इंसान के शरीर में सूअर की किडनी: इससे कितने दिन बच सकती है जान? जानिए जेनोट्रांसप्लांटेशन की सच्चाई और वैज्ञानिकों की उम्मीदें
दुनिया भर में किडनी फेल्योर (एंड-स्टेज रीनल डिजीज) से जूझ रहे लाखों मरीजों के लिए मानव डोनर मिलना एक बेहद लंबी और थका देने वाली जंग साबित होता है। हर साल लाखों लोग केवल इसलिए दम तोड़ देते हैं क्योंकि उन्हें समय पर मैचिंग डोनर नहीं मिल पाता। इस वैश्विक संकट को दूर करने के लिए आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने एक अभूतपूर्व तकनीकी खोज की है—जेनोट्रांसप्लांटेशन (Xenotransplantation), यानी एक प्रजाति के अंग को दूसरी प्रजाति (जानवर के अंग को इंसान) के शरीर में प्रत्यारोपित करना। इस कड़ी में वैज्ञानिकों ने जेनेटिक रूप से संशोधित (Genetically Modified) सूअर की किडनी को इंसान के शरीर में ट्रांसप्लांट करने में ऐतिहासिक सफलता हासिल की है। लेकिन सबसे बड़ा और अहम सवाल यह है कि सूअर की किडनी लगने के बाद कोई इंसान कितने दिन तक जीवित रह सकता है?
अब तक के मामलों में कितने दिन जीवित रहे मरीज?
जीवित इंसानों में जेनेटिकली मॉडिफाइड सूअर की किडनी प्रत्यारोपित करने की शुरुआत प्रायोगिक आधार पर हो चुकी है, जिसके नतीजे वैज्ञानिक दृष्टि से बेहद उत्साहजनक लेकिन सतर्क रहने वाले रहे हैं:
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रिकॉर्ड 2 महीने (लगभग 60 दिन) तक जीवन: जीवित इंसान में सूअर की किडनी का पहला ऐतिहासिक सफल ट्रांसप्लांट अमेरिका के मैसाचुसेट्स जनरल अस्पताल में 62 वर्षीय रिचर्ड स्लेमन पर किया गया था। इस ट्रांसप्लांट के बाद सूअर की किडनी ने मानव शरीर में तुरंत काम करना शुरू कर दिया, पेशाब बनाया और रक्त से क्रिएटिनिन को फिल्टर किया। हालांकि करीब दो महीने बाद मरीज का निधन हो गया, लेकिन डॉक्टरों ने स्पष्ट किया कि उनकी मौत सीधे तौर पर किडनी फेल्योर या ऑर्गन रिजेक्शन से नहीं, बल्कि उनकी पुरानी जटिल हृदय व अन्य बीमारियों के चलते हुई थी।
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ब्रेन-डेड मरीजों पर 1 से 2 महीने का सफल परीक्षण: इससे पहले ब्रेन-डेड (Brain-dead) रोगियों के शरीर में वेंटिलेटर सपोर्ट पर सूअर की किडनी लगाई गई थी, जहां इसने 32 दिन से लेकर 61 दिन (दो महीने) तक बिना किसी रुकावट या तीव्र ऑर्गन रिजेक्शन के पूरी तरह सामान्य काम किया।
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भविष्य का लक्ष्य: महीनों नहीं, सालों की उम्र: वर्तमान में यह तकनीक शुरुआती क्लीनिकल ट्रायल के दौर में है। वैज्ञानिकों और सर्जनों का प्राथमिक लक्ष्य मरीज को डायलिसिस के भयानक चक्र से बाहर निकालकर कम से कम 1 से 5 साल या उससे अधिक का सुरक्षित जीवन देना है।
सामान्य सूअर नहीं, 'जीन-एडिटेड' सूअर की किडनी का होता है इस्तेमाल
किसी आम सूअर की किडनी को इंसान के शरीर में नहीं लगाया जा सकता, क्योंकि मानव इम्यून सिस्टम उसे देखते ही कुछ ही मिनटों में नष्ट (Hyperacute Rejection) कर देगा। इसके लिए 'CRISPR-Cas9' जैसी उन्नत जीन-एडिटिंग तकनीक का उपयोग किया जाता है:
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हानिकारक जीनों को हटाना: सूअर के डीएनए से उन 3 से 4 प्रमुख जीनों को निष्क्रिय (Knock out) किया जाता है जो 'अल्फा-गैल' (Alpha-gal) नाम की शुगर बनाते हैं, जिसे इंसानी इम्यून सिस्टम विदेशी हमलावर मानकर तुरंत हमला करता है।
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इंसानी जीनों को जोड़ना: सूअर के भ्रूण में करीब 6 से 7 मानव जीन (Human Genes) डाले जाते हैं, ताकि खून के थक्के न जमने पाएं और मानव शरीर उस अंग को अपना हिस्सा समझने लगे।
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सुप्त वायरसों को निष्क्रिय करना: सूअर के जीनोम में मौजूद रेट्रोवायरस (PERVs) को पूरी तरह निष्क्रिय किया जाता है ताकि कोई भी पशु जनित वायरस इंसान में न फैल सके।
मरीज की जान बचाने में सबसे बड़ी चुनौतियां क्या हैं?
हालांकि सूअर की किडनी इंसान के शरीर में रक्त को फिल्टर करने का काम सफलतापूर्वक कर लेती है, लेकिन जीवन की अवधि कई जोखिमों पर निर्भर करती है:
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ऑर्गन रिजेक्शन (इम्यून सिस्टम का हमला): दवाओं (इम्यूनोसप्रेसेंट्स) के बावजूद मानव शरीर धीरे-धीरे उस अंग के खिलाफ एंटीबॉडी बना सकता है, जिससे हफ्तों या महीनों बाद 'क्रोनिक रिजेक्शन' का खतरा रहता है।
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संक्रमण का खतरा: अंग को सुरक्षित रखने के लिए मरीज के इम्यून सिस्टम को अत्यधिक दबाकर रखना पड़ता है, जिससे सामान्य बैक्टीरिया या फंगल इन्फेक्शन भी जानलेवा बन सकते हैं।
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रक्तचाप और शारीरिक तालमेल: इंसानों और सूअरों के हार्मोनल संतुलन और ब्लड प्रेशर के नियमन में थोड़ा अंतर होता है, जिसे लंबे समय तक नियंत्रित रखना डॉक्टरों के लिए बड़ी चुनौती है।
मेडिकल साइंस के लिए उम्मीद की नई किरण
आज भले ही सूअर की किडनी के साथ मरीजों का शुरुआती जीवनकाल कुछ हफ्तों से लेकर महीनों तक दर्ज किया जा रहा हो, लेकिन ट्रांसप्लांट साइंस का इतिहास बताता है कि पहले मानव-से-मानव किडनी और हार्ट ट्रांसप्लांट के शुरुआती मरीज भी कुछ ही हफ्ते जीवित रहे थे, जो आज दशकों तक सामान्य जिंदगी जी रहे हैं।
जेनोट्रांसप्लांटेशन तकनीक आने वाले वर्षों में अंग दान की वैश्विक कमी को पूरी तरह समाप्त कर सकती है। यदि आगामी क्लीनिकल ट्रायल्स में यह अवधि 2 से 5 वर्ष तक सुरक्षित रूप से पहुंच जाती है, तो यह डायलिसिस पर निर्भर करोड़ों गंभीर मरीजों के लिए दूसरा जन्म साबित होगा।