Shivling Puja Niyam: क्या आप जानते हैं शिवलिंग पर जल चढ़ाने का सही शास्त्रीय क्रम? इन 5 विशेष स्थानों पर जल अर्पित करने से शीघ्र प्रसन्न होते हैं महादेव, पूरी होती है हर मनोकामना
सनातन धर्म में देवाधिदेव महादेव की पूजा को सबसे सरल और शीघ्र फलदायी माना गया है। भगवान शिव को 'आशुतोष' और 'भोलेनाथ' कहा जाता है, जिसका अर्थ है जो अत्यंत अल्प प्रयास और मात्र एक लोटे जल से भी प्रसन्न हो जाते हैं। शिव महापुराण में वर्णित है कि शिवलिंग पर श्रद्धापूर्वक जल की धारा अर्पित करने से जन्म-जन्मांतर के पाप धुल जाते हैं और साधक को मानसिक शांति, आरोग्य व मोक्ष की प्राप्ति होती है।
अक्सर अधिकांश श्रद्धालु मंदिर जाकर सीधे शिवलिंग के शीर्ष पर सारा जल एक साथ उंडेल देते हैं। हालांकि, शिव महापुराण और शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार, शिवलिंग केवल एक पाषाण विग्रह नहीं है, बल्कि उसमें संपूर्ण शिव परिवार और ब्रह्मांडीय ऊर्जा का वास होता है। शिवलिंग पर जल चढ़ाने का एक निश्चित क्रम और विधि-विधान है। यदि इस सही विधि और क्रम के अनुसार जल अर्पित किया जाए, तो पूजा का फल कई गुना बढ़ जाता है और जीवन के समस्त कष्टों का निवारण होता है।
शिवलिंग की जलहरी में समाया है संपूर्ण शिव परिवार
शिवलिंग के स्वरूप को समझने के लिए उसकी संरचना और जलहरी (पारद या पाषाण आधार) को जानना अत्यंत आवश्यक है। जब हम शिवलिंग पर जल चढ़ाते हैं, तो वह जल एक निश्चित दिशा से होकर बहता है। इस संपूर्ण आधार को मां पार्वती का हस्तकमल माना जाता है, जबकि इसके विभिन्न भागों में भगवान शिव के परिवार के अन्य सदस्यों का वास होता है।
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दाहिना भाग: जलहरी का जो सिरा दाईं ओर होता है, वह प्रथम पूज्य भगवान श्री गणेश का स्थान माना जाता है।
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बायां भाग: जलहरी का बायां भाग भगवान कार्तिकेय का स्थान होता है।
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मध्य भाग की उभरी रेखा: जलहरी के ठीक बीच में जो एक उभरी हुई रेखा या सर्पाकार आकृति होती है, वह भगवान शिव और माता पार्वती की प्रिय पुत्री माता अशोक सुंदरी का स्थान है।
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गोलाकार हस्तकमल (कटि प्रदेश): शिवलिंग के चारों ओर का जो गोल आधार होता है, वह साक्षात जगदंबा माता पार्वती का हस्तकमल है।
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ऊपरी कलश या छत्र: शिवलिंग के ऊपर टंगने वाला कलश, जिससे बूंद-बूंद जल टपकता है, वह भगवान शिव की पांच कन्याओं (जया, विषहरा, शामिलबारी, देव और दोतली) का प्रतीक माना जाता है।
शिवलिंग पर जल चढ़ाने के 5 सही तरीके और चरण
शिव महापुराण के अनुसार, जब भी आप मंदिर में जल चढ़ाने जाएं, तो अपने लोटे के जल को 5 भागों में क्रमबद्ध तरीके से इन पवित्र स्थानों पर अर्पित करना चाहिए:
1. प्रथम चरण: भगवान श्री गणेश का स्थान जल चढ़ाने की शुरुआत हमेशा जलहरी के दाहिने भाग से करनी चाहिए। यह स्थान रिद्धि-सिद्धि के दाता भगवान गणेश का है। यहां थोड़ा सा जल अर्पित करने से जीवन के सभी विघ्न, संकट और कार्यक्षेत्र की बाधाएं दूर होती हैं। बुद्धि और विवेक में वृद्धि होती है।
2. द्वितीय चरण: भगवान श्री कार्तिकेय का स्थान इसके बाद लोटे से थोड़ा जल जलहरी के बाईं तरफ अर्पित करें। यह स्थान शक्ति, साहस और पराक्रम के प्रतीक भगवान कार्तिकेय का है। यहां जल अर्पित करने से साधक को शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है, भय समाप्त होता है और आत्मविश्वास में अभूतपूर्व वृद्धि होती है।
3. तृतीय चरण: माता अशोक सुंदरी का स्थान तीसरा भाग जलहरी के ठीक मध्य में स्थित उभरी हुई रेखा पर चढ़ाना चाहिए, जो माता अशोक सुंदरी का स्थान है। मान्यताओं के अनुसार, माता अशोक सुंदरी मनोकामना पूर्ति की देवी मानी जाती हैं। यदि किसी के विवाह में बाधा आ रही हो, संतान संबंधी चिंता हो या घर में अशांति हो, तो यहां जल अर्पित करने से परिवार में सुख, सौहार्द और संपन्नता आती है।
4. चतुर्थ चरण: माता पार्वती का हस्तकमल (गोलाकार भाग) चौथे चरण में शिवलिंग के चारों ओर बने गोल भाग यानी माता पार्वती के हस्तकमल पर जल की एक गोल परिक्रमा बनाते हुए धार अर्पित करें। यह संपूर्ण प्रकृति और शक्ति का आधार है। यहां जल चढ़ाने से घर की दरिद्रता दूर होती है, स्वास्थ्य लाभ मिलता है और दांपत्य जीवन में मधुरता बनी रहती है।
5. पंचम चरण: मुख्य शिवलिंग पर निरंतर पतली धार अंत में, लोटे में बचा हुआ संपूर्ण जल शिवलिंग के शीर्ष भाग (पिंडी) पर एक पतली और निरंतर धार बनाते हुए समर्पित करें। जल चढ़ाते समय 'ॐ नमः शिवाय' या महामृत्युंजय मंत्र का मन ही मन स्पष्ट उच्चारण करते रहें। यह जलार्पण सीधे परमपिता शिव को समर्पित होता है, जिससे आत्मिक शांति, ऐश्वर्य और भगवान भोलेनाथ की असीम कृपा प्राप्त होती है।
दिशा और मुद्रा: जल चढ़ाते समय इन नियमों का रखें विशेष ध्यान
शिवलिंग पर जल चढ़ाने के दौरान केवल क्रम ही नहीं, बल्कि दिशा और शारीरिक मुद्रा का सही होना भी शास्त्रों में अनिवार्य बताया गया है:
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सही दिशा का चयन: जलाभिषेक करते समय भक्त का मुख हमेशा उत्तर दिशा (North) की ओर होना चाहिए। उत्तर दिशा को भगवान शिव का मुख्य द्वार और मां गंगा का आगमन मार्ग माना जाता है। यदि उत्तर दिशा संभव न हो, तो पूर्व दिशा की ओर मुख करके जल चढ़ा सकते हैं। भूलकर भी दक्षिण या पश्चिम दिशा की ओर मुख करके जल न चढ़ाएं।
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बैठकर जल चढ़ाना: शिवलिंग पर जल कभी भी खड़े होकर जल्दबाजी में नहीं चढ़ाना चाहिए। हमेशा बैठकर या दोनों घुटनों को मोड़कर झुकते हुए शांत भाव से जल अर्पित करना चाहिए। खड़े होकर जल चढ़ाने से पूजा का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता।
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पात्र का चयन: सादा जल चढ़ाने के लिए तांबे (Copper) का लोटा सर्वोत्तम माना गया है। यदि आप जल में दूध, दही, शहद या पंचामृत मिला रहे हैं, तो इसके लिए पीतल, कांसा या चांदी के लोटे का ही उपयोग करें। तांबे के पात्र में दूध डालना शास्त्रों में वर्जित और विषैला माना गया है।
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जल की धार: जल को बहुत ऊपर से या झटके से नहीं गिराना चाहिए। लोटे को शिवलिंग के करीब लाकर अत्यंत धीमी और शांत धार से जल अर्पित करें।
जलाभिषेक के समय की जाने वाली सामान्य गलतियां जिनसे बचें
अक्सर अज्ञानतावश श्रद्धालु कुछ ऐसी गलतियां कर बैठते हैं जिससे पूजा का सकारात्मक प्रभाव कम हो जाता है:
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तुलसी दल और केतकी के फूल: भगवान शिव की पूजा में कभी भी तुलसी के पत्ते, केतकी का फूल या चंपा के फूल नहीं चढ़ाने चाहिए। इसके स्थान पर केवल बेलपत्र, भांग, धतूरा और शमी पत्र ही अर्पित करें।
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शंख से जल चढ़ाना: भगवान विष्णु की पूजा में शंख का उपयोग श्रेष्ठ होता है, किंतु शिवजी की पूजा में शंख से जल अर्पित करना पूरी तरह वर्जित है, क्योंकि शिवजी ने शंखचूड़ नामक दैत्य का वध किया था।
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सिंदूर या कुमकुम का लेप: शिवलिंग पर सिंदूर, रोली या हल्दी नहीं चढ़ाई जाती। भगवान शिव को केवल सफेद चंदन, भस्म या त्रिपुंड ही लगाना चाहिए।
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जल निकासी (निर्मली) को लांघना: शिवलिंग पर चढ़ा हुआ जल जिस नाली से बाहर निकलता है, उसे 'निर्मली' या 'सोमसूत्र' कहा जाता है। शिव मंदिर की परिक्रमा करते समय कभी भी इस जलधारा को नहीं लांघना चाहिए। जहां से जल बह रहा हो, वहीं से वापस मुड़कर अर्ध-परिक्रमा (चंद्राकार परिक्रमा) पूरी करनी चाहिए।
वाराणसी के काशी विश्वनाथ, उज्जैन के महाकालेश्वर, देवघर के बैद्यनाथ धाम और ओंकारेश्वर समेत सभी प्रमुख ज्योतिर्लिंगों में इसी शास्त्रीय विधान से जलाभिषेक की परंपरा सदियों से चली आ रही है। जब भक्त पूरे विधि-विधान, शुद्ध मन और पंच-स्थानों के सही क्रम का पालन करते हुए शिवलिंग पर जल अर्पित करता है, तो भगवान आशुतोष शीघ्र प्रसन्न होकर साधक की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।