समुद्र मंथन योजना: गहरे समंदर में तेल खोजेंगी कंपनियां, क्या है सरकार का ₹84,084 करोड़ का मेगा प्लान
भारत को ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने और कच्चे तेल के भारी-भरकम आयात बिल से मुक्ति दिलाने की दिशा में केंद्र सरकार ने अब तक का सबसे बड़ा और साहसिक कदम उठाया है। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने 84,084 करोड़ रुपये की लागत वाली महत्वाकांक्षी 'समुद्र मंथन योजना' (Samudra Manthan Scheme) के विस्तृत दिशा-निर्देश जारी कर दिए हैं। इस गेम-चेंजर पॉलिसी के तहत सरकार देश के गहरे और अत्यधिक गहरे समुद्री इलाकों (डीपवाटर और अल्ट्रा-डीपवाटर ब्लॉक्स) में कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के नए भंडारों की खोज के लिए वैश्विक और घरेलू ऊर्जा कंपनियों के साथ वित्तीय जोखिम साझा करेगी। गहरे पानी में ड्रिलिंग तकनीक बेहद जटिल, महंगी और अनिश्चितताओं से भरी होती है, जिसके चलते कई बड़ी ऊर्जा कंपनियां भारी पूंजी लगाने से कतराती रही हैं। अब भारत सरकार इन जोखिम भरे अपतटीय कुओं की खुदाई और आधुनिक सिस्मिक सर्वेक्षणों के खर्च का एक बड़ा हिस्सा खुद वहन करेगी, जिससे भारत के एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन (ईईजेड) में तेल और गैस के दोहन को आर्थिक रूप से व्यावहारिक और आकर्षक बनाया जा सके।
ऊर्जा आयात पर निर्भरता घटाने का ऐतिहासिक ब्लूप्रिंट: 2030-31 तक चलेगा समुद्र मंथन मिशन
वर्तमान में भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का 85 प्रतिशत से अधिक हिस्सा विदेशों से आयात करता है, जिससे देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर भारी दबाव पड़ता है और वैश्विक भू-राजनीतिक तनावों का सीधा असर घरेलू अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। समुद्र मंथन योजना का प्राथमिक लक्ष्य इसी आयात निर्भरता को चरणबद्ध तरीके से न्यूनतम स्तर पर लाना है। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय द्वारा तय किए गए रोडमैप के अनुसार, यह महायोजना वित्त वर्ष 2030-31 तक संचालित की जाएगी। परियोजना के टाइमलाइन को सुव्यवस्थित करते हुए वित्त वर्ष 2026-27 को 'तैयारी का वर्ष' (प्रिपेरेटरी ईयर) घोषित किया गया है, जिसके दौरान जरूरी तकनीकी सर्वेक्षण, नीतियों की रूपरेखा और कंपनियों के साथ शुरुआती साझेदारी के मानक तय किए जाएंगे। इसके बाद वित्त वर्ष 2027-28 से लेकर 2030-31 तक की चार साल की समयावधि को 'चरण-1' (फेज-1) के रूप में लागू किया जाएगा, जिसमें 84,084 करोड़ रुपये के विशाल फंड का मुख्य वित्तीय आवंटन और वास्तविक खर्च धरातल पर उतारा जाएगा।
जोखिम भरे कुओं का खर्च बांटेगी सरकार: सिस्मिक मैपिंग और साझा उत्पादन सुविधाओं को मिलेगी सीधी फंडिंग
गहरे समुद्र में तेल की खोज पारंपरिक जमीनी या उथले पानी के कुओं की तुलना में कई गुना अधिक खर्चीली होती है। समुद्र की सतह से हजारों मीटर नीचे तलहटी में ड्रिलिंग करने के लिए अत्याधुनिक जहाजों, रोबोटिक्स और भारी मशीनरी की आवश्यकता होती है, और कई बार भारी निवेश के बाद भी कुआं सूखा (ड्राई वेल) निकल जाता है। समुद्र मंथन योजना के तहत केंद्र सरकार ने इस वित्तीय जोखिम को सीधे अपने कंधों पर लेने का क्रांतिकारी फैसला किया है। योजना के प्रावधानों के मुताबिक, सरकार अन्वेषण करने वाली कंपनियों के लिए जोखिम भरे वाइल्डकैट कुओं (नए संभावित क्षेत्रों में खोदे जाने वाले कुएं) की लागत का एक निश्चित हिस्सा सब्सिडी और ग्रांट के रूप में वहन करेगी। इसके साथ ही, भारत के अपतटीय बेसिनों की उच्च-सटीकता वाली 2D और 3D सिस्मिक मैपिंग (भूकंपीय डेटा सर्वेक्षण) के लिए शत-प्रतिशत बजटीय सहायता दी जाएगी ताकि कंपनियों को तलहटी के नीचे छिपे हाइड्रोकार्बन संरचनाओं की सटीक जानकारी मिल सके। यही नहीं, लागत को और कम करने के लिए सरकार कई कंपनियों द्वारा मिलकर इस्तेमाल की जा सकने वाली साझा उत्पादन और प्रसंस्करण सुविधाएं (शेयर्ड प्रोडक्शन इंफ्रास्ट्रक्चर) स्थापित करने में भी बड़ा वित्तीय सहयोग प्रदान करेगी।
600 मिलियन टन तेल समतुल्य भंडार की होगी बढ़ोतरी: पेट्रोलियम सचिव नीरज मित्तल ने बताया सबसे बड़ा कदम
पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के सचिव नीरज मित्तल ने समुद्र मंथन योजना के दिशा-निर्देशों की प्रस्तावना में इस पहल को आधुनिक भारत के तेल एवं गैस अन्वेषण इतिहास का सबसे बड़ा मोड़ करार दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह हाल के दशकों में ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए तैयार की गई सबसे दूरदर्शी और महत्वाकांक्षी नीति है। सचिव नीरज मित्तल के अनुसार, इस योजना के सफल क्रियान्वयन से भारत के प्रमाणित हाइड्रोकार्बन भंडार में 600 मिलियन टन से अधिक तेल समतुल्य (ऑयल इक्विवेलेंट) की भारी वृद्धि होने का ठोस अनुमान है। 600 मिलियन टन का यह संभावित इजाफा न केवल देश की आने वाली ऊर्जा आवश्यकताओं को वर्षों तक सुरक्षित रखने में सक्षम होगा, बल्कि वैश्विक मंच पर ऊर्जा संकट के समय भारत को एक मजबूत और लचीली स्थिति में खड़ा कर देगा। उन्होंने विश्वास जताया कि सरकारी वित्तीय साझेदारी से आकर्षित होकर बीपी, शेल, एक्सॉनमोबिल, ओएनजीसी और रिलायंस जैसी दिग्गज ऊर्जा कंपनियां भारतीय समुद्री क्षेत्रों में रिकॉर्ड निवेश के लिए आगे आएंगी।
गहरे और बहुत गहरे पानी में छिपे हैं अनछुए खजाने: आधुनिक तकनीक से बदलेगी भारत की ऊर्जा तस्वीर
अंडमान-निकोबार बेसिन, बंगाल की खाड़ी के कृष्णा-गोदावरी और कावेरी गहरे बेसिन, तथा पश्चिमी तट के गहरे समुद्री इलाके अब तक अपनी जटिल भूगर्भीय संरचनाओं के कारण पूरी तरह से तलाशे नहीं जा सके हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इन क्षेत्रों में भारी मात्रा में प्राकृतिक गैस और उच्च गुणवत्ता वाले कच्चे तेल के भंडार दबे हुए हैं। समुद्र मंथन योजना इन अनछुए बेसिनों में अत्याधुनिक फ्लोटिंग प्रोडक्शन स्टोरेज एंड ऑफलोडिंग (एफपीएसओ) जहाजों, सब-सी रोबोटिक्स और डीपवाटर ड्रिलिंग रिग्स की तैनाती को गति देगी। जब सरकार और निजी या सार्वजनिक कंपनियां मिलकर काम करेंगी, तो जोखिम कम होने से तकनीक का हस्तांतरण तेज होगा और भारत के भीतर ही गहरे समुद्र में काम करने वाले कुशल कार्यबल और सहायक उद्योगों का एक नया पारिस्थितिकी तंत्र विकसित होगा। यह विशाल निवेश देश की जीडीपी वृद्धि को गति देने के साथ-साथ बंदरगाहों, लॉजिस्टिक्स और रिफाइनिंग सेक्टर में लाखों प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर भी पैदा करेगा