सितंबर तिमाही में सुस्त पड़ी एफएमसीजी सेक्टर की रफ्तार
भारतीय बाजार और खुदरा उपभोक्ता सामान (FMCG) उद्योग के मोर्चे पर सितंबर तिमाही (Q2) के आंकड़े हैरान करने वाले सामने आए हैं। देश के फास्ट-मूवींग कंज्यूमर गुड्स सेक्टर की कुल विकास दर में इस तिमाही के दौरान हल्की सुस्ती दर्ज की गई है। बाजार विश्लेषकों और विभिन्न शोध रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस सुस्त माहौल का असर सभी कंपनियों पर एक समान नहीं पड़ा है। जहां एक ओर हिंदुस्तान यूनिलीवर (HUL), नेस्ले, मारिको और ब्रिटानिया जैसी देश-दुनिया की दिग्गज और लिस्टेड बड़ी कंपनियों ने अपने मजबूत डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क और पूंजी के दम पर शानदार प्रदर्शन किया है और अपनी बाजार हिस्सेदारी (Market Share) को और मजबूत किया है, वहीं दूसरी ओर असंगठित क्षेत्र के छोटे निर्माताओं, क्षेत्रीय ब्रांड्स और स्टार्टअप्स को महंगाई और कमोडिटी की ऊंची कीमतों के कारण भारी नुकसान का सामना करना पड़ा है। बाजार के इस अनूठे समीकरण ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि विपरीत आर्थिक परिस्थितियों में बड़े कॉर्पोरेट घराने छोटी कंपनियों पर हमेशा भारी पड़ जाते हैं।
#1 क्या रही सितंबर तिमाही में एफएमसीजी सेक्टर की असल तस्वीर और क्यों आई सुस्ती?
मार्केट रिसर्च फर्म्स और इंडस्ट्री के आंकड़ों पर नजर डालें तो सितंबर तिमाही में देश के एफएमसीजी सेक्टर की कुल वॉल्यूम ग्रोथ सुस्त होकर लगभग 3.6 प्रतिशत के आसपास सिमट गई, जो कि पिछले कुछ तिमहिओं की तुलना में काफी कम है। इस सुस्ती के पीछे मुख्य वजह बढ़ती खुदरा महंगाई, खाद्य पदार्थों के ऊंचे दाम और ग्रामीण इलाकों (Rural Markets) में मांग का उस रफ्तार से न बढ़ना बताया जा रहा है जिसकी उम्मीद की जा रही थी। हालांकि शहरी क्षेत्रों में आधुनिक ट्रेड (Modern Trade) और ई-कॉमर्स चैनलों के जरिए खपत में थोड़ी तेजी जरूर बनी रही, लेकिन ग्रामीण भारत के बाजारों में उपभोक्ताओं ने अपनी जेबें थोड़ी कस लीं। इन तमाम आर्थिक और मौसमी चुनौतियों के बीच बाजार का पूरा फायदा उन बड़ी कंपनियों को मिला जिनके पास सप्लाई चेन को मैनेज करने के लिए अथाह पूंजी और आधुनिक तकनीक मौजूद थी।
#1 बड़ी कंपनियों का शानदार प्रदर्शन: HUL से लेकर मारिको और नेस्ले तक ने मारी बाजी
जहां एक तरफ बाजार में मांग घटने और लागत बढ़ने का रोना रोया जा रहा था, वहीं देश की शीर्ष एफएमसीजी कंपनियों ने अपने तिमाही परिणामों से सभी को चौंका दिया। देश की सबसे बड़ी एफएमसीजी कंपनी हिंदुस्तान यूनिलीवर (HUL) ने मजबूत वॉल्यूम ग्रोथ दर्ज की। इसके अलावा मारिको का भारतीय कारोबार, गोदरेज कंज्यूमर प्रोडक्ट्स और नेस्ले जैसी दिग्गज कंपनियों ने भी ठीक-ठाक या डबल डिजिट के करीब कारोबार बढ़ाया। बड़ी कंपनियों की इस सफलता के पीछे उनकी मजबूत क्रय शक्ति (Purchasing Power) और लागत नियंत्रण की क्षमता है। जब कच्चे माल, पाम ऑयल, क्रूड ऑयल और पैकेजिंग मटेरियल के दाम बढ़े, तो इन बड़ी कंपनियों ने अपने प्रोडक्ट्स की कीमतों में बहुत मामूली बदलाव किए या अपनी ब्रांड वैल्यू के दम पर उसे आसानी से संभाल लिया, जिससे उनके मुनाफे पर उतना बुरा असर नहीं पड़ा जितना छोटे खिलाड़ियों पर पड़ा।
#1 क्यों संकट में फंसे छोटे ब्रांड्स और स्थानीय निर्माता?
दूसरी ओर, इस पूरी मंदी और सुस्ती के दौर में सबसे बुरी मार छोटे और क्षेत्रीय (Regional) ब्रांड्स पर पड़ी है। छोटे निर्माताओं के सामने सबसे बड़ी समस्या कच्चे माल की कमी, महंगे डिस्ट्रीब्यूशन खर्च और पैकेजिंग सामग्री के बढ़ते दाम रहे। इसके अलावा, त्योहारी सीजन से ठीक पहले लॉजिस्टिक्स और कमर्शियल गैस की कीमतों में उतार-चढ़ाव ने उनकी कमर तोड़ दी। जानकारों का कहना है कि छोटे खिलाड़ियों के पास बड़े कॉर्पोरेट घरानों की तरह भारी-भरकम रिजर्व फंड नहीं होता है, जिसके कारण वे बाजार के छोटे से झटके को भी सहन नहीं कर पाते। जब इन कंपनियों को महंगे दामों पर कच्चा माल खरीदना पड़ा, तो उनके उत्पाद की लागत बढ़ गई और वे बड़ी कंपनियों के साथ मूल्य प्रतिस्पर्धा (Price Competition) में टिक नहीं पाए, जिसके चलते कई छोटे ब्रांड्स की बिक्री धड़ाम हो गई।
#1 आने वाले त्योहारों और सर्दियों के सीजन से इंडस्ट्री को बड़ी उम्मीदें
सितंबर तिमाही के मिले-जुले रुझानों के बाद अब पूरे उद्योग की नजरें आने वाली सर्दियों और त्योहारी सीजन पर टिकी हुई हैं। कंपनियों का मानना है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुधार और सरकार द्वारा उठाए जा रहे कदमों से मांग में तेजी आएगी। हालांकि, पाम ऑयल और अन्य खाद्य तेलों के वैश्विक दामों में उतार-चढ़ाव अभी भी कंपनियों के मार्फत मार्जिन पर दबाव बना हुआ है। कुल मिलाकर, यह साफ है कि एफएमसीजी बाजार का यह दौर छोटे खिलाड़ियों के लिए अस्तित्व की लड़ाई जैसा बन चुका है, जबकि बड़ी कंपनियां अपनी वित्तीय ताकत के बल पर इस मंदी को अवसर में बदलने में पूरी तरह कामयाब रही हैं।