इस बार हरतालिका तीज पर बन रहे दुर्लभ शुभ संयोग, एक साथ मिलेगा पूरे शिव परिवार का अखंड आशीर्वाद
सनातन धर्म में सुहागिन महिलाओं के लिए भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि का विशेष आध्यात्मिक महत्व है। इस दिन रखा जाने वाला हरतालिका तीज व्रत त्याग, तपस्या, प्रेम और निष्ठा का सर्वोच्च प्रतीक माना गया है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी परम पावन तिथि पर माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए अन्न और जल का पूर्ण त्याग कर अत्यंत कठोर निर्जला तप किया था। इस वर्ष का हरतालिका तीज पर्व कई दिव्य खगोलीय और पंचांगीय योगों के निर्माण के कारण और भी अधिक फलदायी बन गया है।
इस बार तृतीया तिथि पर बनने वाले विशेष नक्षत्र और शुभ योगों के चलते व्रती महिलाओं को केवल देवाधिदेव महादेव का ही नहीं, बल्कि माता पार्वती, प्रथम पूज्य भगवान श्री गणेश, सेनापति कार्तिकेय और नंदी जी समेत संपूर्ण शिव परिवार की संयुक्त कृपा प्राप्त होगी। ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार, इस दिन पूजा-अर्चना करने से दांपत्य जीवन में चल रहे बड़े से बड़े क्लेश, गृह-दोष और विवाह में आ रही अप्रत्याशित बाधाएं हमेशा के लिए समाप्त हो जाती हैं।
संपूर्ण शिव परिवार की आराधना का विधान और पंचोपचार पूजन परंपरा
हरतालिका तीज पर केवल एक विग्रह की नहीं, बल्कि बालू रेत या शुद्ध काली मिट्टी से निर्मित पूरे शिव परिवार की प्रतिष्ठा कर पूजन करने की शास्त्रीय परंपरा है। हरतालिका शब्द दो शब्दों 'हरत' (हरण करना) और 'आलिका' (सखी) से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है सखियों द्वारा पार्वती जी का हरण कर उन्हें घने जंगल में साधना के लिए सुरक्षित स्थान पर पहुंचाना।
पूजा की वेदी तैयार करने के लिए सबसे पहले उत्तर या पूर्व दिशा में एक पवित्र चौकी स्थापित की जाती है। उस पर लाल या पीले रंग का स्वच्छ वस्त्र बिछाकर केले के पत्तों का मंडप सजाया जाता है। इसके पश्चात शुद्ध गंगाजल मिश्रित मिट्टी या नदी की बालू से भगवान शिव, माता पार्वती, गणपति बप्पा और कार्तिकेय जी की प्रतिमाएं अपने हाथों से गढ़ी जाती हैं।
पूजन के दौरान भगवान शिव को भस्म, बेलपत्र, धतूरा, आक के श्वेत पुष्प, भांग और शमी पत्र अर्पित किए जाते हैं, वहीं जगत जननी माता पार्वती को सोलह श्रृंगार की संपूर्ण सामग्री, लाल चुनरी, सिंदूर, बिंदी, महावर और हरी चूड़ियां प्रेमपूर्वक भेंट की जाती हैं। गणेश जी को दूर्वा और मोदक का भोग लगाकर पूरे शिव परिवार की धूप, दीप, नैवेद्य और गंध से आरती उतारी जाती है।
हरतालिका तीज व्रत के कठोर नियम: निर्जला साधना और चार प्रहर की पूजा
हरतालिका तीज का व्रत अत्यंत कठिन नियमों से बंधा होता है। यह व्रत निर्जला और निराहार रखा जाता है, अर्थात सूर्योदय से लेकर अगले दिन सूर्योदय के बाद पारण तक जल की एक बूंद भी ग्रहण नहीं की जाती है। यदि कोई महिला एक बार इस व्रत का संकल्प ले लेती है, तो शास्त्रों के अनुसार इसे बीच में तोड़ा नहीं जा सकता, बल्कि आजीवन इसका विधिवत पालन करना अनिवार्य होता है।
इस व्रत की एक अन्य प्रमुख विशेषता 'चार प्रहर की पूजा' है। संध्याकाल में प्रदोष वेला के दौरान मुख्य पूजा संपन्न करने के बाद रात भर जागरण का विधान है। रात्रि के चारों प्रहर में भगवान शिव और माता पार्वती का अभिषेक कर बार-बार हरतालिका तीज व्रत कथा का श्रवण किया जाता है। रात्रि जागरण में महिलाएं मंगल गीत, शिव तांडव स्तोत्र, शिव चालीसा और पार्वती जी की स्तुति गाकर वातावरण को पूरी तरह शिवमय बना देती हैं।
कुंवारी कन्याओं और सुहागिनों के लिए फल: दांपत्य सुख से लेकर मनचाहा वर
हरतालिका तीज का व्रत केवल विवाहित महिलाएं ही नहीं, बल्कि विवाह योग्य कुंवारी कन्याएं भी पूरी श्रद्धा और निष्ठा के साथ रखती हैं।
सुहागिन महिलाओं के लिए यह व्रत उनके पति की दीर्घायु, अखंड सौभाग्य, शारीरिक आरोग्यता और कुल की समृद्धि का रक्षा कवच बनता है। मान्यता है कि जो सुहागिन सच्चे मन से निर्जला व्रत रखकर माता गौरी को सिंदूर अर्पित करती हैं और उसी सिंदूर को अपनी मांग में धारण करती हैं, उनका सुहाग सदा अटल रहता है।
वहीं अविवाहित युवतियों के लिए यह व्रत मनवांछित, गुणवान, संस्कारी और भगवान शिव के समान शांत स्वभाव वाले योग्य जीवनसाथी की प्राप्ति के मार्ग खोलता है। यदि किसी कन्या की कुंडली में सप्तम भाव में कोई क्रूर ग्रह बैठा हो या विवाह में निरंतर अड़चनें आ रही हों, तो हरतालिका तीज पर शिव परिवार का विधि-विधान से पूजन करने पर शीघ्र विवाह के योग निर्मित होते हैं।
पारण का शुभ समय और व्रत समाप्ति की शास्त्रीय विधि
व्रत का पूर्ण फल तभी प्राप्त होता है जब उसका पारण शास्त्र सम्मत विधि से किया जाए। चतुर्थी तिथि के दिन प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान किया जाता है। इसके बाद पुनः स्वच्छ वस्त्र धारण कर चौकी पर विराजमान शिव परिवार की अंतिम पूजा-आरती की जाती है।
पूजन समाप्त होने के बाद माता पार्वती को चढ़ाई गई सुहाग पिटारी, वस्त्र, मिठाई और दक्षिणा किसी योग्य ब्राह्मण की पत्नी या पूज्य सास को सादर चरण स्पर्श करके भेंट की जाती है। इसके पश्चात वेदी पर स्थापित बालू की प्रतिमाओं का विधिवत मंत्रोच्चार के साथ किसी पवित्र जलाशय, नदी या गमले में विसर्जन किया जाता है। विसर्जन संपन्न करने के बाद ही व्रती महिलाएं खीरा, ककड़ी, हलवा या सात्विक भोजन ग्रहण कर अपने निर्जला व्रत का पारण करती हैं।