'श्यामा: द मिसिंग चैप्टर' का एलान, कश्मीर आंदोलन और अनसुलझे पन्नों से उठेगा पर्दा

'श्यामा: द मिसिंग चैप्टर' का एलान, कश्मीर आंदोलन और अनसुलझे पन्नों से उठेगा पर्दा

भारतीय यथार्थवादी सिनेमा में अपनी विशिष्ट और साहसिक शैली के लिए पहचाने जाने वाले राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्म निर्देशक मधुर भंडारकर ने भारतीय राजनीति के एक बेहद प्रभावशाली और ऐतिहासिक महापुरुष के जीवन को बड़े पर्दे पर उतारने का बड़ा फैसला किया है। मधुर भंडारकर जनसंघ के संस्थापक और प्रखर राष्ट्रवादी विचारक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन और संघर्षों पर एक व्यापक बायोग्राफिकल फिल्म बनाने जा रहे हैं। शुक्रवार को पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में आयोजित एक विशेष प्रेस वार्ता के दौरान मधुर भंडारकर ने इस प्रोजेक्ट का आधिकारिक एलान किया। 'श्यामा: द मिसिंग चैप्टर' (Shyama: The Missing Chapter) के नाम से बनने वाली यह फिल्म भारतीय इतिहास के उन पन्नों और घटनाओं को सामने लाएगी, जिन्हें मुख्यधारा के विमर्श में अक्सर अनदेखा कर दिया गया। कोलकाता के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य से सीधे जुड़ी इस घोषणा के बाद से ही सिनेमा जगत और राजनीतिक विश्लेषकों के बीच इस बात को लेकर भारी उत्सुकता देखी जा रही है कि आखिर भंडारकर इस संवेदनशील और ऐतिहासिक विषय को सेल्युलाइड पर किस तरह पेश करेंगे।

2027 में शुरू होगी शूटिंग: कास्ट और लोकेशंस को लेकर बना हुआ है गहरा सस्पेंस

प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान फिल्म की बुनियादी रूपरेखा साझा करते हुए निर्देशक मधुर भंडारकर ने बताया कि इस बड़े ऐतिहासिक प्रोजेक्ट की शूटिंग अगले साल यानी वर्ष 2027 में विधिवत रूप से शुरू की जाएगी। हालांकि, फिल्म की मुख्य स्टार कास्ट को लेकर अभी मेकर्स ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के कद और उनके चेहरे-मोहरे से मेल खाते हुए किस मुख्य अभिनेता को इस मुख्य भूमिका के लिए चुना जाएगा, इसकी आधिकारिक जानकारी अभी सार्वजनिक नहीं की गई है। इसके साथ ही शूटिंग की सटीक लोकेशंस, तकनीकी टीम और फिल्म की अंतिम रिलीज डेट की घोषणा भी आने वाले कुछ महीनों में एक भव्य समारोह के जरिए की जाएगी। फिल्म के निर्माताओं का कहना है कि चूंकि यह एक पीरियड ड्रामा है जिसमें 1930 के दशक से लेकर 1953 तक के भारत के सामाजिक और राजनीतिक वातावरण को जीवंत करना है, इसलिए इसके प्री-प्रोडक्शन, गहन ऐतिहासिक रिसर्च, सेट्स के निर्माण और कॉस्ट्यूम डिजाइनिंग पर काफी समय और बारीकी से काम किया जा रहा है।

कलकत्ता यूनिवर्सिटी के सबसे युवा वीसी से लेकर नेहरू कैबिनेट तक: जनसंघ की स्थापना के पीछे का सच

'श्यामा: द मिसिंग चैप्टर' की पटकथा में डॉ. मुखर्जी के सार्वजनिक और शैक्षणिक जीवन के कई ऐतिहासिक पड़ावों को गहराई से पिरोया जाएगा। फिल्म में दिखाया जाएगा कि कैसे महज 33 वर्ष की असाधारण उम्र में वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे युवा कुलपति (वाइस चांसलर) बने और शिक्षा व्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव किए। इसके बाद आजादी के तुरंत बाद प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में बनी स्वतंत्र भारत की पहली अंतरिम राष्ट्रीय मंत्रिपरिषद में उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री के रूप में उनके योगदान को भी पर्दे पर उकेरा जाएगा। फिल्म का एक बेहद अहम और नाटकीय हिस्सा तत्कालीन नेहरू सरकार के साथ उनके गहरे वैचारिक मतभेदों, विशेष रूप से पूर्वी पाकिस्तान में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों और नेहरू-लियाकत समझौते के विरोध में उनके कैबिनेट से दिए गए ऐतिहासिक इस्तीफे पर केंद्रित होगा। सरकार से अलग होकर 1951 में भारतीय जनसंघ (वर्तमान भारतीय जनता पार्टी की पूर्ववर्ती संस्था) की नींव रखने और देश में एक मजबूत राष्ट्रवादी राजनीतिक विकल्प खड़ा करने के उनके अभूतपूर्व संघर्ष को फिल्म में विस्तृत रूप से दिखाया जाएगा।

'एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे': 1953 के ऐतिहासिक कश्मीर आंदोलन की पूरी दास्तान

फिल्म की कहानी का सबसे भावनात्मक, संवेदनशील और केंद्रीय स्तंभ वर्ष 1953 में जम्मू-कश्मीर में लागू विशेष दर्जे और विवादित परमिट व्यवस्था के खिलाफ डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा छेड़ा गया ऐतिहासिक आंदोलन होगा। उस दौर में भारत के किसी भी आम नागरिक को अपने ही देश के अभिन्न अंग जम्मू-कश्मीर में दाखिल होने के लिए विशेष आधिकारिक परमिट लेना पड़ता था। इसके विरोध में डॉ. मुखर्जी ने 'एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे' का अमर उद्घोष करते हुए बिना परमिट कश्मीर कूच का बिगुल फूंका था। 11 मई 1953 को सीमा पार करते ही उन्हें गिरफ्तार कर श्रीनगर की जेल में नजरबंद कर दिया गया, जहां संदिग्ध परिस्थितियों में 23 जून 1953 को उनका देहांत हो गया। फिल्म के निर्माता आदित्य कुमार हलवासिया ने कोलकाता में कहा कि डॉ. मुखर्जी का पूरा जीवन अदम्य साहस, चट्टानी संकल्प और निस्वार्थ राष्ट्रसेवा की सर्वोच्च मिसाल है। उन्होंने जोर देकर कहा कि इस फिल्म के निर्माण का मुख्य उद्देश्य भारत की युवा पीढ़ी को इस महान राष्ट्रवादी नेता के अद्वितीय योगदान, देश की संप्रभुता के लिए उनके बलिदान और भारतीय इतिहास के उन पहलुओं से रू-ब-रू कराना है जो अब तक अनछुए रहे हैं।

मधुर भंडारकर के लिए बड़ी चुनौती: ऐतिहासिक सच्चाई और राजनीतिक रोमांच का होगा अनूठा संगम

'चांदनी बार', 'पेज 3', 'कॉरपोरेट', 'ट्रैफिक सिग्नल' और 'फैशन' जैसी कल्ट सामाजिक फिल्मों के जरिए भारतीय सिनेमा में मील का पत्थर साबित हो चुके निर्देशक मधुर भंडारकर ने इस बायोपिक को अपने करियर की सबसे बड़ी रचनात्मक चुनौती और जिम्मेदारी करार दिया है। मधुर भंडारकर ने कहा कि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसी विशालकाय शख्सियत के जीवन, उनके दर्शन और उनके निर्णयों को पर्दे पर ईमानदारी के साथ प्रस्तुत करना बेहद संजीदा काम है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे इस कहानी को केवल एक नीरस दस्तावेजी प्रारूप में नहीं, बल्कि एक उच्च स्तरीय ऐतिहासिक ड्रामा (Historical Drama) और तीखे राजनीतिक रोमांच (Political Thriller) के अनूठे मेल के रूप में दर्शकों के सामने लाएंगे। उनका प्रयास यह सुनिश्चित करना है कि तथ्यों की शुद्धता और गरिमा को बनाए रखते हुए समकालीन सिनेमाई दृष्टिकोण के साथ इतिहास के इस अनसुलझे और प्रेरक अध्याय को दुनिया के सामने पूरी सत्यनिष्ठा के साथ रखा जाए।