शंभूशरण पाल हत्याकांड में इलाहाबाद HC का बड़ा फैसला, 31 साल पुराने केस में गैर इरादतन हत्या माना

शंभूशरण पाल हत्याकांड में इलाहाबाद HC का बड़ा फैसला, 31 साल पुराने केस में गैर इरादतन हत्या माना

उत्तर प्रदेश की सियासत और न्यायपालिका से जुड़ी एक अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक खबर सामने आई है। बस्ती जिले के तीन दशक से भी अधिक पुराने बहुचर्चित शंभूशरण पाल हत्याकांड में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने निचली अदालत द्वारा पूर्व विधायक रामकरन आर्य को सुनाई गई आजीवन कारावास (उम्रकैद) की सजा को संशोधित कर दिया है। उच्च न्यायालय ने मामले के तमाम साक्ष्यों, गवाहियों और घटनाक्रम की परिस्थितियों का सूक्ष्म विश्लेषण करते हुए इसे पूर्व नियोजित हत्या (धारा 302) के दायरे से बाहर माना और इसे अचानक हुए विवाद के चलते गैर इरादतन हत्या (Culpable Homicide Not Amounting to Murder) करार दिया। इसके साथ ही अदालत ने पूर्व विधायक की सजा को घटाकर 10 वर्ष के कठोर कारावास में तब्दील कर दिया है, जबकि अन्य सात सह-आरोपियों को बरी किए जाने के ट्रायल कोर्ट के फैसले को पूरी तरह बरकरार रखते हुए राज्य सरकार द्वारा दायर की गई अपील को सिरे से खारिज कर दिया है।

23 नवंबर 1994 की खूनी वारदात: जगदंबिका पाल की रैली में जाते समय जीपों की टक्कर से भड़का था विवाद

यह पूरा सनसनीखेज मामला 23 नवंबर 1994 का है, जिसने उस दौर में बस्ती जिले से लेकर पूरे पूर्वांचल की राजनीति में भारी भूचाल ला दिया था। दर्ज प्राथमिकी के अनुसार, तत्कालीन सदर विधायक जगदंबिका पाल की वाल्टरगंज क्षेत्र में आयोजित एक बड़ी राजनीतिक रैली में शामिल होने के लिए शंभूशरण पाल अपने साथियों के साथ जीप पर सवार होकर निकले थे। जैसे ही उनकी गाड़ी बस्ती शहर के आवास विकास गेट के पास पहुंची और रुकी, तभी पीछे से नगर पूर्व विधानसभा क्षेत्र के तत्कालीन विधायक रामकरन आर्य की जीप आ गई। अचानक ब्रेक फेल होने या असंतुलन की वजह से दोनों जीपों में हल्की टक्कर हो गई। यह सामान्य सा दिखने वाला सड़क विवाद देखते ही देखते राजनीतिक रंजिश और तीखी नोकझोंक में बदल गया। आरोप था कि कहासुनी और गाली-गलौज के दौरान गुस्से में आकर तत्कालीन विधायक रामकरन आर्य ने अपने साथ मौजूद सुरक्षाकर्मी या साथी से बंदूक छीन ली और सीधे शंभूशरण पाल की गर्दन पर गोली दाग दी, जिससे मौके पर ही उनकी मौत हो गई थी।

बस्ती सत्र न्यायालय ने 2017 में सुनाई थी उम्रकैद: 7 अन्य सह-आरोपियों को साक्ष्य के अभाव में किया था बरी

इस खूनी संघर्ष के बाद बस्ती कोतवाली में हत्या समेत कई गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज हुआ था। मामले की लंबी अदालती सुनवाई के बाद बस्ती की सत्र अदालत (ट्रायल कोर्ट) ने घटना के करीब 23 साल बाद यानी 10 अप्रैल 2017 को अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। सत्र अदालत ने मुख्य अभियुक्त रामकरन आर्य को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 के तहत हत्या का दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास और 20 हजार रुपये के अर्थदंड की सजा सुनाई थी। इसके अलावा धारा 504 और 506 में भी अतिरिक्त कारावास मुकर्रर किया गया था। हालांकि, निचली अदालत ने मुकदमे में नामजद अन्य सात सह-अभियुक्तों राम उजागिर, ओम प्रकाश, उस्मान उर्फ यूसुफ, अमरचंद, संतराम, राम प्यारे, सिपाही रूपेन्द्र कुजूर और बनारसी प्रसाद को पर्याप्त सबूत न मिलने के चलते बाइज्जत बरी कर दिया था। इस फैसले के खिलाफ पूर्व विधायक रामकरन आर्य ने उच्च न्यायालय में आपराधिक अपील दाखिल की थी, वहीं उत्तर प्रदेश सरकार ने सात अन्य आरोपियों को बरी किए जाने के आदेश को चुनौती देते हुए अपील दायर की थी।

जस्टिस सिद्धार्थ वर्मा और जस्टिस जय कृष्ण उपाध्याय की बेंच का फैसला: धारा 300 के अपवाद-4 में आया अपराध

इलाहाबाद उच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा और न्यायमूर्ति जय कृष्ण उपाध्याय की दो सदस्यीय खंडपीठ के समक्ष इस मामले की विस्तृत अंतिम सुनवाई हुई। बचाव पक्ष के वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने पुरजोर दलील दी कि यह घटना पूर्व नियोजित तरीके से किसी को जान से मारने के इरादे से नहीं की गई थी, बल्कि सड़क पर गाड़ियों की अचानक टक्कर के बाद पैदा हुए विवाद का तात्कालिक नतीजा थी। बचाव पक्ष ने गवाहों के राजनीतिक रूप से प्रेरित होने और एफआईआर के समय पर भी सवाल उठाए। उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने पत्रावली पर मौजूद मेडिकल रिपोर्ट, गवाहों के बयानों और परिस्थितियों का गहन अध्ययन करने के बाद निष्कर्ष निकाला कि दोनों पक्षों के बीच कोई पूर्व नियोजित षड्यंत्र या पुरानी रंजिश साबित नहीं होती। दोनों जीपों की अप्रत्याशित टक्कर के बाद गाली-गलौज और वाद-विवाद हुआ, जिसमें आवेश और आक्रोश के क्षणों में गोली चली।

धारा 302 से बदलकर 304 पार्ट-एक में तय हुई 10 साल की कैद: सरकार की अपील खारिज, जुर्माना रहेगा बरकरार

अदालत ने अपने विधिक निष्कर्ष में रेखांकित किया कि अभियुक्त का यह कृत्य भारतीय दंड संहिता की धारा 300 के 'अपवाद-4' (अचानक हुए झगड़े और बिना किसी पूर्व योजना के आवेश में किया गया अपराध) के अंतर्गत आता है। इसके अलावा अन्य अभियुक्तों की कोई सीधी संलिप्तता, साझा उद्देश्य (कॉमन ऑब्जेक्ट) या हथियार लहराने की भूमिका साबित नहीं हो सकी। इन्हीं कानूनी आधारों पर हाई कोर्ट ने पूर्व विधायक रामकरन आर्य की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए उनकी सजा को हत्या (आईपीसी 302) से गैर इरादतन हत्या (आईपीसी की धारा 304 पार्ट-एक) में तब्दील कर दिया और उन्हें 10 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई। अदालत ने निचली अदालत द्वारा लगाए गए 20 हजार रुपये के जुर्माने को यथावत बनाए रखा है। साथ ही अन्य सात आरोपियों को बरी किए जाने के सत्र अदालत के निर्णय को पूरी तरह न्यायसंगत मानते हुए राज्य सरकार की अपील को खारिज कर दिया। 31 साल पुराने इस मामले में उच्च न्यायालय के इस फैसले को उत्तर प्रदेश के विधिक और राजनीतिक गलियारों में एक नजीर के रूप में देखा जा रहा है।