नींद खुलते ही तकिए पर दिखते हैं लार के निशान, सामान्य समझकर न करें नजरअंदाज
सुबह उठते ही बिस्तर या तकिए पर गीलापन यानी लार के निशान दिखना एक आम अनुभव हो सकता है। अधिकतर लोग इसे गहरी और सुकून भरी नींद का संकेत समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। चिकित्सकीय दृष्टि से नींद के दौरान शरीर और चेहरे की मांसपेशियों का पूरी तरह शिथिल हो जाना स्वाभाविक है, जिसके कारण कभी-कभार मुंह का हल्का खुल जाना और लार का बाहर बह जाना कोई असामान्य घटना नहीं मानी जाती। मानव शरीर रोजाना लगभग एक से डेढ़ लीटर लार का उत्पादन करता है, जो पाचन, दांतों की सुरक्षा और मुंह में नमी बनाए रखने के लिए बेहद जरूरी है। जागते समय हम बिना सोचे-समझे इस लार को लगातार निगलते रहते हैं, लेकिन गहरी नींद में निगलने की यह स्वाभाविक प्रक्रिया धीमी पड़ जाती है। जब कोई व्यक्ति करवट लेकर या पेट के बल सोता है, तो गुरुत्वाकर्षण के कारण यह लार मुंह के किनारों से रिसकर तकिए पर जमा हो जाती है।
हालांकि, अगर यह स्थिति कभी-कभार के बजाय रोजमर्रा की आदत बन चुकी है और तकिया पूरी तरह भीगने लगा है, तो इसे बिल्कुल हल्के में नहीं लेना चाहिए। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, बार-बार और अत्यधिक मात्रा में लार का बहना किसी छिपी हुई शारीरिक या न्यूरोलॉजिकल समस्या का प्रारंभिक संकेत हो सकता है। जब शरीर में लार का अत्यधिक निर्माण होने लगे जिसे मेडिकल भाषा में सियालोरिया कहा जाता है, अथवा जब निगलने की क्षमता में कोई शारीरिक बाधा उत्पन्न हो जाए, तब यह समस्या गंभीर रूप धारण कर लेती है। यदि इसके साथ तेज खर्राटे, रात में दम घुटना, गले में भारीपन या सुबह उठते ही सिरदर्द जैसे लक्षण महसूस होते हैं, तो यह सीधे तौर पर किसी श्वसन या स्लीप डिसऑर्डर की ओर इशारा करता है। इसलिए इस बदलाव को समय रहते समझना और इसके मूल कारणों की पहचान करना बेहद आवश्यक है।
मुंह में अत्यधिक लार बनने के पीछे के कारण, दांतों की समस्या और दवाओं का साइड इफेक्ट
मुंह में जरूरत से ज्यादा लार बनने अथवा लार ग्रंथियों के अतिसक्रिय होने के कई आंतरिक और बाहरी कारण हो सकते हैं। कुछ व्यक्तियों में आंतों या पाचन तंत्र की समस्याओं, पेट में अत्यधिक एसिडिटी और गैस्ट्रोएसोफेगल रिफ्लक्स डिजीज यानी जीईआरडी के कारण रिफ्लेक्स एक्शन के रूप में मुंह में लार का उत्पादन अचानक बढ़ जाता है। पेट का एसिड जब अन्नप्रणाली के जरिए ऊपर की ओर चढ़ने लगता है, तो शरीर उस जलन को शांत करने के लिए प्राकृतिक रूप से अधिक क्षारीय लार बनाने लगता है, जो सोते समय मुंह से बाहर बहने लगती है। इसके अलावा मुंह और दांतों का अस्वस्थ होना भी इसकी एक मुख्य वजह बन सकता है। मसूड़ों में सूजन, दांतों में सड़न, कैविटीज अथवा अक्ल दाढ़ के निकलने के दौरान मुंह के भीतर बैक्टीरिया और संक्रमण बढ़ जाता है, जिससे लार ग्रंथियां अधिक सक्रिय हो जाती हैं।
दवाओं का प्रभाव भी मुंह से लार टपकने का एक प्रमुख कारक माना जाता है। अवसाद, अनिद्रा, मनोवैज्ञानिक विकारों और तंत्रिका तंत्र से जुड़ी बीमारियों के इलाज के लिए इस्तेमाल की जाने वाली कुछ विशेष दवाएं लार के स्राव को बढ़ा देती हैं। इन दवाओं के साइड इफेक्ट्स के कारण मरीज का निगलने का नियंत्रण कमजोर हो जाता है, जिससे दिन में भी मुंह में थूक जमा होने लगता है और रात को सोते समय यह लार तकिए पर बह जाती है। यदि किसी नई दवा के शुरू होने के बाद से यह समस्या दिखने लगी है, तो अपने चिकित्सक से मिलकर दवा की खुराक या विकल्प के बारे में तुरंत बात करनी चाहिए।
नाक बंद होना और एलर्जी की समस्या, जब मुंह से सांस लेना बन जाए मजबूरी
सोते समय लार बहने का सबसे बड़ा और प्रत्यक्ष कारण श्वसन मार्ग में आने वाली रुकावट है। जब किसी व्यक्ति की नाक पूरी तरह या आंशिक रूप से बंद होती है, तो शरीर जीवित रहने के लिए मुंह से सांस लेने पर मजबूर हो जाता है। क्रोनिक साइनस संक्रमण, मौसमी एलर्जी, नाक की हड्डी का टेढ़ा होना यानी डीएनएस अथवा गले में टॉन्सिल्स और एडेनोइड्स के बढ़ जाने से वायु प्रवाह बाधित हो जाता है। जब कोई व्यक्ति रात भर मुंह खोलकर सांस लेता है, तो मुंह की मांसपेशियां लार को अंदर रोकने में असमर्थ हो जाती हैं और वह तकिए पर रिसने लगती है।
सर्दियों और बदलते मौसम के दौरान यह परेशानी अक्सर बढ़ जाती है क्योंकि ठंडी हवा और परागकणों के संपर्क में आने से नेजल कैविटी में सूजन आ जाती है। नाक बंद होने से न केवल लार टपकती है बल्कि मुंह सूखने, होंठ फटने और सुबह उठने पर गले में तेज दर्द या खराश की समस्या भी पैदा होती है। लंबे समय तक मुंह से सांस लेना फेफड़ों के लिए भी नुकसानदेह होता है क्योंकि नाक की तरह मुंह हवा को फिल्टर और गर्म नहीं कर पाता। इसलिए यदि जुकाम या एलर्जी के कारण नाक बंद रहने की शिकायत हफ्तों तक बनी रहे, तो ईएनटी विशेषज्ञ से परामर्श लेकर नेजल कंजेशन का समुचित इलाज कराना चाहिए ताकि सांस लेने का प्राकृतिक चक्र बहाल हो सके।
स्लीप एपनिया का बड़ा खतरा, रात में दम घुटना और दिन भर थकान रहना
यदि सोते समय मुंह से अत्यधिक लार निकलने के साथ-साथ तेज और अनियमित खर्राटे आते हैं, तो यह ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया यानी ओएसए का स्पष्ट चेतावनी संकेत हो सकता है। स्लीप एपनिया नींद से जुड़ा एक बेहद गंभीर और जानलेवा विकार है जिसमें सोते समय ऊपरी श्वास नली की मांसपेशियां बार-बार ढीली होकर सिकुड़ जाती हैं, जिससे फेफड़ों तक हवा का पहुंचना कुछ सेकंड के लिए पूरी तरह रुक जाता है। जब मस्तिष्क को ऑक्सीजन की कमी का अहसास होता है, तो वह शरीर को जगाने के लिए झटका देता है, जिससे व्यक्ति घबराकर, हांफते हुए या गहरी सांस लेकर जाग जाता है। इस प्रक्रिया में मरीज बार-बार मुंह खोलकर गहरी सांस खींचने की कोशिश करता है, जिससे लार अनियंत्रित होकर बाहर बहने लगती है।
स्लीप एपनिया से पीड़ित व्यक्ति पूरी रात करवटें बदलता रहता है और उसकी गहरी नींद पूरी नहीं हो पाती। नतीजतन, सुबह उठने पर सिर में भारीपन, दिन भर तेज सुस्ती, काम में एकाग्रता की कमी, चिड़चिड़ापन और अत्यधिक थकान बनी रहती है। समय पर इलाज न कराने पर स्लीप एपनिया से पीड़ित मरीजों में हाई ब्लड प्रेशर, हार्ट अटैक, स्ट्रोक और टाइप-2 डायबिटीज का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। यदि लार बहने के साथ खर्राटों और सांस टूटने की समस्या मौजूद है, तो तत्काल स्लीप स्टडी टेस्ट कराना आवश्यक होता है ताकि सही समय पर सीपैक थेरेपी या अन्य उपचार शुरू किए जा सकें।
कब तुरंत दिखाना चाहिए डॉक्टर को, किन लक्षणों पर बरतें अत्यधिक सतर्कता?
यद्यपि सोते समय लार गिरना अधिकांश मामलों में खान-पान, सोने की मुद्रा या सामान्य जुकाम से जुड़ा होता है, लेकिन कुछ परिस्थितियों में यह तंत्रिका तंत्र के किसी गंभीर रोग का आपातकालीन संकेत हो सकता है। यदि यह समस्या अचानक शुरू हुई है और इसके साथ निगलने में भारी कठिनाई, खाना खाते वक्त बार-बार खांसी आना, बोलने में लड़खड़ाहट, आवाज में बदलाव या दिन के समय भी मुंह से लार टपकना शामिल है, तो न्यूरोलॉजिस्ट से सघन जांच करानी चाहिए। पार्किंसंस रोग, मल्टीपल स्केलेरोसिस और मस्कुलर डिस्ट्रॉफी जैसी बीमारियों में चेहरे और गले की मांसपेशियों पर नियंत्रण खो जाता है, जिसके कारण लार निगलना मुश्किल हो जाता है।
सबसे अधिक सतर्कता उस स्थिति में बरतनी चाहिए जब लार बहने के साथ-साथ चेहरे का एक हिस्सा अचानक लटकने लगे, आंख बंद करने में दिक्कत आए, होंठ एक तरफ खिंच जाएं, हाथ या पैर में अचानक सुन्नपन या कमजोरी महसूस हो या बात करने में जीभ फिसलने लगे। ये लक्षण ब्रेन स्ट्रोक या बेल्स पाल्सी के हो सकते हैं। ऐसी किसी भी आपात स्थिति में एक भी मिनट गंवाए बिना तुरंत नजदीकी अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में पहुंचना चाहिए, क्योंकि स्ट्रोक के मामलों में त्वरित चिकित्सीय हस्तक्षेप ही मरीज की जान बचा सकता है और उसे स्थायी विकलांगता से सुरक्षित रख सकता है।