'अगर वनडे खेलता तो टेस्ट का और भी बेहतर प्लेयर बनता': चेतेश्वर पुजारा का छलका दर्द

'अगर वनडे खेलता तो टेस्ट का और भी बेहतर प्लेयर बनता': चेतेश्वर पुजारा का छलका दर्द

भारतीय क्रिकेट टीम के अनुभवी मध्यक्रम बल्लेबाज और लंबे समय तक टीम इंडिया की रीढ़ रहे चेतेश्वर पुजारा ने अपने अंतरराष्ट्रीय करियर को लेकर एक बड़ा और भावनात्मक खुलासा किया है। 100 से अधिक टेस्ट मैच खेल चुके और भारत को ऑस्ट्रेलिया की सरजमीं पर ऐतिहासिक टेस्ट सीरीज जिताने में अहम भूमिका निभाने वाले पुजारा को हमेशा से लाल गेंद क्रिकेट का विशेषज्ञ माना गया। हालांकि, पुजारा ने अब यह स्वीकार किया है कि केवल एक प्रारूप तक सीमित रह जाना उनके खेल के समग्र विकास में एक कमी बनकर रह गया। पुजारा का मानना है कि यदि उन्हें वनडे इंटरनेशनल (ODI) में नियमित मौके दिए जाते, तो उनके खेल में स्ट्राइक रोटेशन और आक्रामकता का ऐसा तालमेल बैठता जिससे वे टेस्ट क्रिकेट में भी कई गुना अधिक घातक और बेहतर बल्लेबाज बनकर उभरते।

'सफेद गेंद क्रिकेट ने मेरी बैटिंग को नई धार दी': पुजारा ने साझा किया अनुभव

पुजारा ने एक इंटरव्यू में अपनी बल्लेबाजी तकनीक और मानसिकता पर खुलकर बात करते हुए कहा कि अक्सर खिलाड़ियों को एक निश्चित खांचे (स्टीरियोटाइप) में बांध दिया जाता है। पुजारा ने स्पष्ट किया कि जब उन्होंने इंग्लैंड की घरेलू काउंटी क्रिकेट में ससेक्स (Sussex) के लिए रॉयल लंदन वन-डे कप खेला, तो उन्होंने साबित किया कि वे 50 ओवर के फॉर्मेट में भी ताबड़तोड़ शतक जड़ सकते हैं और 100 से अधिक के स्ट्राइक रेट से रन बना सकते हैं।

पुजारा ने कहा, "जब आप वनडे क्रिकेट खेलते हैं, तो आपको फील्डर के ऊपर से शॉट खेलने, खाली जगहों को तेजी से तलाशने और हर गेंद पर स्ट्राइक बदलने की जरूरत होती है। जब मैंने काउंटी में सफेद गेंद क्रिकेट खेला, तो मुझे अहसास हुआ कि इससे मेरे शॉट्स की रेंज काफी बढ़ गई। अगर मुझे टीम इंडिया के लिए भी नियमित रूप से वनडे खेलने का अवसर मिलता, तो मेरी टेस्ट बैटिंग का स्तर और ज्यादा ऊंचा होता। टेस्ट मैचों में कई बार गेंदबाजों पर दबाव बनाने के लिए जो आक्रामक रुख चाहिए होता है, वह सफेद गेंद क्रिकेट खेलने से स्वाभाविक रूप से आता है।"

सिर्फ 5 वनडे मैचों पर सिमट गया करियर: मिला 'टेस्ट स्पेशलिस्ट' का ठप्पा

रिकॉर्ड्स की बात करें तो चेतेश्वर पुजारा ने 103 टेस्ट मैचों में 43.60 की औसत से 7195 रन बनाए हैं, जिसमें 19 शतक और 35 अर्धशतक शामिल हैं। लेकिन सफेद गेंद के प्रारूप में उन्हें कभी अपनी प्रतिभा साबित करने का लंबा मौका नहीं मिला। पुजारा ने भारत के लिए महज 5 वनडे मैच खेले, जिनमें उन्होंने 10.20 की औसत से सिर्फ 51 रन बनाए।

साल 2013 में जिम्बाब्वे दौरे पर वनडे डेब्यू करने वाले पुजारा को 2014 में बांग्लादेश के खिलाफ आखिरी बार नीली जर्सी पहनने का मौका मिला था। इसके बाद चयनकर्ताओं ने उन्हें पूरी तरह 'टेस्ट स्पेशलिस्ट' मान लिया और लिमिटेड ओवर्स फॉर्मेट की योजनाओं से बाहर कर दिया। पुजारा का मानना है कि केवल कुछ पारियों के आधार पर किसी खिलाड़ी की सीमित ओवरों की क्षमता को खारिज करना सही नहीं था।

टेस्ट में लंबे समय तक क्रीज पर टिकने का दबाव और फॉर्म का उतार-चढ़ाव

पुजारा ने अपने करियर के उस दौर का भी जिक्र किया जब टेस्ट में उनके स्ट्राइक रेट और धीमी बल्लेबाजी को लेकर लगातार मीडिया और क्रिकेट पंडितों द्वारा सवाल उठाए जा रहे थे। पुजारा ने बताया कि जब कोई खिलाड़ी केवल एक ही प्रारूप खेलता है, तो उसके लिए लय बरकरार रखना सबसे बड़ी चुनौती होती है। दो टेस्ट सीरीज के बीच कई महीनों का लंबा अंतराल होता है, जिससे मैच प्रैक्टिस छूट जाती है।

उन्होंने कहा, "अगर आप लगातार तीनों या कम से कम दो प्रारूप खेल रहे होते हैं, तो आपका बल्ला लगातार गेंद से टकराता रहता है और आप मैच फिटनेस में रहते हैं। टेस्ट क्रिकेट में जब आप सिर्फ बचाव की मुद्रा में आ जाते हैं, तो सामने वाली टीम के गेंदबाज आप पर हावी हो जाते हैं। अगर मेरे पास सफेद गेंद क्रिकेट का निरंतर अनुभव होता, तो टेस्ट की कठिन पिचों पर भी मैं अधिक सहजता से सिंगल-डबल चुराकर गेंदबाजों की रणनीति बिगाड़ सकता था।"

रणजी ट्रॉफी और काउंटी में आज भी रनों की भूख बरकरार

भारतीय टेस्ट टीम से बाहर होने के बावजूद पुजारा का क्रिकेट के प्रति जुनून कम नहीं हुआ है। सौराष्ट्र के लिए रणजी ट्रॉफी में लगातार रन बनाने के साथ-साथ वे इंग्लैंड में काउंटी चैंपियनशिप में भी रनों का अंबार लगाते रहे हैं। पुजारा ने कहा कि उनका काम केवल मैदान पर जाकर रन बनाना और प्रक्रिया पर ध्यान केंद्रित करना है। उन्होंने युवा क्रिकेटरों को भी सलाह दी कि वे खुद को किसी एक फॉर्मेट का खिलाड़ी मानने की गलती न करें, बल्कि आधुनिक क्रिकेट की मांग के अनुसार अपनी तकनीक और मानसिक दृढ़ता को हर प्रारूप के लिए लचीला बनाए रखें।

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