महाभारत का वो 'रहस्यमयी कुंड': जहां दुशासन के वध के बाद द्रौपदी ने खून से सने बाल धोकर पूरी की थी अपनी भीषण प्रतिज्ञा

महाभारत का वो 'रहस्यमयी कुंड': जहां दुशासन के वध के बाद द्रौपदी ने खून से सने बाल धोकर पूरी की थी अपनी भीषण प्रतिज्ञा

भारत की पावन भूमि पर आज भी महाभारत काल के ऐसे कई जीवंत और पौराणिक स्थल मौजूद हैं, जो हजारों साल पुराने उस ऐतिहासिक और धर्म-अधर्म के महायुद्ध की गवाही देते हैं। इन स्थलों से जुड़ी रहस्यमयी और रोचक कथाएं आज भी श्रद्धालुओं को अचंभित कर देती हैं। ऐसा ही एक परम पवित्र और ऐतिहासिक स्थल हरियाणा के कुरुक्षेत्र में स्थित है, जिसे दुनिया 'द्रौपदी कूप' या 'द्रौपदी कुंड' के नाम से जानती है। इस प्राचीन कूप की सबसे बड़ी विशेषता और धार्मिक मान्यता यह है कि इसी स्थान पर महारानी द्रौपदी ने दुशासन के रक्त से सने अपने बालों को धोकर अपनी वर्षों पुरानी अग्नि-प्रतिज्ञा को विश्राम दिया था।

'द्रौपदी कूप' का अद्भुत धार्मिक महत्व: गीता जयंती पर उमड़ता है श्रद्धालुओं का जनसैलाब

चूंकि महाभारत का ऐतिहासिक महायुद्ध कुरुक्षेत्र की इसी पावन धरती पर लड़ा गया था, इसलिए इस पूरे क्षेत्र के कण-कण में पौराणिक इतिहास बसा हुआ है। कुरुक्षेत्र के प्रमुख तीर्थ स्थलों में शामिल 'द्रौपदी कूप' का अपना एक विशेष और अटूट धार्मिक महत्व है। हर साल मार्गशीर्ष (अगहन) महीने में जब कुरुक्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय गीता जयंती महोत्सव का भव्य आयोजन होता है, तब देश-विदेश से आने वाले लाखों श्रद्धालु और इतिहास प्रेमी इस पवित्र कुंड के दर्शन करने विशेष रूप से पहुंचते हैं।

वर्तमान में यह स्थान एक प्राचीन कुएं जैसे कुंड के रूप में संरक्षित है, जिसकी सुरक्षा के लिए इसके ऊपरी हिस्से पर एक मजबूत लोहे की जाली लगा दी गई है। स्थानीय लोगों और पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, यही वह वास्तविक भूमि है जहां भीम द्वारा दुशासन के वध के बाद द्रौपदी ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी की थी।

भरी सभा में हुआ था अपमान: क्या थी द्रौपदी की वो अखंड प्रतिज्ञा?

सनातन इतिहास के मुताबिक, महाभारत के उस विनाशकारी युद्ध की मुख्य नींव कौरवों की भरी सभा में द्रौपदी के चीरहरण के प्रयास और उनके घोर अपमान के समय ही रख दी गई थी। द्युत क्रीड़ा (शतरंज के खेल) में जब पांडव अपना सब कुछ हार गए थे, तब दुर्योधन के छोटे भाई दुशासन ने मर्यादाओं को ताक पर रखकर द्रौपदी को उनके कक्ष से बालों से घसीटते हुए भरी सभा में लाकर खड़ा कर दिया था।

उस अत्यंत अपमानजनक क्षण में द्रौपदी ने रोते हुए अपने खुले बालों साक्षी मानकर यह भीषण प्रतिज्ञा ली थी कि वह अपने इन बालों को तब तक नहीं बांधेंगी, जब तक वह दुशासन की छाती के लहू से इन्हें अच्छी तरह भिगो नहीं लेतीं। महाभारत युद्ध के दौरान जब महाबली भीम ने दुशासन की छाती चीरकर उसका वध किया, तब उसी रक्त से द्रौपदी ने अपने केश रंगे और फिर इसी पवित्र कुंड पर आकर उन्हें स्वच्छ किया था।

खाटू श्याम का प्राचीन स्वरूप: इसी परिसर में मौजूद है वीर बर्बरीक का मंदिर

'द्रौपदी कूप' परिसर का ऐतिहासिक महत्व सिर्फ द्रौपदी तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इस परिसर में महाभारत काल के एक और महान योद्धा वीर बर्बरीक का प्राचीन मंदिर भी स्थित है, जिन्हें कलयुग में हम सभी 'खाटू श्याम बाबा' के नाम से पूजते हैं। बर्बरीक वास्तव में महाबली भीम के पुत्र घटोत्कच और नागकन्या हिडिंबा के प्रतापी पुत्र थे। धनुर्विद्या और दैवीय बाणों के संचालन में बर्बरीक इतने सिद्धहस्त थे कि वे महज तीन बाणों से कौरवों और पांडवों की पूरी विशाल सेना को कुछ ही मिनटों में समाप्त करने की क्षमता रखते थे।

उनकी इस असीमित शक्ति को देखते हुए धर्म की रक्षा के लिए भगवान श्री कृष्ण ने दान में उनका शीश मांग लिया था। बर्बरीक ने सहर्ष अपना शीश प्रभु के चरणों में अर्पित कर दिया, लेकिन बदले में यह वचन मांगा कि वे अपनी आंखों से पूरा महाभारत युद्ध देखना चाहते हैं। श्री कृष्ण ने उनके शीश को एक ऊंचे स्थान पर स्थापित कर दिया था। आज इस कूप के दर्शन के साथ-साथ लोग श्याम बाबा के इस ऐतिहासिक विग्रह के सामने भी श्रद्धा से अपना शीश नवाते हैं, जिसका वर्णन श्रीमद्भगवद्गीता के कूट संदर्भों में भी देखने को मिलता है।

 

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