आधुनिक युद्ध के लिए भारत का मास्टरप्लान, रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह का बड़ा एलान

आधुनिक युद्ध के लिए भारत का मास्टरप्लान, रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह का बड़ा एलान

आधुनिक युद्धकला के बदलते तौर-तरीकों, डिजिटल हमलों और सीमा पार से मंडराते ड्रोन खतरों के बीच भारत अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा संरचना का अभूतपूर्व पुनर्गठन करने जा रहा है। नई दिल्ली में आयोजित 'अग्रसर भारत' मंच के उच्चस्तरीय सत्र को संबोधित करते हुए देश के रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण रणनीतिक रोडमैप का अनावरण किया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भविष्य के युद्ध केवल पारंपरिक हथियारों से नहीं बल्कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), तेज डेटा प्रोसेसिंग और एल्गोरिदम के दम पर लड़े जाएंगे। इसी वास्तविकता को स्वीकार करते हुए भारत अपनी तीनों सैन्य सेवाओं—थल सेना, नौसेना और वायु सेना—के लिए एक स्वदेशी और समर्पित 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस लेयर' (AI Layer) विकसित करने पर मिशन मोड में काम कर रहा है। इसके साथ ही रक्षा सचिव ने यह भी घोषणा की कि भारत ने अपने घरेलू मिसाइल उत्पादन में भारी तेजी लाने, बहुस्तरीय एयर डिफेंस ग्रिड को अभेद्य बनाने और रक्षा निर्यात को ऐतिहासिक रिकॉर्ड ऊंचाई तक पहुंचाने में अद्वितीय सफलता हासिल की है।

सेना के लिए खुद तैयार करनी होगी अपनी AI लेयर: विदेशी कंपनियों पर निर्भरता पूरी तरह अस्वीकार्य

रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह ने रेखांकित किया कि आधुनिक युद्धक्षेत्र में किसी भी सैन्य कमांडर के लिए सबसे महत्वपूर्ण कारक 'क्विक डिसीजन मेकिंग' यानी त्वरित और अचूक निर्णय लेना होता है। युद्ध की स्थिति में दुश्मन के लक्ष्यों का तुरंत पता लगाने, विभिन्न सेंसरों से प्राप्त इनपुट्स को सेकंडों के भीतर प्रोसेस करने और 'सेंसर-टू-शूटर' लूप को पलक झपकते पूरा करने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता की भूमिका अपरिहार्य हो चुकी है। इस पूरी प्रक्रिया में अत्यंत संवेदनशील, वर्गीकृत और रणनीतिक सैन्य डेटा का उपयोग होता है, जिसे किसी भी बाहरी प्लेटफॉर्म के साथ साझा नहीं किया जा सकता। रक्षा सचिव ने दो टूक शब्दों में कहा कि कोई भी विदेशी मुल्क या निजी टेक दिग्गज आपको इस स्तर की कोर मिलिट्री एआई तकनीक नहीं सौंपेगा। इसलिए भारत को अपनी संप्रभु सुरक्षा के लिए अपनी सेनाओं की विशेष जरूरतों के अनुरूप खुद की एआई लेयर तैयार करनी होगी। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि जहां आवश्यक होगा, वहां समान विचारधारा वाले मित्र राष्ट्रों के साथ तकनीकी सहयोग और अनुसंधान साझेदारी की संभावनाओं का स्वागत किया जाएगा।

भारत का 'आयरन डोम' और IACCS नेटवर्क: एयरस्पेस की सुरक्षा के लिए मजबूत डिजिटल कवच

देश के हवाई क्षेत्र को दुश्मन के रॉकेटों, क्रूज मिसाइलों और विमानों से पूरी तरह सुरक्षित करने के लिए भारत ने राष्ट्रीय वायु रक्षा संरचना में क्रांतिकारी कदम उठाए हैं। रक्षा सचिव ने बताया कि 'इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम' (IACCS) पूरे देश के हवाई रक्षा तंत्र के लिए एक एकीकृत डिजिटल आधारशिला के रूप में कार्य कर रहा है। यह अत्याधुनिक एयरस्पेस कंट्रोल सिस्टम पूरी तरह से ऑटोमेटेड और नेटवर्क से जुड़ा हुआ है। इसके अंतर्गत जमीन पर तैनात रडार, अवाक्स (AEW&C) जैसे हवाई निगरानी प्लेटफॉर्म और सतह से हवा में मार करने वाली सभी मिसाइल प्रणालियां एक ही डिजिटल धागे में पिरोई गई हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री द्वारा घोषित भारत के अपने 'आयरन डोम' जैसी व्यापक रक्षा परियोजना का उल्लेख करते हुए कहा कि शीर्ष नेतृत्व के मन में हमेशा से यही परिकल्पना रही है कि भारत का आसमान हर तरह के हवाई खतरे से पूरी तरह अभेद्य और सुरक्षित रहे।

पुराने हथियारों का रणनीतिक इस्तेमाल: ड्रोन मार गिराने के लिए रडार रेट्रोफिटेड गन और मिसाइल उत्पादन पर जोर

सैन्य आधुनिकीकरण के दीर्घकालिक दृष्टिकोण पर बात करते हुए राजेश कुमार सिंह ने एक बेहद व्यावहारिक और आर्थिक रणनीति का खुलासा किया। उन्होंने कहा कि यद्यपि पुरानी हथियार प्रणालियों को चरणबद्ध तरीके से नई तकनीकों से बदला जा रहा है, लेकिन भारतीय सैन्य योजनाकारों ने पुराने साजो-सामान का भी बेहतरीन सामरिक उपयोग ढूंढ निकाला है। उदाहरण के तौर पर, आधुनिक रडार और ऑटोमेटेड फायर कंट्रोल के साथ रेट्रोफिट की गई पारंपरिक एयर डिफेंस तोपें सस्ते आत्मघाती ड्रोन्स के खिलाफ सबसे सटीक और किफायती हथियार साबित हो रही हैं। लाखों डॉलर की महंगी मिसाइल से एक सस्ते ड्रोन को गिराने के बजाय ये रेट्रोफिटेड गन बेहद कम लागत में दुश्मन के मंसूबों को नाकाम कर देती हैं। इसके अलावा, उन्होंने बैलिस्टिक मिसाइलों के बड़े पैमाने पर घरेलू उत्पादन को बढ़ाने की अनिवार्यता पर बल दिया। उन्होंने पश्चिम एशिया का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस तरह ईरान ने भारी संख्या में उत्पादन करके मिसाइलों की प्रति यूनिट लागत को बेहद कम कर दिखाया है, उसी मॉडल पर भारत को भी बड़े पैमाने पर स्वदेशी उत्पादन करना होगा ताकि युद्ध के समय गोला-बारूद और मिसाइल का रणनीतिक भंडार कभी कम न पड़े।

38,424 करोड़ का रिकॉर्ड रक्षा निर्यात: यूरोप का तीसरा सबसे बड़ा हथियार निर्यातक बना भारत

आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत देश के रक्षा निर्माण क्षेत्र ने वैश्विक बाजार में अपनी धमक मजबूती से दर्ज कराई है। रक्षा सचिव ने गर्व के साथ साझा किया कि भारत का रक्षा निर्यात अब तक के अपने सर्वोच्च ऐतिहासिक स्तर 38,424 करोड़ रुपये पर पहुंच गया है। कुछ वर्ष पहले तक केवल आयातक के रूप में देखे जाने वाले भारत ने अब हथियारों और गोला-बारूद के वैश्विक बाजार में अपनी एक मजबूत पहचान बनाई है। विशेष रूप से यूरोपीय देशों में भारतीय रक्षा उपकरणों और गोला-बारूद की भारी मांग देखी जा रही है, जिसके चलते भारत वर्तमान में यूरोप को हथियार और रक्षा साजो-सामान निर्यात करने वाला तीसरा सबसे बड़ा देश बनकर उभरा है। यह उपलब्धि न केवल भारत के बढ़ते भू-राजनीतिक प्रभाव को दर्शाती है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था और घरेलू रक्षा उद्योगों को भी नई ऊंचाई प्रदान कर रही है।