एकादशी के दिन जरूर करें ये 4 काम, इनके बिना अधूरा माना जाता है व्रत का फल
सनातन धर्म में एकादशी व्रत को समस्त व्रतों का राजा माना गया है। पद्म पुराण और स्कंद पुराण के अनुसार, एकादशी का व्रत रखने से व्यक्ति के जन्म-जन्मांतर के पाप कट जाते हैं और उसे मोक्ष तथा बैकुंठ लोक की प्राप्ति होती है। यह पावन तिथि जगत के पालनहार भगवान श्रीहरि विष्णु और धन-वैभव की देवी माता महालक्ष्मी को पूर्ण रूप से समर्पित होती है। हालांकि, कई बार श्रद्धालु दिनभर अन्न का त्याग कर कठोर उपवास तो रखते हैं, लेकिन शास्त्रों में वर्णित उन मुख्य नियमों और अनिवार्य धार्मिक कृत्यों से अनजान रह जाते हैं जिनके बिना एकादशी व्रत को अपूर्ण और निष्फल माना गया है। शास्त्रों में स्पष्ट विधान है कि केवल भूखे रहने का नाम उपवास नहीं है, बल्कि एकादशी के पावन दिन 4 विशेष कर्मों को पूरा करने के बाद ही व्रत का वास्तविक और अनंत गुना पुण्य प्राप्त होता है।
1. तुलसी दल के साथ पंचामृत और पीतांबरधारी को भोग अर्पण
एकादशी तिथि पर भगवान नारायण की पूजा का सबसे पहला और अनिवार्य नियम तुलसी दल से जुड़ा है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान विष्णु संसार का कोई भी छप्पन भोग तब तक स्वीकार नहीं करते, जब तक उसमें तुलसी का पत्ता शामिल न हो। एकादशी की सुबह या शाम की पूजा में भगवान शालिग्राम या श्रीहरि विष्णु की प्रतिमा को पंचामृत से स्नान कराएं और केसरयुक्त पीली मिठाई, फल या मखाने की खीर का भोग लगाएं, जिसमें तुलसी दल अवश्य अर्पित करें। इस बात का विशेष ध्यान रखें कि एकादशी के पावन दिन तुलसी के पत्ते को तोड़ना शास्त्रों में महापाप माना गया है, क्योंकि इस दिन मां तुलसी भी भगवान विष्णु के निमित्त निर्जला व्रत रखती हैं। इसलिए पूजा के लिए तुलसी के पत्ते हमेशा एकादशी से एक दिन पहले यानी दशमी तिथि को ही तोड़कर रख लें अथवा पौधे के नीचे स्वतः गिरे हुए पत्तों को गंगाजल से धोकर प्रयोग में लाएं।
2. एकादशी व्रत कथा का श्रवण, पठन और शंखनाद से महाआरती
एकादशी के दिन संबंधित एकादशी की पौराणिक व्रत कथा को पढ़ना या सुनना अनिवार्य माना गया है। शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि यदि कोई जातक व्रत रखता है लेकिन एकादशी महात्म्य और कथा का श्रवण नहीं करता, तो उसका व्रत अधूरा ही रह जाता है। कथा का पाठ करने से मन में आध्यात्मिक चेतना जागृत होती है और व्रत का वास्तविक प्रयोजन समझ आता है। कथा समाप्ति के उपरांत शुद्ध कपूर और गाय के घी का दीपक जलाकर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की आरती करें। आरती के तुरंत बाद घर में दक्षिणावर्ती शंख से जल छिड़कें और शंखनाद करें। शंख की ध्वनि से घर की नकारात्मक ऊर्जा और दरिद्रता का नाश होता है तथा चारों दिशाओं में दिव्य सकारात्मक स्पंदनों का संचार होता है।
3. रात्रि जागरण, विष्णु सहस्रनाम पाठ और 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' जप
एकादशी की रात को सामान्य दिनों की तरह सोकर व्यतीत करना शास्त्रों के अनुसार वर्जित माना गया है। इस पावन तिथि की रात्रि को 'जागरण काल' कहा जाता है। मान्यता है कि एकादशी की रात भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी पृथ्वी पर विचरण करते हैं। यदि पूरी रात संभव न हो, तो कम से कम मध्य रात्रि तक जागकर भगवान का भजन-कीर्तन करें, विष्णु सहस्रनाम, कनकधारा स्तोत्र या भगवद्गीता के 11वें अध्याय का पाठ करें। इसके साथ ही तुलसी की माला से महामंत्र "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" का कम से कम 11 माला जप अवश्य करें। एकादशी की रात किया गया मंत्र जप सामान्य दिनों की तुलना में हजार गुना अधिक फलदायी होता है और जातक की बड़ी से बड़ी मनोकामना को सिद्ध करने में सक्षम होता है।
4. द्वादशी को शुभ मुहूर्त में पारण, ब्राह्मण या निर्धन को अन्न दान
एकादशी व्रत की संपूर्णता उसके विधि-विधान से किए गए पारण पर निर्भर करती है। एकादशी व्रत केवल उपवास के दिन तक सीमित नहीं होता, बल्कि अगले दिन यानी द्वादशी तिथि को शुभ मुहूर्त में ही इसका समापन होता है। यदि कोई जातक द्वादशी तिथि समाप्त होने के बाद पारण करता है या हरि वासर के दौरान व्रत खोल लेता है, तो व्रत का संपूर्ण पुण्य नष्ट हो जाता है। द्वादशी के दिन सुबह सूर्योदय के बाद स्नान-ध्यान करें, भगवान विष्णु की आराधना करें और अपने सामर्थ्य के अनुसार किसी ब्राह्मण, साधु या जरूरतमंद निर्धन व्यक्ति को कच्चा सीधा (आटा, दाल, चावल, घी, नमक), पीले वस्त्र या दक्षिणा का दान करें। इस दान के बाद ही स्वयं जल, तुलसी दल या सात्विक भोजन ग्रहण करके व्रत खोलें। शास्त्रों के अनुसार दान दिए बिना एकादशी व्रत का फल कभी सिद्ध नहीं होता।