस्कृतिक संबंधों में 'गोरखा भर्ती' का मुद्दा एक बार फिर सबसे बड़े कूटनीतिक चौराहे पर आकर खड़ा हो गया है। भारतीय थल सेना प्रमुख जनरल धीरज सेठ के आधिकारिक नेपाल दौरे के ठीक बीच पोखरा की सड़कों पर पूर्व गोरखा सैनिकों, उनके परिजनों और रक्षा सेवा के इच्छुक युवाओं का बड़ा जनसैलाब उमड़ पड़ा। प्रदर्शनकारियों ने साफ शब्दों में नेपाल की सत्ता और राजनीतिक नेतृत्व के सामने चुनौती पेश करते हुए मांग की है कि भारतीय सेना में 'अग्निपथ योजना' के तहत नेपाली गोरखाओं की रुकी हुई भर्ती प्रक्रिया को बिना किसी देरी के तुरंत हरी झंडी दी जाए।
राजनीतिक हलकों में इसे बालेन शाह सरकार का 'गोरखा टेस्ट' कहा जा रहा है। एक तरफ जहां नेपाल का राजनीतिक नेतृत्व सेना की अल्पकालिक सेवा शर्तों और पेंशन सुरक्षा को लेकर असहज है, वहीं दूसरी तरफ जमीनी हकीकत यह है कि देश का बेरोजगार युवा और पूर्व सैनिकों का वर्ग इस ऐतिहासिक अवसर को किसी भी सूरत में गंवाना नहीं चाहता।
सड़कों पर उतरे वेटरन्स: 'खाड़ी देशों के नरक से 100 गुना बेहतर है अग्निवीर'
पोखरा में 'इंडियन एक्स-सर्विसमेन गोरखा ब्रिगेड' के नेतृत्व में आयोजित विशाल रैली में पूर्व सैनिकों का गुस्सा साफ देखा गया। जिला प्रशासन के माध्यम से सरकार को सौंपे गए ज्ञापन में पूर्व सैनिकों ने दो टूक कहा कि नेपाल सरकार की हठधर्मिता के कारण देश के होनहार युवा उस ऐतिहासिक और सम्मानजनक मौके से वंचित हो रहे हैं, जिसे पीढ़ियों से गोरखा परिवारों का गौरव माना जाता रहा है।
प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे रिटायर्ड कर्नल कृष्ण बहादुर खत्री और रिटायर्ड कैप्टन रुद्र थापा ने जमीनी हकीकत बयां करते हुए कहा कि यदि युवाओं को भारतीय सेना में 4 साल के लिए अग्निवीर बनने का अवसर मिलता है, तो वे सेवाकाल के दौरान भत्तों और वित्तीय लाभों को मिलाकर करीब 45 से 50 लाख नेपाली रुपये कमा सकते हैं। पूर्व सैनिकों का तर्क है कि 50 डिग्री सेल्सियस के खौफनाक तापमान में खाड़ी देशों में कम वेतन वाली मजदूरी करने या अवैध रास्तों से विदेशी युद्धों में जान जोखिम में डालने के मुकाबले भारतीय सेना की वर्दी पहनना हर लिहाज से बेहतर और सुरक्षित विकल्प है।
क्या है विवाद की जड़? 1947 का त्रिपक्षीय समझौता बनाम अग्निपथ मॉडल
नेपाल और भारत के बीच गोरखा सैनिकों का इतिहास 1814-16 के एंग्लो-नेपाल युद्ध और सुगौली संधि से जुड़ा हुआ है। भारत की आजादी के समय 1947 में भारत, नेपाल और ब्रिटेन के बीच एक ऐतिहासिक त्रिपक्षीय समझौता हुआ था। इसके तहत ब्रिटिश भारतीय सेना की छह गोरखा रेजिमेंट आजाद भारत की सेना का अभिन्न अंग बनीं, और बाद में एक अतिरिक्त रेजिमेंट भी तैयार की गई। दशकों तक इस व्यवस्था के तहत नेपाली गोरखा सैनिकों को भारतीय सैनिकों के समान वेतन, भत्ते, पदोन्नति और आजीवन पेंशन की पूरी सुविधा मिलती रही।
गतिरोध की शुरुआत जून 2022 में हुई, जब भारत सरकार ने तीनों सशस्त्र बलों के लिए 'अग्निपथ योजना' लागू की। इसके तहत सैनिकों को 4 साल के अनुबंध पर भर्ती किया जाता है, जिसके बाद 25 प्रतिशत सैनिकों को स्थायी कैडर में बनाए रखा जाता है जबकि बाकी जवानों को सेवा निधि पैकेज देकर विदा किया जाता है।
नेपाल के राजनीतिक दलों और वामपंथी धड़े ने इस पर गंभीर आपत्ति जताई। काठमांडू का तर्क था कि 4 साल का यह अल्पकालिक मॉडल 1947 के त्रिपक्षीय समझौते के दीर्घकालिक सेवा और पेंशन प्रावधानों से मेल नहीं खाता। इसके चलते नेपाल ने अपने नागरिकों की नई भर्ती पर रोक लगा दी, जिसके बाद से नेपाल डोमिसाइल वाले गोरखाओं की भर्ती पूरी तरह ठप पड़ी है।
नेपाल की ग्रामीण अर्थव्यवस्था और रेमिटेंस पर भारी चोट
गोरखा सैनिकों का भारतीय सेना में योगदान केवल शौर्य और वीरता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह नेपाल की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा आधार स्तंभ भी रहा है। नेपाल के पहाड़ी और ग्रामीण इलाकों में हर साल भारतीय सेना से आने वाला पेंशन और वेतन का पैसा स्थानीय बाजार की जान है।
वर्तमान में नेपाल में एक लाख से अधिक भारतीय सेना के पेंशनभोगी परिवार रहते हैं, जिन्हें भारत सरकार नियमित पेंशन वितरित करती है। पिछले चार वर्षों से नई भर्ती बंद होने के कारण यह आर्थिक चक्र बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। रोजगार के अभाव में नेपाली युवाओं का पलायन अवैध रास्तों और खतरनाक क्षेत्रों की ओर बढ़ा है, जिसने काठमांडू की चिंताएं और बढ़ा दी हैं।
भारत का स्पष्ट रुख: सभी के लिए एक समान नियम
भारत सरकार और सैन्य नेतृत्व ने इस मुद्दे पर अपना रुख हमेशा स्पष्ट और पारदर्शी रखा है। भारतीय रक्षा अधिकारियों का कहना है कि अग्निपथ योजना अब भारतीय सशस्त्र बलों में भर्ती का मानक और सार्वभौमिक नियम बन चुकी है। भारतीय नागरिकों और नेपाली गोरखाओं के लिए दो अलग-अलग भर्ती नियम लागू नहीं किए जा सकते।
भारत ने स्पष्ट किया है कि नेपाली युवाओं के लिए दरवाजे पूरी तरह खुले हैं, लेकिन भर्ती की शर्तें वही होंगी जो पूरे भारत के युवाओं पर लागू होती हैं। नई दिल्ली का मानना है कि चार साल के बाद मिलने वाली एकमुश्त पूंजी और अनुशासित सैन्य प्रशिक्षण नेपाली युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने और नए करियर की शुरुआत करने में सक्षम बनाता है।
कूटनीतिक चुप्पी और बालेन सरकार के सामने सबसे बड़ा धर्मसंकट
काठमांडू में भारतीय सेना प्रमुख के दौरे के दौरान सैन्य संबंधों को मजबूत करने और परंपराओं के निर्वहन पर तो चर्चा हुई, लेकिन आधिकारिक बयानों में अग्निपथ भर्ती पर सार्वजनिक मौन इस बात का संकेत है कि कूटनीतिक टेबल पर बातचीत के पेच अभी पूरी तरह सुलझे नहीं हैं।
बालेन शाह सरकार इस समय दोहरे दबाव में है। एक तरफ घरेलू राष्ट्रवादी राजनीति और विपक्षी दलों के सवाल हैं जो पेंशन के बिना सैनिकों को भेजने को राजनीतिक मुद्दा बनाते हैं। दूसरी तरफ पूर्व सैनिकों का संगठित आंदोलन और देश के लाखों युवाओं का भविष्य है जो अपने पारंपरिक पेशे और गौरवशाली रेजिमेंट में लौटने को बेताब हैं।
यदि काठमांडू अपने अड़ियल रुख पर कायम रहता है, तो दो शताब्दियों से चली आ रही गोरखा परंपरा हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में सिमट सकती है। वहीं, यदि बालेन सरकार व्यावहारिक फैसला लेते हुए भर्ती की अनुमति देती है, तो यह न केवल युवाओं को आर्थिक संबल देगा बल्कि भारत-नेपाल के रणनीतिक रिश्तों में जमी बर्फ को भी पूरी तरह पिघला देगा। आने वाले दिन यह तय करेंगे कि नेपाल अपने युवाओं के भविष्य को प्राथमिकता देता है या फिर वैचारिक जिद के चलते 200 साल पुरानी ऐतिहासिक साझेदारी पर पूर्णविराम लग जाता है।