ताशकंद के लिए रवाना हुए पीएम मोदी: जानिए भारत के लिए क्यों बेहद अहम है उज्बेकिस्तान की राजधानी? यहीं देश ने खोया था अपना 'लाल', 1966 के ताशकंद समझौते और शास्त्री जी की शहादत की दर्दनाक दास्तान

ताशकंद के लिए रवाना हुए पीएम मोदी: जानिए भारत के लिए क्यों बेहद अहम है उज्बेकिस्तान की राजधानी? यहीं देश ने खोया था अपना 'लाल', 1966 के ताशकंद समझौते और शास्त्री जी की शहादत की दर्दनाक दास्तान

नई दिल्ली/ताशकंद: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मध्य एशियाई भू-राजनीति के सबसे अहम केंद्र उज्बेकिस्तान की राजधानी ताशकंद के उच्चस्तरीय कूटनीतिक दौरे पर रवाना हो चुके हैं। भारत की 'कनेक्ट सेंट्रल एशिया' नीति, यूरेशियाई व्यापारिक गलियारों, ऊर्जा सुरक्षा और आतंकवाद विरोधी सुरक्षा तंत्र को नई दिशा देने के लिहाज से पीएम मोदी की यह यात्रा रणनीतिक दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है। ऐतिहासिक सिल्क रूट के केंद्र में बसे ताशकंद शहर के साथ भारत के रिश्ते केवल वर्तमान व्यापार, यूरेनियम आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि इसका भारत के राजनीतिक इतिहास और करोड़ों देशवासियों की स्मृतियों के साथ एक बेहद भावुक और गहरा रिश्ता भी है। ताशकंद वही ऐतिहासिक शहर है जिसने वर्ष 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद दोनों देशों के बीच शांति समझौते की मेज सजाई थी, लेकिन इसी शहर की बर्फीली रात ने भारत को एक ऐसा कभी न भरने वाला गहरा जख्म भी दिया, जिसकी टीस आज छह दशक बाद भी हर भारतीय के दिल में ताजा है।

ताशकंद का वह गहरा जख्म: जब देश ने खोया था अपना सच्चा 'लाल'

ताशकंद का नाम आते ही हर भारतीय के जेहन में देश के दूसरे प्रधानमंत्री और 'जय जवान, जय किसान' का अमर नारा देने वाले भारत रत्न लाल बहादुर शास्त्री का पावन चेहरा और उनका रहस्यमयी निधन कौंध जाता है। वर्ष 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में भारतीय सेना ने लाहौर के करीब तक पहुंचकर अदम्य पराक्रम दिखाया था। युद्धविराम के बाद सोवियत संघ के तत्कालीन प्रधानमंत्री अलेक्सी कोसिगिन की मध्यस्थता में ताशकंद में भारत और पाकिस्तान के बीच एक उच्चस्तरीय शांति शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया था।

लंबी और पेचीदा वार्ताओं के बाद 10 जनवरी 1966 की शाम लाल बहादुर शास्त्री और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने ऐतिहासिक 'ताशकंद समझौते' (Tashkent Declaration) पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते के तहत दोनों देशों ने विजित क्षेत्रों से अपनी सेनाओं को वापस बुलाने और शांति बहाली पर सहमति जताई थी। हालांकि, समझौते पर हस्ताक्षर करने के महज कुछ ही घंटों बाद 11 जनवरी 1966 की देर रात (लगभग 1:30 बजे) ताशकंद के एक विला (Dacha) में ठहरे प्रधानमंत्री शास्त्री की अचानक तबीयत बिगड़ी और उनका निधन हो गया। आधिकारिक तौर पर उनकी मृत्यु का कारण दिल का दौरा (Myocardial Infarction) बताया गया, लेकिन उनके शरीर पर पड़े नीले निशानों, ताशकंद में पोस्टमार्टम न कराए जाने और परिस्थितियों को लेकर देश भर में जहर दिए जाने की अनगिनत आशंकाएं और षड्यंत्र के सिद्धांत आज तक भारतीय जनमानस को उद्वेलित करते हैं। ताशकंद की उस रात ने भारत से उसका सबसे सरल, ईमानदार और साहसी जननायक हमेशा के लिए छीन लिया था।

ताशकंद में लाल बहादुर शास्त्री का स्मारक: आज भी जीवंत है सादगी और शौर्य की गाथा

इस ऐतिहासिक दर्द के बावजूद उज्बेकिस्तान की जनता और वहां की सरकारों ने लाल बहादुर शास्त्री की स्मृति को अपने दिल में संजोकर रखा है। ताशकंद के मध्य में स्थित 'शास्त्री स्ट्रीट' पर उनकी एक विशाल कांस्य प्रतिमा और भव्य स्मारक स्थापित है, जिसे भारत-उज्बेक मैत्री का सबसे पवित्र प्रतीक माना जाता है।

ताशकंद में एक प्रतिष्ठित माध्यमिक विद्यालय का नामकरण भी लाल बहादुर शास्त्री के नाम पर किया गया है, जहां उज्बेक छात्र-छात्राएं बड़ी लगन से हिंदी भाषा और भारतीय संस्कृति का अध्ययन करते हैं। अपनी इस यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ताशकंद स्थित लाल बहादुर शास्त्री स्मारक पर जाकर पुष्पांजलि अर्पित करने और देश के इस महान सपूत को श्रद्धांजलि देने का कार्यक्रम निर्धारित है। यह भावनात्मक जुड़ाव दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों को एक अनूठे और मानवीय धरातल पर स्थापित करता है।

सामरिक और यूरेशियाई द्वार: भारत के लिए आज क्यों इतना महत्वपूर्ण है ताशकंद?

मध्य एशिया के पांचों गणराज्यों में उज्बेकिस्तान सबसे अधिक आबादी (लगभग 3.6 करोड़) वाला और भौगोलिक दृष्टि से मध्य में स्थित राष्ट्र है। ताशकंद को यूरेशिया का दिल और भारत के लिए मध्य एशिया का 'प्रवेश द्वार' माना जाता है। भारत के लिए इस शहर और देश का रणनीतिक महत्व निम्नलिखित प्रमुख स्तंभों पर टिका है:

  • ऊर्जा और यूरेनियम सुरक्षा: उज्बेकिस्तान दुनिया के शीर्ष यूरेनियम उत्पादक देशों में शामिल है। भारत के घरेलू परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के निर्बाध संचालन के लिए उज्बेकिस्तान के साथ दीर्घकालिक यूरेनियम आपूर्ति समझौता भारत की ऊर्जा संप्रभुता के लिए रीढ़ की हड्डी के समान है।

  • चाबहार पोर्ट और INSTC कनेक्टिविटी: पाकिस्तान द्वारा भारत को दिए जाने वाले जमीनी रास्ते को अवरुद्ध करने के बाद भारत ईरान के चाबहार बंदरगाह के जरिए ताशकंद और पूरे मध्य एशिया तक सीधी माल ढुलाई का नेटवर्क तैयार कर रहा है। 'अश्गाबात समझौते' और अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे के जरिए ताशकंद भारत को यूरेशियाई आर्थिक संघ (EAEU) और यूरोप से जोड़ने वाला मुख्य जंक्शन है।

  • अफगानिस्तान और क्षेत्रीय स्थिरता: उज्बेकिस्तान की सीमा अफगानिस्तान से सीधे लगती है। काबुल में तालिबान शासन के बाद से ताशकंद और नई दिल्ली का सुरक्षा दृष्टिकोण पूरी तरह एक समान रहा है कि अफगान जमीन का इस्तेमाल अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद और ड्रग्स तस्करी के लिए न होने दिया जाए।

आतंकवाद के खिलाफ साझा मोर्चा और 'डस्टलिक' सैन्य साझेदारी

रक्षा और सुरक्षा के मोर्चे पर ताशकंद भारत का एक बेहद विश्वसनीय साझीदार बनकर उभरा है। शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के आतंकवाद-रोधी विंग 'रीजनल एंटी-टेररिस्ट स्ट्रक्चर' (RATS) का स्थायी मुख्यालय ताशकंद में ही स्थित है, जहां भारत और उज्बेकिस्तान मिलकर सीमा पार आतंकवाद, कट्टरपंथ और साइबर हमलों से निपटने के लिए खुफिया जानकारियां साझा करते हैं।

दोनों देशों की थल सेनाएं नियमित रूप से 'डस्टलिक' (Ex-DUSTLIK) नामक संयुक्त सैन्य अभ्यास आयोजित करती हैं, जिसमें पर्वतीय और अर्ध-शहरी इलाकों में आतंकवादियों के सफाए के लिए विशेष कमांडो रणनीतियों का अभ्यास किया जाता है। भारत उज्बेकिस्तान के सैन्य बलों को आधुनिक संचार उपकरण, सैन्य वाहन, यूएवी (ड्रोन) रोधी तकनीक और कैडेट्स के लिए उच्चस्तरीय प्रशिक्षण भी उपलब्ध करा रहा है।

डिजिटल इंडिया से लेकर फार्मा और आईटी: आर्थिक सहयोग का नया विस्तार

पीएम मोदी की ताशकंद यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच व्यापार, निवेश और तकनीकी सहयोग के कई महत्वपूर्ण समझौतों पर मुहर लगने की संभावना है। भारत के सफल 'डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर' (DPI) मॉडल और यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) को उज्बेकिस्तान के वित्तीय तंत्र के साथ एकीकृत करने की दिशा में ठोस बातचीत चल रही है।

इसके अलावा, भारतीय फार्मास्युटिकल कंपनियां ताशकंद और समरकंद के विशेष आर्थिक क्षेत्रों (SEZ) में संयुक्त दवा निर्माण संयंत्र स्थापित कर रही हैं। ताशकंद में स्थापित 'अमिती यूनिवर्सिटी' और 'शारदा यूनिवर्सिटी' के अंतरराष्ट्रीय परिसरों ने शिक्षा क्षेत्र में भारतीय उपस्थिति को काफी मजबूत किया है। भारतीय आईटी कंपनियां उज्बेकिस्तान के युवाओं को सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और फिनटेक में प्रशिक्षित करने के लिए ताशकंद में आईटी पार्क का विस्तार कर रही हैं।

सदियों पुराना सांस्कृतिक नाता: सिल्क रूट, बॉलीवुड और हिंदी का क्रेज

भारत और उज्बेकिस्तान के संबंध केवल आधुनिक कूटनीति की पैदाइश नहीं हैं, बल्कि यह दो हजार वर्षों से अधिक पुराने सभ्यतागत संबंधों पर आधारित हैं। प्राचीन काल में बौद्ध भिक्षु और व्यापारी वाराणसी, पाटलिपुत्र और तक्षशिला से होते हुए ताशकंद, समरकंद और बुखारा के रास्ते व्यापार और विचारों का आदान-प्रदान करते थे।

उज्बेकिस्तान के समाज में भारतीय फिल्मों, संगीत और संस्कृति के प्रति असाधारण दीवानगी देखने को मिलती है। राज कपूर से लेकर अमिताभ बच्चन और शाहरुख खान की फिल्में आज भी ताशकंद के घर-घर में बेहद चाव से देखी जाती हैं। ताशकंद स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ ओरिएंटल स्टडीज में दशकों से हिंदी विभाग संचालित हो रहा है, जहां उज्बेक विद्वान भारतीय साहित्य और इतिहास पर शोध कर रहे हैं। योग और आयुर्वेद के प्रति उज्बेक नागरिकों का बढ़ता रुझान इस सॉफ्ट-पावर साझेदारी को और अधिक जीवंत बनाता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यह ताशकंद यात्रा न केवल 1966 के उस गहरे ऐतिहासिक दर्द पर एक बार फिर श्रद्धा और सम्मान के पुष्प अर्पित करने का अवसर है, बल्कि यह 21वीं सदी के बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन में मध्य एशिया के साथ भारत के सामरिक, आर्थिक और सांस्कृतिक रिश्तों को नई ऊंचाइयों पर ले जाने का एक निर्णायक मील का पत्थर साबित होने जा रही है।

Latest Posts