ओवैसी का मुस्लिम वोटों के जरिए कांग्रेस और सपा पर दोहरा प्रहार, यूपी की सियासत में हलचल
उत्तर प्रदेश के मुस्लिम बहुल सियासी गढ़ रामपुर में आयोजित विशाल जनसभा से ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के राष्ट्रीय अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने एक ही तीर से दो बड़े सियासी निशाने साधे हैं। ओवैसी ने देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस और उत्तर प्रदेश में मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी (सपा) पर सीधा हमला बोलते हुए अल्पसंख्यक समाज को नई राजनीतिक राह चुनने का आह्वान किया। ओवैसी ने साफ शब्दों में कहा कि आजादी के बाद से अब तक मुस्लिम कौम को सिर्फ वोट बैंक और झंडा-बैनर उठाने तक सीमित रखा गया, लेकिन अब यह सिलसिला हमेशा के लिए बंद होना चाहिए। ओवैसी ने दो टूक ऐलान करते हुए कहा, "मुसलमान अब नेहरू, गांधी या किसी यादव को अपना नेता नहीं बनाएंगे, बल्कि अपने हक और सम्मान की लड़ाई के लिए अपना खुद का नेता और अपनी राजनीतिक पहचान खुद तैयार करेंगे।"
'वोट हमारा और नेता तुम्हारा' का दौर खत्म: ओवैसी ने उठाए नुमाइंदगी पर सवाल
जनसभा में उमड़ी युवाओं की भारी भीड़ के सामने ओवैसी ने धर्मनिरपेक्षता (सेक्युलरिज्म) के नाम पर अल्पसंख्यकों के साथ हुए राजनीतिक छल का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि जब भी चुनाव आते हैं, तो सेक्युलर दल भाजपा का डर दिखाकर मुसलमानों से एकतरफा वोट ले लेते हैं, लेकिन सत्ता और संगठन में हिस्सेदारी की बारी आते ही उन्हें दरकिनार कर दिया जाता है। ओवैसी ने तीखा सवाल पूछते हुए कहा कि अगर देश और प्रदेश में गांधी परिवार, नेहरू परिवार या मुलायम सिंह यादव के परिवार से नेता बन सकते हैं, तो एक आम मुस्लिम नौजवान का बेटा या बेटी नेतृत्व क्यों नहीं कर सकता? उन्होंने कहा कि जब तक अल्पसंख्यक समाज खुद अपने चुने हुए प्रतिनिधियों को संसद और विधानसभा में नहीं भेजेगा, तब तक कोई दूसरा दल उनके संवैधानिक अधिकारों, नागरिकता और जान-माल की रक्षा के लिए खड़ा नहीं होगा।
सपा के पारंपरिक 'MY' और नए 'PDA' समीकरण पर सीधा प्रहार
उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव जहां 2027 के विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखकर 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के नारे को मजबूत करने में जुटे हैं, वहीं ओवैसी ने इस फार्मूले की जड़ों पर चोट की है। ओवैसी ने आरोप लगाया कि सपा का 'पीडीए' असल में केवल एक छलावा है, जहां मलाईदार पद और टिकट केवल एक खास वर्ग को मिलते हैं, जबकि 'ए' यानी अल्पसंख्यकों को सिर्फ रैली में भीड़ जुटाने और कुर्सियां सजाने के काम में लगाया जाता है। रामपुर की जनता को मुखातिब करते हुए उन्होंने याद दिलाया कि जब रामपुर के कद्दावर नेताओं और स्थानीय युवाओं पर कानूनी संकट आया, तो लखनऊ में बैठकर राजनीति करने वाले तथाकथित रहनुमा खामोश तमाशा देखते रहे। ओवैसी के इस आक्रामक रुख ने सपा के कोर मुस्लिम वोट बैंक में हलचल पैदा कर दी है।
कांग्रेस पर भी तीखा हमला: 'अल्पसंख्यकों को पीछे धकेलने की जिम्मेदार'
सपा के साथ-साथ ओवैसी ने कांग्रेस पार्टी को भी नहीं बख्शा। उन्होंने कहा कि दशकों तक देश पर राज करने वाली कांग्रेस ने मुसलमानों को केवल भावनात्मक नारों में उलझाए रखा और सामाजिक-आर्थिक रूप से सबसे पिछड़े पायदान पर धकेल दिया। उन्होंने सच्चर कमेटी की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि कांग्रेस के शासनकाल में अल्पसंख्यकों की शिक्षा, नौकरी और जीवन स्तर में लगातार गिरावट आई। ओवैसी ने कहा कि आज जो लोग खुद को संविधान का सबसे बड़ा रक्षक बताते हैं, उन्होंने बाबरी मस्जिद के ताले खुलवाने से लेकर टाडा और यूएपीए जैसे कड़े कानूनों के जरिए अल्पसंख्यकों पर शिकंजा कसने का काम किया। इसलिए अब मुस्लिम समाज को गांधी या नेहरू के नाम पर चलने वाली राजनीति से मोहभंग कर अपने वास्तविक राजनीतिक अस्तित्व को पहचानना होगा।
2027 चुनाव से पहले यूपी में विपक्षी वोटों के बिखराव का खतरा
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ओवैसी का यह बयान उत्तर प्रदेश के आगामी उपचुनावों और 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए विपक्षी गठबंधन 'इंडिया' (INDIA) के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर सकता है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश, रुहेलखंड और तराई के इलाकों में जहां मुस्लिम आबादी 25 से 50 फीसदी के बीच है, वहां ओवैसी की यह अपील सीधे तौर पर सपा और कांग्रेस के वोट शेयर में सेंध लगा सकती है। यदि मुस्लिम मतों में विभाजन होता है, तो इसका सीधा राजनीतिक लाभ भारतीय जनता पार्टी को मिल सकता है। यही कारण है कि सपा और कांग्रेस दोनों ही दल ओवैसी के इस बयान पर हमलावर हो गए हैं और उन पर 'वोटकटवा' की भूमिका निभाने का आरोप लगा रहे हैं। बहरहाल, रामपुर से दिए गए ओवैसी के इस दोहरे प्रहार ने उत्तर प्रदेश के सियासी गलियारों में अल्पसंख्यक नेतृत्व और राजनीतिक हिस्सेदारी की बहस को एक बार फिर केंद्र में ला खड़ा किया है।