नवरात्रि के बाद कलश की सामग्री और हवन की राख फेंकने की न करें भूल, जानें घर में बरकत और सकारात्मक ऊर्जा लाने वाले अचूक नियम
शारदीय अथवा चैत्र नवरात्रि के नौ दिनों तक चलने वाले पावन अनुष्ठान के बाद जब व्रत का पारण होता है, तो सबसे महत्वपूर्ण कार्य पूजा स्थल की सामग्रियों का सही और विधिपूर्वक प्रबंधन करना होता है। कलश स्थापना के दौरान स्थापित किए गए कलश, उसमें रखा पवित्र जल, आम के पत्ते, रोली-अक्षत, सुपारी, सिक्का, नारियल और नौ दिनों की साधना के बाद हवन कुंड से प्राप्त भस्म—ये सभी वस्तुएं साधारण नहीं रह जातीं। नौ दिनों के निरंतर मंत्रोच्चार, धूप-दीप और मां दुर्गा के आह्वान से ये सभी चीजें अत्यंत दिव्य और सकारात्मक ऊर्जा से भर जाती हैं। अक्सर जानकारी के अभाव में लोग इन सामग्रियों को इधर-उधर फेंक देते हैं या प्लास्टिक की थैलियों में भरकर कचरे के पास रख देते हैं, जिससे अनजाने में वास्तु दोष और धार्मिक अपराध लगता है। शास्त्रों के अनुसार, इन पवित्र वस्तुओं का सही उपयोग और शास्त्रसम्मत विसर्जन ही घर में सुख, शांति, समृद्धि और अखंड बरकत का संचार करता है।
हवन की पवित्र राख (भस्म) का क्या करें: घर की सुरक्षा और बरकत का उपाय
हवन कुंड में दी गई आहुतियों के शांत होने के बाद बची हुई भस्म को कभी भी बेकार समझकर झाड़ू से बाहर न निकालें। यह साक्षात अग्नि देव और मां भगवती का प्रसाद मानी जाती है। इसका उपयोग इस तरह करें:
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रक्षा कवच के रूप में मस्तक पर तिलक: हवन संपन्न होने के बाद जब भस्म ठंडी हो जाए, तो परिवार के सभी सदस्य इसे अपनी अनामिका उंगली से मस्तक, कंठ और नाभि पर तिलक के रूप में लगाएं। धार्मिक मान्यता है कि यह भस्म नकारात्मक शक्तियों, नजर दोष और मानसिक तनाव से रक्षा करती है।
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घर की नकारात्मक ऊर्जा दूर करने का उपाय: थोड़ी सी ठंडी भस्म को लेकर घर के सभी कमरों के कोनों और मुख्य द्वार पर चुटकी भर छिड़क दें। वास्तु शास्त्र के अनुसार, इससे घर में मौजूद वास्तु दोष और नकारात्मक कंपन समाप्त होते हैं।
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तिजोरी या व्यापार स्थल पर रखें: एक छोटे लाल या सफेद कागज में थोड़ी सी भस्म बांधकर अपनी तिजोरी, गल्ले या लॉकर में रख लें। ऐसा माना जाता है कि हवन की भस्म धन के अपव्यय को रोकती है और आर्थिक स्थिरता लाती है।
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गमलों और पौधों के लिए खाद: बची हुई अतिरिक्त राख को किसी साफ पौधे, जैसे तुलसी, शमी, गुड़हल या बेलपत्र के गमले की मिट्टी में मिला दें। यह न केवल धार्मिक रूप से शुद्ध तरीका है, बल्कि राख में मौजूद पोटाश और मिनरल्स पौधों के लिए बेहतरीन प्राकृतिक खाद का काम करते हैं।
कलश के जल, आम के पत्तों और चावल का क्या करें
कलश को ब्रह्मांड और सभी तीर्थों का प्रतीक माना जाता है। विसर्जन से पूर्व कलश को थोड़ा सा हिलाकर मां की विदाई का संकल्प लें और फिर उसके भीतर की सामग्रियों का इस प्रकार उपयोग करें:
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कलश का पवित्र जल: कलश के जल को आम के पत्तों या दूर्वा की मदद से सबसे पहले पूरे घर के कमरों, रसोई, बालकनी और मुख्य द्वार पर छिड़कें (शौचालय को छोड़कर)। इससे घर का वातावरण शुद्ध होता है। इसके बाद जो जल बच जाए, उसे परिवार के सभी लोग चरणामृत की तरह थोड़ा-थोड़ा ग्रहण करें और बाकी जल को तुलसी के पौधे या किसी फलदार पेड़ की जड़ में अर्पित कर दें। इसे नाली या सिंक में कभी न बहाएं।
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आम या अशोक के पल्लव: कलश पर सजाए गए पत्तों को सुखाकर घर के बगीचे या गमले की मिट्टी में दबा दें, अथवा बहते हुए स्वच्छ जल में प्रवाहित कर दें।
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कलश के नीचे रखे चावल (अक्षत): कलश स्थापना के समय जो चावल की अष्टदल कमल या ढेरी बनाई जाती है, वह अन्नपूर्णा का रूप होती है। इन चावलों को झाड़ू से समेटकर फेंकने के बजाय आदरपूर्वक उठाएं। इनमें से थोड़े से चावल अपने घर के मुख्य अनाज भंडार (चावल के डिब्बे) में मिला दें, ताकि घर में कभी अन्न की कमी न हो। बाकी बचे चावल को पक्षियों को चुगने के लिए छत या आंगन में डाल दें।
कलश के नारियल, सिक्के और सुपारी का कैसे करें सही इस्तेमाल
कलश के ऊपर रखा गया जटा वाला नारियल और उसके भीतर डाले गए सिक्के व सुपारी को लेकर लोगों में सबसे ज्यादा असमंजस रहता है:
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कलश पर रखा श्रीफल (नारियल): यदि कलश पर रखा नारियल कच्चा (पानी वाला) था, तो कन्या पूजन के बाद इसे प्रसाद के रूप में फोड़कर पूरे परिवार में बांटकर खाया जा सकता है। यदि आपने सूखा नारियल (गोला) रखा था, तो उसे लाल कपड़े में लपेटकर अपने पूजा घर में मां लक्ष्मी के प्रतीक के रूप में स्थापित रहने दें। इसके अलावा यदि आप इसे नहीं रखना चाहते, तो इसे आदरपूर्वक किसी स्वच्छ नदी या बहते जल में प्रवाहित करें।
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कलश का सिक्का: कलश के जल में डाला गया चांदी या तांबे-पीतल का सिक्का अत्यंत शुभ माना जाता है। इसे निकाल कर गंगाजल से धो लें और लाल कपड़े या मौली में लपेटकर अपनी तिजोरी, पर्स या धन रखने के स्थान पर रख लें। यह पूरे वर्ष धन वृद्धि और बरकत का कारक बनता है।
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सुपारी और हल्दी की गांठ: कलश में डाली गई सुपारी को भगवान गणेश का स्वरूप माना जाता है। इसे सुखाकर अपने पूजा स्थान पर गणेश जी के प्रतीक के रूप में रख सकते हैं या तिजोरी में सिक्के के साथ स्थापित कर सकते हैं।
विसर्जन करते समय इन गलतियों से पूरी तरह बचें
पूजा की पवित्रता जितनी नौ दिनों के व्रत के दौरान जरूरी होती है, उतनी ही जरूरी विसर्जन के समय भी होती है। विसर्जन के दौरान इन गलतियों से हमेशा बचें:
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कचरे या डस्टबिन में सामग्री न डालें: किसी भी फूल, माला, जवारे या हवन की सामग्री को कभी भी सामान्य कूड़ेदान में न डालें।
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पैरों के नीचे आने वाली जगह पर न छोड़ें: सूखे फूल और बची हुई सामग्री को किसी ऐसे रास्ते या पेड़ के नीचे न रखें जहां राहगीरों या पशुओं के पैर पड़ें।
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प्लास्टिक बैग का प्रयोग न करें: यदि आप सामग्री को किसी जलाशय में विसर्जित करने जा रहे हैं, तो प्लास्टिक की थैलियों को पानी में न डालें। केवल प्राकृतिक सामग्री को ही प्रवाहित करें।
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गंदे या रुके हुए पानी में विसर्जन न करें: किसी नाले या गंदे तालाब में सामग्री प्रवाहित करने से घोर पाप लगता है।
यदि आपके आसपास कोई स्वच्छ नदी, नहर या तालाब उपलब्ध नहीं है, तो सबसे सुरक्षित और शास्त्रसम्मत विकल्प यह है कि घर के बगीचे या गमले में एक छोटा गड्ढा खोदकर सभी जैविक पूजा सामग्री (फूल, पत्ते, जवारे) को मिट्टी में दबा दें। कुछ ही दिनों में वह प्राकृतिक खाद में बदल जाएगी और पूजा की मर्यादा भी पूरी तरह सुरक्षित रहेगी।