नेपाल में फिर आ सकती है महाप्रलय: तिब्बत सीमा पर झील बनने के बाद भोटेकोशी नदी का जलस्तर अप्रत्याशित बढ़ा, रसुवा से लेकर धादिंग तक हाई अलर्ट
पड़ोसी देश नेपाल में 26 अगस्त को आई विनाशकारी फ्लैश फ्लड और भूस्खलन के गहरे जख्म अभी सूखे भी नहीं थे कि भोटेकोशी नदी में एक बार फिर अचानक आए भारी उफान ने पूरे मुल्क की सांसें अटका दी हैं। नेपाल-तिब्बत सीमा के ऊपरी हिमालयी जलग्रहण क्षेत्रों में ग्लेशियर खिसकने और चट्टानों के भारी मलबे से बनी प्राकृतिक झीलों (बैरियर लेक) के दोबारा ओवरफ्लो होने के बाद भोटेकोशी का जलस्तर चेतावनी के उच्चतम स्तर को पार करने लगा है। नेपाल के राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण एवं प्रबंधन प्राधिकरण (NDRRMA) ने आपातकालीन सूचना जारी करते हुए रसुवा, नुवाकोट, धादिंग, सिंधुपालचोक और काठमांडू घाटी के निचले तटीय इलाकों में रेड अलर्ट घोषित कर दिया है।
रविवार देर रात और सोमवार की सुबह प्रभावित पहाड़ी जनपदों में रहने वाले लाखों नागरिकों के मोबाइल फोनों पर आपातकालीन फ्लड सायरन और चेतावनी संदेश (SMS Alerts) भेजे गए। अचानक नदी की दहाड़ और लाउडस्पीकरों से हो रही मुनादी ने मलबे के बीच अपनी बची-खुची गृहस्थी तलाश रहे स्थानीय लोगों में फिर से भारी दहशत पैदा कर दी है। लोग अपने वृद्ध माता-पिता और मासूम बच्चों को गोद में उठाकर रात के अंधेरे में ही ऊंचे पहाड़ों और सुरक्षित ढांचों की ओर भागने को मजबूर हो गए हैं। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, नदी की तेज धारा अपने साथ विशालकाय बोल्डर, पेड़ और गाद बहाकर ला रही है, जिससे किनारे के बचे हुए ढांचे भी ताश के पत्तों की तरह ढहने की कगार पर पहुंच गए हैं।
900 से अधिक मौतों के बाद दोबारा संकट: 4000 से ज्यादा लापता, शवों की तलाश में जुटी 20 हजार सेना
नेपाल सरकार और पुलिस मुख्यालय के ताजा आंकड़ों के अनुसार, इस महात्रासदी में अब तक 900 से अधिक लोगों के शव बरामद किए जा चुके हैं, जबकि 2,500 से लेकर 4,200 से अधिक नागरिक और विदेशी सैलानी अभी भी लापता हैं। आठ सबसे ज्यादा प्रभावित जिलों में नेपाली सेना, सशस्त्र पुलिस बल और नेपाल पुलिस के लगभग 20,000 सुरक्षाकर्मियों को राहत और बचाव अभियान में झोंका गया है। सेना के एमआई-17 और निजी हेलीकॉप्टरों द्वारा अब तक 4,500 से अधिक फंसे हुए लोगों को एयरलिफ्ट कर सुरक्षित निकाला गया है।
हालांकि, भोटेकोशी के जलस्तर में दोबारा हो रही तेज वृद्धि और रुक-रुक कर हो रही मानसूनी बारिश ने बचाव दलों के सामने गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है। रसुवा और नुवाकोट के कई दुर्गम इलाके मुख्य मार्ग से पूरी तरह कट चुके हैं। काठमांडू को पोखरा और पश्चिमी नेपाल से जोड़ने वाले लाइफलाइन कहे जाने वाले पृथ्वी राजमार्ग का एक बड़ा हिस्सा त्रिशूली नदी में समा जाने के कारण आवश्यक दवाओं, राशन और भारी अर्थमूविंग मशीनों को आपदा स्थल तक पहुंचाना बेहद कठिन हो गया है। एनडीआरआरएमए ने ग्राउंड जीरो पर काम कर रहे तमाम रेस्क्यू वर्कर्स को नदी के बहाव से सुरक्षित दूरी बनाए रखने के सख्त निर्देश दिए हैं।
जलविद्युत परियोजनाओं की सुरंगों में फंसे सैकड़ों श्रमिक: भारतीय रेस्क्यू टीम और टनल एक्सपर्ट्स का महा-ऑपरेशन
भोटेकोशी और त्रिशूली नदी के उफान से सबसे बड़ा मानवीय संकट निजी और सरकारी जलविद्युत (हाइड्रोपावर) परियोजनाओं पर खड़ा हुआ है। इंडिपेंडेंट पावर प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन नेपाल (IPPAN) के अनुसार, 354 मेगावाट क्षमता वाली आठ चालू जलविद्युत परियोजनाएं पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी हैं, जबकि पांच निर्माणाधीन प्रोजेक्ट्स को अपूरणीय क्षति पहुंची है। नुवाकोट और रसुवागढ़ी के पास स्थित त्रिशूली हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट और अन्य पावर प्लांट्स की सुरंगों में करीब 600 इंजीनियर और निर्माण श्रमिक कई दिनों से फंसे हुए हैं।
इस अत्यंत जटिल और खतरनाक बचाव अभियान में भारत सरकार द्वारा भेजी गई 11 सदस्यीय विशेष तकनीकी टीम और टनल एक्सपर्ट्स नेपाली सुरक्षा बलों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर मोर्चा संभाले हुए हैं। सुरक्षा बल भारी बारिश और गाद के बीच आधी रात के बाद भी सुरंग के प्रवेश द्वारों की खुदाई करने और फंसे लोगों तक ऑक्सीजन व भोजन पहुंचाने में जुटे हैं। अब तक 190 से अधिक श्रमिकों को जीवित निकालने में सफलता मिली है, लेकिन शेष फंसे कामगारों की सुरक्षा को लेकर चिंताएं लगातार बढ़ती जा रही हैं क्योंकि भोटेकोशी का बढ़ता जलस्तर सुरंगों में दोबारा पानी भरने का जोखिम बढ़ा रहा है।
चीन की तरफ बैरियर लेक का नया खतरा: सैटेलाइट तस्वीरों से ट्रांस-बॉर्डर निगरानी
नेपाल में आई इस विनाशकारी बाढ़ का मुख्य स्रोत नेपाल-तिब्बत सीमा पर पराडिगखड और तिब्बती हिस्से में स्थित ग्लेशियरों का भारी हिमस्खलन और चट्टानी भूस्खलन माना जा रहा है। शनिवार को चीनी सीमा की तरफ बनी कृत्रिम झील का आकार कुछ घटने की खबर आई थी, लेकिन रविवार को फिर से एक बड़े भूस्खलन के चलते भोटेकोशी के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में एक नई बैरियर झील का निर्माण हो गया है।
भू-वैज्ञानिकों और सैटेलाइट इमेजरी विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक हिमालय के इस दुर्गम इलाके में बनी अस्थाई झीलों से पानी का सुरक्षित और क्रमिक निकास नहीं हो जाता, तब तक निचले इलाकों में फ्लैश फ्लड का खतरा हर पल बना रहेगा। यदि यह प्राकृतिक मिट्टी और पत्थरों का बांध दबाव न झेल पाने के कारण एकाएक टूटता है, तो नीचे की ओर आने वाली जलतरंगें पहले से तबाह हो चुके ढांचों, पुलों और बस्तियों को पूरी तरह साफ कर सकती हैं। नेपाल और चीनी प्रशासन के बीच ट्रांस-बॉर्डर हाइड्रोलॉजिकल डेटा साझा करने का तंत्र सक्रिय किया गया है ताकि किसी भी बड़े खतरे की सूचना तुरंत मिल सके।
भारत के सीमावर्ती इलाकों पर सीधा असर: गंडक और कोसी के मुहाने पर बिहार-यूपी में बढ़ा अलर्ट
नेपाल की भोटेकोशी और त्रिशूली नदियों का पानी अंततः नारायणी (बड़ी गंडक) और कोसी नदी प्रणाली में समाहित होता है, जो सीधे भारत के बिहार और उत्तर प्रदेश के मैदानी इलाकों में प्रवेश करती हैं। नेपाल में जलस्तर में आए इस ताजा उछाल का सीधा असर भारत-नेपाल सीमा पर स्थित वाल्मीकिनगर गंडक बैराज और वीरपुर कोसी बैराज पर दिखने लगा है। पिछले 24 घंटों में दोनों नदियों के डिस्चार्ज में भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
बिहार के पश्चिमी चंपारण, पूर्वी चंपारण, गोपालगंज, सारण, सुपौल और सहरसा के साथ-साथ उत्तर प्रदेश के कुशीनगर और महराजगंज जिलों के प्रशासन ने सीमावर्ती तटबंधों पर 24 घंटे की पेट्रोलिंग शुरू कर दी है। छितौनी बांध और कोसी के संवेदनशील तटबंधों पर अतिरिक्त बालू की बोरियां और जियो-बैग्स लगाए जा रहे हैं। केंद्रीय जल आयोग (CWC) और राज्य आपदा प्रबंधन विभागों ने नदी किनारे बसे मछुआरों और तटीय ग्रामीणों को सतर्क रहने और गहरे पानी में न जाने की कड़ी हिदायत दी है।
भारत का मानवीय सहयोग: 68 टन से अधिक राहत सामग्री और डीएनए फोरेंसिक दल तैनात
आपदा की इस अत्यंत दुखद घड़ी में भारत ने पड़ोसी धर्म निभाते हुए नेपाल को व्यापक स्तर पर मानवीय, चिकित्सीय और तकनीकी सहायता प्रदान की है। भारतीय वायु सेना के विमानों और थल मार्ग से अब तक 68.5 टन से अधिक आपातकालीन राहत सामग्री—जिसमें टेंट, कंबल, दवाइयां, वाटर प्यूरीफायर और सूखा राशन शामिल हैं—काठमांडू भेजी जा चुकी है।
नेपाल में भारतीय राजदूत नवीन श्रीवास्तव और विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल के अनुसार, आपदा में अब तक 149 से अधिक फंसे हुए भारतीय नागरिकों को सुरक्षित निकाला जा चुका है। भारत की ओर से डॉक्टरों, आपदा विशेषज्ञों और एक उच्चस्तरीय फोरेंसिक टीम को भी नेपाल में तैनात किया गया है। यह फोरेंसिक टीम मृतकों के डीएनए सैंपलिंग और अज्ञात शवों की वैज्ञानिक पहचान सुनिश्चित करने में नेपाल के स्वास्थ्य महकमे की सीधी मदद कर रही है। दोनों देशों की एजेंसियां पूरी तरह मुस्तैद हैं ताकि इस दोहरे मानसूनी संकट से न्यूनतम जानमाल के नुकसान के साथ निपटा जा सके।