पर्चा बनवाने से लेकर डॉक्टर और दवा तक मदद करेगा 'पेशेंट नेवीगेटर', अस्पतालों में शुरू होगी नई सुविधा
सरकारी अस्पतालों में इलाज कराने के लिए पहुंचने वाले आम मरीजों और उनके तीमारदारों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बीमारी से ज्यादा अस्पताल की जटिल प्रशासनिक व्यवस्था को समझना होता है। बड़े मेडिकल कॉलेजों और सरकारी अस्पतालों में प्रतिदिन हजारों की संख्या में मरीज पहुंचते हैं। अक्सर यह देखा जाता है कि लोग मुख्य प्रवेश द्वार से लेकर ओपीडी, पैथोलॉजी लैब, एक्स-रे रूम और दवा वितरण काउंटर के बीच दिनभर चक्कर काटते रह जाते हैं। कई बार सही काउंटर या डॉक्टर का कमरा न मिलने के कारण गंभीर मरीजों का कीमती समय बर्बाद हो जाता है।
मरीजों की इसी मानसिक और शारीरिक परेशानी को जड़ से खत्म करने के लिए स्वास्थ्य विभाग 'पेशेंट नेवीगेटर' (Patient Navigator) व्यवस्था शुरू करने जा रहा है। इस नई व्यवस्था के तहत अस्पताल परिसर में प्रवेश करते ही मरीज को एक समर्पित गाइड या सहायक मिलेगा, जो पर्चा (ओपीडी रजिस्ट्रेशन) बनवाने से लेकर डॉक्टर से परामर्श, खून-पेशाब की जांच, रेडियोलॉजी टेस्ट और दवा काउंटर से दवाइयां दिलाने तक कदम-दर-कदम मार्गदर्शन करेगा। इस पहल से न केवल मरीजों का समय बचेगा, बल्कि अस्पतालों में अनावश्यक भीड़भाड़ और अव्यवस्था पर भी प्रभावी लगाम लगेगी।
क्या है पेशेंट नेवीगेटर व्यवस्था और यह कैसे काम करेगी?
पेशेंट नेवीगेटर वास्तव में अस्पताल के भीतर मरीज का व्यक्तिगत 'गाइड' या सहायक होता है। इसके लिए अस्पताल प्रशासन द्वारा विशेष रूप से प्रशिक्षित कर्मचारियों या सोशल वॉलंटियर्स को तैनात किया जाएगा।
जब कोई मरीज अस्पताल पहुंचेगा, तो नेवीगेटर उसे केवल दिशा बताने के बजाय पूरी प्रक्रिया में मदद करेगा। यह व्यवस्था निम्नलिखित चरणों में काम करेगी:
-
रजिस्ट्रेशन डेस्क पर सहायता: मरीज के पहुंचते ही नेवीगेटर उसे सही ओपीडी काउंटर तक ले जाएगा, आयुष्मान कार्ड या आधार कार्ड के जरिए पर्ची कटवाने में मदद करेगा और जरूरी फॉर्म भरवाएगा।
-
संबंधित डॉक्टर तक पहुंचाना: कई बड़े अस्पतालों में अलग-अलग विभागों (जैसे मेडिसिन, ऑर्थोपेडिक्स, कार्डियोलॉजी, ईएनटी) के कमरे अलग-अलग तलों या ब्लॉकों में होते हैं। नेवीगेटर मरीज को उसके डॉक्टर के कमरे तक सही समय पर पहुंचाएगा।
-
जांच और डायग्नोस्टिक्स में मदद: यदि डॉक्टर ने मरीज को खून की जांच, सीटी स्कैन, एमआरआई या अल्ट्रासाउंड कराने की सलाह दी है, तो नेवीगेटर मरीज को संबंधित लैब, बिलिंग काउंटर और सैंपल कलेक्शन सेंटर तक लेकर जाएगा।
-
फार्मेसी से दवा वितरण: डॉक्टर के परामर्श और जांच के बाद नेवीगेटर मरीज को अस्पताल की मुफ्त दवा वितरण खिड़की तक ले जाएगा ताकि वह बिना किसी परेशानी के अपनी दवाइयां प्राप्त कर सके।
-
रेफरल और फॉलो-अप: यदि डॉक्टर मरीज को किसी उच्च केंद्र या दूसरे विभाग में रेफर करते हैं, तो नेवीगेटर उस विभाग की प्रक्रिया और अगली तारीख की जानकारी भी स्पष्ट करेगा।
बुजुर्गों, महिलाओं और दूर-दराज से आने वाले मरीजों को मिलेगा सबसे बड़ा लाभ
सरकारी अस्पतालों को लेकर किए गए अध्ययनों में यह बात सामने आई है कि लगभग 70 प्रतिशत मरीजों को डॉक्टर से परामर्श लेने के बाद यह स्पष्ट नहीं होता कि उनका अगला कदम क्या होना चाहिए। खासकर ग्रामीण क्षेत्रों, दूर-दराज के गांवों और निरक्षर परिवारों से आने वाले लोग अस्पताल के साइनबोर्ड या तकनीकी भाषा को नहीं समझ पाते।
ऐसे में पेशेंट नेवीगेटर व्यवस्था का सबसे ज्यादा फायदा निम्नलिखित वर्गों को मिलेगा:
-
बुजुर्ग और अकेले आने वाले मरीज: उम्रदराज लोग जो अकेले अस्पताल आते हैं और लंबी कतारों में खड़े होने या सीढ़ियां चढ़ने में असमर्थ होते हैं, उन्हें नेवीगेटर का सीधा सहारा मिलेगा।
-
दिव्यांगजन: शारीरिक रूप से अक्षम मरीजों को व्हीलचेयर उपलब्ध कराने से लेकर लिफ्ट और रैंप के जरिए डॉक्टरों के केबिन तक पहुंचाने में मदद मिलेगी।
-
ग्रामीण और पहली बार आने वाले नागरिक: जिन लोगों को बड़े अस्पतालों का कोई पूर्व अनुभव नहीं होता, वे बिचौलियों या दलालों के चंगुल में फंसने से बचेंगे।
-
गंभीर और क्रोनिक मरीज: कैंसर, डायलिसिस या हृदय रोग जैसी जटिल बीमारियों से पीड़ित मरीजों को विभिन्न विभागों के बीच लगातार फॉलो-अप के लिए नेवीगेटर का निरंतर सहयोग मिलेगा।
डिजिटल डिस्प्ले और ई-हॉस्पिटल मैनेजमेंट सिस्टम से जुड़ेगी पूरी व्यवस्था
पेशेंट नेवीगेटर की यह पहल केवल मानवीय सहायकों तक ही सीमित नहीं रहेगी, बल्कि इसे आधुनिक डिजिटल तकनीकों से भी लैस किया जा रहा है। अस्पतालों में नेक्स्ट-जेन ई-हॉस्पिटल प्लेटफॉर्म और हॉस्पिटल मैनेजमेंट इंफॉर्मेशन सिस्टम (HMIS) के तहत डिजिटल कियोस्क और इलेक्ट्रॉनिक टोकन डिस्प्ले लगाए जा रहे हैं।
मरीज को पर्ची बनते ही एक टोकन नंबर दिया जाएगा, जिसे डिजिटल स्क्रीन और लाउडस्पीकर के जरिए पुकारा जाएगा। इसके साथ ही अस्पतालों के मुख्य द्वारों पर बड़े डिजिटल टचस्क्रीन बोर्ड स्थापित किए जाएंगे, जहां मरीज अपनी स्थानीय भाषा (हिंदी या क्षेत्रीय बोली) में विभाग का नाम चुनकर पूरे अस्पताल का डिजिटल नक्शा और मार्ग देख सकेंगे। नेवीगेटर मरीजों को इन डिजिटल कियोस्क का उपयोग करने का तरीका भी सिखाएंगे ताकि भविष्य में मरीज आत्मनिर्भर बन सकें।
अस्पतालों में दलालों के नेटवर्क पर लगेगी लगाम और डॉक्टरों का बचेगा समय
अस्पतालों में नेवीगेटर तैनात होने का एक बड़ा सामाजिक फायदा यह भी होगा कि मरीजों का शोषण करने वाले बिचौलियों और फर्जी एजेंटों का नेटवर्क पूरी तरह ध्वस्त हो जाएगा। अक्सर बड़े अस्पतालों के बाहर सक्रिय दलाल भोले-भाले मरीजों को जल्दी पर्चा बनवाने या सस्ते में निजी लैब से जांच कराने का झांसा देकर ठगते हैं। जब आधिकारिक नेवीगेटर सीधे मरीज की उंगली थामकर उसे काउंटर तक ले जाएगा, तो दलालों के लिए अस्पताल में कोई जगह नहीं बचेगी।
इसके अलावा, ओपीडी में डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ पर भी काम का अनावश्यक दबाव कम होगा। मरीज बार-बार डॉक्टरों से यह पूछने नहीं आएंगे कि 'जांच कहां होगी' या 'दवा किस खिड़की पर मिलेगी'। डॉक्टर पूरी एकाग्रता के साथ मरीज के क्लिनिकल परीक्षण और इलाज पर ध्यान दे सकेंगे, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में व्यापक सुधार होगा।
पायलट प्रोजेक्ट के आधार पर सभी जिला अस्पतालों में विस्तार की योजना
इस क्रांतिकारी व्यवस्था को पहले चरण में बड़े मेडिकल कॉलेजों और प्रमुख सरकारी अस्पतालों में पायलट प्रोजेक्ट (Pilot Trial) के तौर पर लागू किया जा रहा है। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के अनुसार, शुरुआती ट्रायल के दौरान मरीजों के फीडबैक, उनकी प्रतीक्षा अवधि में आई कमी और दैनिक संचालन की समीक्षा की जाएगी।
ट्रायल के सफल रहने के बाद इस मॉडल को चरणबद्ध तरीके से सभी जिला अस्पतालों, संयुक्त चिकित्सालयों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHC) तक विस्तारित किया जाएगा। सरकार का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी नागरिक को इलाज की जटिल प्रक्रिया के कारण स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित न रहना पड़े और हर मरीज को सम्मानजनक व सुलभ उपचार मिल सके।