टाटा संस में 7% स्टेक बेचने का बड़ा प्लान, जुटाएगा ₹25,000 करोड़; शापूर मिस्त्री ने नोएल टाटा को लिखा पत्र

टाटा संस में 7% स्टेक बेचने का बड़ा प्लान, जुटाएगा ₹25,000 करोड़; शापूर मिस्त्री ने नोएल टाटा को लिखा पत्र

देश के 160 साल पुराने दिग्गज कारोबारी घराने शापूरजी पलोनजी (SP) ग्रुप और टाटा समूह के बीच दशकों से चला आ रहा कानूनी और वित्तीय गतिरोध अब एक निर्णायक मोड़ पर पहुंचता दिख रहा है। भारी-भरकम कर्ज के दबाव और महंगी ब्याज दरों से जूझ रहे एसपी ग्रुप ने टाटा संस में अपनी लगभग 18.37 प्रतिशत की कुल हिस्सेदारी में से करीब 7 प्रतिशत हिस्सा बेचने (Monetise) की बड़ी योजना बनाई है। इस आंशिक विनिवेश के जरिए समूह अगले 24 महीनों के भीतर लगभग ₹25,000 करोड़ की नकदी जुटाने की तैयारी में है। एसपी ग्रुप के चेयरमैन शापूर मिस्त्री ने इस संबंध में टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा को एक औपचारिक प्रस्ताव पत्र भेजा है। दोनों पक्षों के बीच इस पेचीदा मसले का सौहार्दपूर्ण समाधान निकालने के लिए उच्चस्तरीय बातचीत शुरू होने की संभावना है।

24 महीने में ₹25,000 करोड़ जुटाने का लक्ष्य, नोएल टाटा को भेजा प्रस्ताव

द इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, शापूर मिस्त्री के नए प्रस्ताव का मुख्य फोकस चरणबद्ध तरीके से नकदी (Cash Payouts) हासिल करना है। इसके तहत एसपी ग्रुप अगले दो वर्षों में लगभग 25 हजार करोड़ रुपये प्राप्त करना चाहता है, ताकि वह अपने तात्कालिक और मध्यम अवधि के वित्तीय दायित्वों को पूरा कर सके।

प्रस्ताव की सबसे खास बात यह है कि इससे टाटा संस को अपनी गैर-सूचीबद्ध (Private Limited Company) पहचान बनाए रखने में मदद मिलेगी। दरअसल, टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा लंबे समय से यह पक्ष रखते रहे हैं कि टाटा संस का प्राइवेट कंपनी का दर्जा बरकरार रहना चाहिए। यदि टाटा संस या उसकी नामित संस्थाएं खुद इस 7% हिस्सेदारी को बायबैक या अधिग्रहित कर लेती हैं, तो किसी बाहरी या विदेशी निवेशक के दखल का जोखिम भी खत्म हो जाएगा। जुलाई तक इस मामले पर टाटा संस के निवर्तमान चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन और नोएल टाटा दोनों से चर्चा चल रही थी। हालांकि, चंद्रशेखरन द्वारा अगले कार्यकाल से इनकार करने के बाद अब कमान सीधे नोएल टाटा और ट्रस्ट के वरिष्ठ प्रतिनिधियों के हाथों में आ गई है।

₹60,000 करोड़ से अधिक का कर्ज: सितंबर में ₹3,500 करोड़ का भुगतान बना सिरदर्द

एसपी ग्रुप के लिए यह हिस्सेदारी बेचना महज एक व्यावसायिक विकल्प नहीं, बल्कि अस्तित्व बचाने की मजबूरी बन चुका है। समूह पर कुल मिलाकर करीब 50,000 से 60,000 करोड़ रुपये का भारी कर्ज बकाया है, जिसका एक बड़ा हिस्सा टाटा संस के शेयरों को गिरवी रखकर जुटाया गया था।

समूह की वित्तीय चुनौतियां निम्नलिखित बिंदुओं से स्पष्ट होती हैं:

  • सितंबर की डेडलाइन: एसपी ग्रुप को सितंबर 2026 के अंत तक लगभग ₹3,500 करोड़ का एक अनिवार्य ऋण भुगतान करना है। यदि यह भुगतान समय पर नहीं होता है, तो कर्जदाता इसे तकनीकी रूप से 'डिफ़ॉल्ट' मान सकते हैं।

  • भारी ब्याज दरें: जुलाई 2026 में समूह ने करीब ₹21,500 करोड़ की रीफाइनेंसिंग पूरी की थी। इन बांड्स पर समूह को लगभग 18 से 19 प्रतिशत की अत्यंत ऊंची ब्याज दर चुकानी पड़ रही है। एसपी ग्रुप का लक्ष्य भविष्य में बेहतर रेटिंग और हिस्सेदारी मुद्रीकरण के जरिए इस लागत को घटाकर 12 प्रतिशत पर लाना है।

  • लेंडर्स का दबाव: अंतरराष्ट्रीय और घरेलू निजी क्रेडिट फंड्स (जैसे सेर्बरस कैपिटल, डेविडसन केंपनर और फैरालोन) ने रीफाइनेंसिंग के समय यह शर्त रखी थी कि अगले 18 से 24 महीनों के भीतर टाटा संस की हिस्सेदारी को कैश कराने का ठोस रास्ता तैयार किया जाए।

शेयर स्वैप बनाम डायरेक्ट बायबैक: क्या हैं संभावित रास्ते?

टाटा संस और एसपी ग्रुप के बीच हिस्सेदारी के मुद्रीकरण को लेकर कई वित्तीय मॉडलों पर विचार किया गया है:

  • शेयर स्वैप मॉडल (Share Swap): शुरुआत में एक विकल्प यह तलाशा गया था कि टाटा संस के 7% अनलिस्टेड शेयरों के बदले एसपी ग्रुप को टाटा समूह की लिस्टेड कंपनियों (जैसे टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज-TCS, टाटा मोटर्स या टाटा पावर) के शेयर दे दिए जाएं। लिस्टेड शेयरों को बाजार में धीरे-धीरे बेचकर नकदी हासिल करना आसान होता। हालांकि, रेगुलेटरी पेचीदगियों और टैक्स नियमों के कारण इस पर आम सहमति नहीं बन सकी।

  • कैश बायबैक (Cash Buyback): शापूर मिस्त्री द्वारा रखा गया ताजा प्रस्ताव डायरेक्ट बायबैक का है। इसके तहत टाटा संस घरेलू या विदेशी बैंकों से फंड जुटाकर एक निश्चित समयसीमा में एसपी ग्रुप को सीधे नकदी भुगतान करे।

  • वैल्यूएशन की खाई: सबसे बड़ा रोड़ा वैल्यूएशन को लेकर है। टाटा संस के पास एयर इंडिया और टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स जैसी अनलिस्टेड कंपनियां भी हैं। एसपी ग्रुप पूरी टाटा संस का मूल्यांकन काफी ऊंचा आंकता है, जबकि टाटा पक्ष रूढ़िवादी वित्तीय मानकों के तहत मूल्यांकन करना चाहता है।

11% से अधिक हिस्सेदारी फिर भी रहेगी बरकरार

यदि 7 प्रतिशत हिस्सेदारी के सौदे पर दोनों पक्षों के बीच अंतिम सहमति बन भी जाती है, तो भी एसपी ग्रुप का टाटा संस से नाता पूरी तरह खत्म नहीं होगा। 18.37% में से 7% बेचने के बाद भी मिस्त्री परिवार के पास टाटा संस की लगभग 11.37% हिस्सेदारी बची रहेगी।

कारोबारी जानकारों का मानना है कि यह आंशिक निकास दोनों पक्षों के लिए 'विन-विन' स्थिति पैदा कर सकता है। एक तरफ जहां एसपी ग्रुप को तत्काल नकदी मिलकर दिवालिया होने या डिफॉल्ट के खतरे से राहत मिलेगी, वहीं दूसरी ओर टाटा संस को आरबीआई के अपर-लेयर एनबीएफसी लिस्टिंग नियमों के दबाव के बीच अपने शेयरहोल्डिंग विवाद को सुलझाने का एक सुरक्षित और नियंत्रित रास्ता मिल जाएगा। आने वाले दिनों में टाटा संस बोर्ड और टाटा ट्रस्ट्स की बैठकों में इस प्रस्ताव की रूपरेखा पर आधिकारिक मुहर लग सकती है।

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