अमेरिका से चार साल बाद लौटी डायमंड जूलरी की मांग

अमेरिका से चार साल बाद लौटी डायमंड जूलरी की मांग

भारतीय हीरा उद्योग और जेम्स एंड ज्वैलरी सेक्टर के लिए पिछले कुछ साल वैश्विक मंदी, भू-राजनीतिक तनाव और अमेरिका व यूरोप के बाजारों में सुस्ती के कारण काफी चुनौतीपूर्ण रहे थे। लेकिन अब दुनिया के सबसे बड़े डायमंड कटिंग और पॉलिशिंग हब गुजरात के सूरत से एक बेहद राहत भरी और उत्साहजनक खबर सामने आई है। कोविड महामारी और उसके बाद उपजे अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संकट के करीब चार लंबे वर्षों के बाद आखिरकार अमेरिकी बाजार से डायमंड जूलरी और तराशे हुए हीरों की मांग में जबरदस्त उछाल देखने को मिला है। अमेरिका में जैसे ही त्योहारी सीजन और खुदरा बिक्री में तेजी आई है, वहां के बड़े ब्रांड्स और खरीदारों ने सूरत के निर्यातकों को भारी-भरकम ऑर्डर्स भेजने शुरू कर दिए हैं। इस शानदार वापसी से जहां एक ओर सूरत के हीरा व्यापारियों और मिल मालिकों के चेहरे खिल उठे हैं, वहीं दूसरी ओर एक बहुत बड़ी व्यावहारिक समस्या भी खड़ी हो गई है। हीरा नगरी सूरत में अचानक मांग बढ़ने के कारण उच्च गुणवत्ता वाले कच्चे हीरों (रफ डायमंड्स) और कुशल कारीगरों की भारी कमी महसूस होने लगी है, जिससे समय पर ऑर्डर्स पूरा करना बड़ी चुनौती बन गया है।

चार साल का लंबा सन्नाटा टूटा: अमेरिकी बाजार से अचानक क्यों बढ़ी हीरों की चमक?

पिछले चार वर्षों से अंतरराष्ट्रीय बाजार में मुद्रास्फीति, ब्याज दरों में बढ़ोतरी और उपभोक्ताओं की बदलती प्राथमिकताओं के कारण डायमंड जूलरी की मांग अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई थी। सूरत के कई छोटे और मध्यम आकार के हीरा कारखाने या तो बंद हो गए थे या फिर उन्होंने अपने उत्पादन को आधा कर दिया था। लेकिन अब अमेरिकी अर्थव्यवस्था में सुधार और वहां के आगामी गिफ्टिंग सीजन को देखते हुए डायमंड ज्वैलरी की मांग में ऐतिहासिक तेजी दर्ज की गई है। अमेरिका दुनिया में तराशे हुए हीरों का सबसे बड़ा आयातक देश है, और जब वहां से बड़े पैमाने पर मांग निकलती है, तो उसका सीधा फायदा भारत और खासकर गुजरात के सूरत व मुंबई के बाजार को मिलता है। इस अचानक आई तेजी से सूरत के हीरा बाजार में बरसों से छाया सन्नाटा अब खत्म हो चुका है और कटिंग-पॉलिशिंग यूनिट्स में एक बार फिर से मशीनों की गड़गड़ाहट और कामगारों की हलचल तेज हो गई है।

'सूरत में कम पड़ गए हीरे': अचानक ऑर्डर्स आने से क्यों गहराया कच्चे माल और कारीगरों का संकट?

एक तरफ जहां अमेरिकी बाजार से मिले नए ऑर्डर्स ने हीरा कारोबारियों में नई जान फूंक दी है, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय स्तर पर खड़ी हुई समस्याओं ने उनकी चिंताएं बढ़ा दी हैं। सूरत के हीरा उद्योग से जुड़े जानकारों का कहना है कि अचानक मांग बढ़ने के कारण बाजार में 'रफ डायमंड्स' (कच्चे हीरे) की आपूर्ति पर्याप्त मात्रा में नहीं हो पा रही है। इसके मुख्य कारणों में अंतरराष्ट्रीय खदानों से कच्चे हीरों की कम माइनिंग और वैश्विक स्तर पर सप्लाई चेन में आई रुकावटें शामिल हैं। इसके अलावा, पिछले कुछ वर्षों के दौरान मंदी के इस लंबे दौर में बड़ी संख्या में कुशल हीरा कारीगर और कामगार अन्य क्षेत्रों (जैसे वस्त्र उद्योग, कंस्ट्रक्शन या छोटे व्यवसायों) में पलायन कर चुके थे। अब जब अचानक काम का भारी दबाव आया है, तो उन अनुभवी और कुशल कारीगरों की भारी कमी महसूस हो रही है। कम कारीगरों और कच्चे माल की किल्लत के चलते व्यापारियों के लिए तय समय सीमा के भीतर अमेरिकी खरीदारों के ऑर्डर्स को पूरा करना एक टेढ़ी खीर साबित हो रहा है।

ग्लोबल डिमांड और स्थानीय चुनौतियों के बीच सूरत के हीरा उद्योग का भविष्य

आधुनिक जनरेटिव सर्च, एसईओ और एईओ गाइलाइन के दृष्टिकोण से देखा जाए तो सूरत का हीरा उद्योग इस समय एक बहुत बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। व्यापारियों का मानना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे हीरों की आपूर्ति जल्द ही सुचारू नहीं हुई, तो इस शानदार मौके का पूरा लाभ उठाने से उद्योग चूक सकता है। हालांकि, कई बड़ी हीरा कंपनियों ने अब आधुनिक तकनीक, लेजर कटिंग मशीनों और ऑटोमेशन का सहारा लेना शुरू कर दिया है ताकि कम कामगारों के बावजूद तेजी से उत्पादन किया जा सके। इसके साथ ही, स्थानीय स्तर पर युवाओं को विशेष प्रशिक्षण देकर हीरा उद्योग से जोड़ने के प्रयास भी किए जा रहे हैं। अमेरिका से लौटी यह मांग यदि लंबे समय तक बनी रही, तो यह न केवल सूरत की अर्थव्यवस्था को बल्कि भारत के कुल रत्न एवं आभूषण निर्यात को एक नई ऊंचाइयों पर ले जाने का काम करेगी। आने वाले महीनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि सूरत के व्यापारी इस बड़े संकट से पार पाते हुए अमेरिकी बाजार की उम्मीदों पर कैसे खरे उतरते हैं।