प्राइवेट स्कूल के शिक्षकों के लिए एक समान वेतन और पेंशन की मांग, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों से मांगा जवाब
देश भर के मान्यता प्राप्त गैर-सहायता प्राप्त (Private Unaided) स्कूलों में सेवाएं दे रहे 37 लाख से अधिक शिक्षकों की सेवा शर्तों, सामाजिक सुरक्षा और सेवानिवृत्ति के बाद वित्तीय संरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा संज्ञान लिया है। सर्वोच्च अदालत ने निजी स्कूलों के शिक्षकों के लिए एकसमान न्यूनतम राष्ट्रीय नीति, पेंशन, ग्रेच्युटी और अन्य सामाजिक लाभ सुनिश्चित करने वाली जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार, सभी राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों और राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद (NCTE) को नोटिस जारी कर औपचारिक जवाब तलब किया है।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने इस मामले को राष्ट्रीय महत्व का मानते हुए सभी संबंधित पक्षों को चार सप्ताह के भीतर अपना रुख स्पष्ट करने का निर्देश दिया है।
UDISE+ डेटा का हवाला: 37 लाख से अधिक शिक्षक बुनियादी सुरक्षा से वंचित
यह जनहित याचिका 'ऑल-इंडिया टीचर्स फेडरेशन' की नेशनल कोऑर्डिनेटर लिगीमोल जॉर्ज द्वारा अधिवक्ता दीपक प्रकाश के माध्यम से दायर की गई है। याचिका में केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के आधिकारिक यूडीआईएसई प्लस (UDISE+ 2023–24) रिपोर्ट के आंकड़ों का हवाला देते हुए देश में निजी शिक्षकों की वास्तविक स्थिति को रेखांकित किया गया है:
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देश भर में लगभग 14.72 लाख स्कूल संचालित हैं, जिनमें 98 लाख से अधिक शिक्षक और 24.8 करोड़ छात्र पंजीकृत हैं।
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इनमें से अकेले 37,30,047 शिक्षक मान्यता प्राप्त निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों में कार्यरत हैं।
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याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि देश के शिक्षण कार्यबल (National Teaching Workforce) का एक तिहाई से अधिक हिस्सा होने के बावजूद निजी स्कूल के शिक्षक आज भी अलग-अलग राज्यों के असंगत कानूनों, संस्थानों के मनमाने नियमों और संविदात्मक शर्तों पर निर्भर रहने को विवश हैं।
'आर्टिकल 21A का दायित्व निभा रहे, लेकिन बुढ़ापे में कोई सहारा नहीं'
याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), 21 (गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार) और 21A (अनिवार्य व मुफ्त शिक्षा का अधिकार) का हवाला देते हुए कहा गया है कि निजी स्कूल शिक्षक सरकारी स्कूलों के शिक्षकों के समान ही महत्वपूर्ण शैक्षणिक जिम्मेदारियां निभाते हैं।
इसके बावजूद, एक ही योग्यता और समान काम करने वाले शिक्षकों को अलग-अलग राज्यों और संस्थानों में बेहद कम और असमान वेतन दिया जाता है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि कई दशकों तक शिक्षण कार्य करने के बाद भी अधिकांश निजी शिक्षक बिना किसी ठोस पेंशन, स्वास्थ्य बीमा, ग्रेच्युटी या सामाजिक सुरक्षा के सेवानिवृत्त हो जाते हैं। इसके कारण बुढ़ापे में या गंभीर बीमारी की स्थिति में वे और उनके परिजन गंभीर वित्तीय संकट में फंस जाते हैं।
नेशनल वेलफेयर बोर्ड और वैधानिक नीति बनाने की मांग
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष दायर याचिका में निजी शिक्षकों के हितों के संरक्षण के लिए कई प्रमुख वैधानिक और नीतिगत कदम उठाने की मांग की गई है:
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राष्ट्रीय नीति व वैधानिक ढांचा: केंद्र सरकार को समयबद्ध तरीके से एक व्यापक राष्ट्रीय नीति और कानून बनाने का निर्देश दिया जाए, जिसके तहत निजी शिक्षकों के न्यूनतम वेतनमान, पेंशन और सामाजिक सुरक्षा के मानक तय हों।
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नेशनल प्राइवेट स्कूल टीचर्स वेलफेयर बोर्ड: निर्माण श्रमिकों और अन्य असंगठित क्षेत्रों की तर्ज पर निजी स्कूल शिक्षकों के लिए एक समर्पित राष्ट्रीय कल्याणकारी बोर्ड का गठन किया जाए, जो पेंशन, पीएफ, ग्रेच्युटी और अन्य लाभों की निगरानी करे।
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मेडिकल व जीवन बीमा संरक्षण: शिक्षकों और उनके आश्रितों के लिए व्यापक स्वास्थ्य बीमा, दुर्घटना बीमा और विकलांगता लाभ अनिवार्य किए जाएं।
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विशेषज्ञ समिति की समीक्षा: याचिका में यह भी सुझाव दिया गया है कि शिक्षा, श्रम और वित्त मंत्रालयों के विशेषज्ञों की एक अंतर-मंत्रालयी समिति बनाई जाए, जो मौजूदा श्रम कानूनों (जैसे EPF Act, Gratuity Act और सोशल सिक्योरिटी कोड 2020) के क्रियान्वयन में आ रही विसंगतियों की जांच करे।
याचिकाकर्ता ने स्पष्ट किया है कि यह याचिका किसी एक स्कूल प्रबंधन के आंतरिक प्रशासन में दखल देने या व्यक्तिगत विवादों के निपटारे के लिए नहीं है, बल्कि देश भर के लाखों शिक्षकों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए एक संस्थागत और राष्ट्रव्यापी कानूनी ढांचा स्थापित करने के उद्देश्य से लाई गई है। सर्वोच्च अदालत द्वारा जारी नोटिस के बाद अब चार हफ़्तों में आने वाले केंद्र और राज्य सरकारों के हलफनामे पर देशभर के शैक्षणिक जगत की नजरें टिकी हुई हैं।