'बेजान कॉन्फ्रेंस सेंटर जैसा लगता है नया संसद भवन...': शशि थरूर को नहीं आई नई इमारत पसंद, सेंट्रल हॉल से लेकर डिजाइन तक गिनाईं ये 4 बड़ी खामियां

'बेजान कॉन्फ्रेंस सेंटर जैसा लगता है नया संसद भवन...': शशि थरूर को नहीं आई नई इमारत पसंद, सेंट्रल हॉल से लेकर डिजाइन तक गिनाईं ये 4 बड़ी खामियां

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और तिरुवनंतपुरम से सांसद शशि थरूर ने देश के नए संसद भवन के डिजाइन और वहां के आंतरिक माहौल पर खुलकर अपनी नाखुशी जाहिर की है। पत्रकार और लेखिका शोभना के. नायर की पुस्तक 'हाउसिंग द रिपब्लिक: अ बायोग्राफी ऑफ द इंडियन पार्लियामेंट' के विमोचन कार्यक्रम के दौरान थरूर ने नए संसद भवन को एक "भावशून्य सम्मेलन केंद्र" (Soulless Conference Centre) करार दिया। उन्होंने कहा कि आधुनिक सुविधाओं से लैस होने के बावजूद इस नई इमारत में पुराने संसद भवन जैसा अपनापन, आत्मीयता और बातचीत का वह सहज माहौल पूरी तरह गायब है। थरूर के मुताबिक, इस इमारत की बनावट मौजूदा राजनीति में बढ़ते ध्रुवीकरण और दूरियों को दर्शाती है।

शशि थरूर द्वारा गिनाई गईं प्रमुख खामियां:

  • ऊंची छतें और पंखे जैसा लेआउट (Fan-Shaped Layout): थरूर ने कहा कि नए सदन की छतें बेहद ऊंची हैं और सांसदों के बैठने की व्यवस्था पंखे के आकार की है, जिससे सदस्यों के बीच आपसी दूरी बढ़ गई है। पुराने चैंबर में एक तरह की नजदीकी थी जो सांसदों के बीच बातचीत और विचारों के आदान-प्रदान को बढ़ावा देती थी।

  • सेंट्रल हॉल (Central Hall) का न होना: उन्होंने सेंट्रल हॉल की अनुपस्थिति को सबसे बड़ा नुकसान बताया। पुरानी संसद में सेंट्रल हॉल वह जगह थी जहां सत्ता पक्ष और विपक्ष के मौजूदा व पूर्व सांसद, वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक अनौपचारिक रूप से बैठकर बातचीत करते थे। इस जगह के खत्म होने से दलों के बीच का दोस्ताना तालमेल और अनौपचारिक संवाद काफी घट गया है।

  • 850 सांसदों के विस्तार पर चिंता: थरूर ने लोकसभा में सांसदों की संख्या बढ़ाकर 850 करने के विचार पर भी सवाल उठाए। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि इतने बड़े सदन में सांसद 'अजनबियों की भीड़' बनकर रह सकते हैं, जो केवल अपने नेता के भाषणों पर औपचारिक रूप से मेजें थपथपाएंगे, जिससे सार्थक संसदीय विमर्श की मूल भावना खत्म हो जाएगी।

एक व्यावहारिक सुधार की तारीफ भी की

कड़ी आलोचना के बावजूद शशि थरूर ने नए भवन की एक व्यावहारिक सुविधा की सराहना भी की। उन्होंने माना कि पुराने भवन में सीटें काफी तंग थीं, जहां सांसदों को अपनी जगह से गलियारे तक जाने के लिए अन्य साथियों के पैरों के बीच से सिकुड़कर निकलना पड़ता था। नए संसद भवन में पर्याप्त जगह होने की वजह से बैठने की यह पुरानी असुविधा जरूर दूर हो गई है।

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