29 या 30 सितंबर? कब रखा जाएगा विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी व्रत, जानें सही तारीख, चंद्रोदय का समय और शुभ मुहूर्त
सनातन धर्म में प्रथम पूज्य भगवान श्रीगणेश की आराधना विघ्नों को हरने और जीवन में सुख-समृद्धि लाने वाली मानी गई है। प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को 'संकष्टी चतुर्थी' के रूप में श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है। आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली संकष्टी चतुर्थी को 'विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी' कहा जाता है। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, विघ्नराज स्वरूप में बप्पा की पूजा करने से साधक के जीवन के समस्त बड़े संकट, वित्तीय अड़चनें, रोग और पारिवारिक कलह जड़ से समाप्त हो जाते हैं। संकष्टी चतुर्थी के व्रत का नियम एकादशी या अन्य सामान्य व्रतों से थोड़ा भिन्न होता है, क्योंकि इसमें केवल दिन का उपवास ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि रात में चंद्रमा के दर्शन और अर्घ्य देने के बाद ही व्रत को पूर्ण माना जाता है।
पंचांग में तिथियों के प्रारंभ और समापन समय को लेकर कई बार श्रद्धालुओं के मन में संशय उत्पन्न हो जाता है कि व्रत 29 सितंबर को रखा जाए या 30 सितंबर को। धर्मशास्त्रों के अनुसार संकष्टी चतुर्थी का व्रत सदैव उसी दिन रखा जाता है, जिस रात में चतुर्थी तिथि के दौरान चंद्रमा के दर्शन सुलभ हों। ऐसे में पंचांगीय गणना के आधार पर सही तारीख और पूजन मुहूर्त का ज्ञान होना हर व्रतधारी के लिए बेहद जरूरी है।
29 या 30 सितंबर: किस दिन रखा जाएगा विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी का व्रत?
वैदिक पंचांग की सूक्ष्म गणना के अनुसार, आश्विन कृष्ण चतुर्थी तिथि का आरंभ 29 सितंबर को दोपहर के समय होगा और यह तिथि अगले दिन यानी 30 सितंबर की दोपहर तक ही व्याप्त रहेगी।
हिंदू धर्मग्रंथों और निर्णय सिंधु के स्पष्ट निर्देश के अनुसार, संकष्टी चतुर्थी के व्रत में 'उदयातिथि' के बजाय 'चंद्रोदय व्यापिनी चतुर्थी' (जिस शाम या रात को चतुर्थी तिथि में चंद्रमा उदित हो) को ही शास्त्रसम्मत माना जाता है। चूंकि 30 सितंबर की रात को चतुर्थी तिथि समाप्त होकर पंचमी तिथि लग चुकी होगी, इसलिए 30 सितंबर को चंद्रमा के दर्शन चतुर्थी में नहीं हो सकेंगे। अतः विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी का पावन व्रत 29 सितंबर को ही रखा जाएगा। जो श्रद्धालु पूरे विधि-विधान से उपवास रखना चाहते हैं, वे 29 सितंबर की सुबह से संकल्प लेकर रात्रि चंद्र दर्शन के उपरांत ही व्रत का पारण करेंगे।
विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी पूजन के श्रेष्ठ मुहूर्त
संकष्टी चतुर्थी के दिन भगवान गणेश के पूजन के लिए दिन और शाम दोनों समय शुभ योग बन रहे हैं। श्रद्धालु अपनी सुविधानुसार निम्नलिखित मुहूर्तों में प्रथम पूज्य बप्पा की षोडशोपचार या पंचोपचार पूजा कर सकते हैं:
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प्रातःकालीन पूजा मुहूर्त: सुबह 06:15 बजे से सुबह 09:12 बजे तक (अमृत और शुभ चौघड़िया)।
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अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 11:47 बजे से दोपहर 12:35 बजे तक (सर्वकार्य सिद्धि के लिए उत्तम)।
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संध्याकालीन (प्रदोष काल) पूजन मुहूर्त: शाम 06:08 बजे से शाम 07:35 बजे तक (यह समय संकष्टी व्रत कथा श्रवण और विशेष दीपदान के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है)।
29 सितंबर को चंद्रोदय (चांद निकलने) का समय
संकष्टी चतुर्थी व्रत की पूर्णता चंद्र दर्शन और अर्घ्य के बिना अधूरी मानी जाती है। मान्यता है कि संकष्टी के दिन चंद्रमा को अर्घ्य देने से कुंडली में चंद्र दोष और मानसिक तनाव समाप्त होता है।
29 सितंबर की रात को चंद्रोदय का संभावित समय रात्रि 08:25 बजे से 08:45 बजे के मध्य रहेगा। भारत के अलग-अलग शहरों के भौगोलिक अक्षांश और देशांतर के आधार पर चंद्रमा के निकलने के समय में 5 से 15 मिनट का आंशिक अंतर देखने को मिल सकता है। उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में रात 08:30 बजे के आसपास चंद्रमा के दर्शन आसानी से किए जा सकेंगे।
विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी की शास्त्रीय पूजा विधि
व्रत के दिन सुबह सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नानादि से निवृत्त हों और लाल या पीले रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करें। हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर "ॐ गं गणपतये नमः" या विघ्नराज स्वरूप का ध्यान करते हुए पूरे दिन निर्जला या फलाहारी व्रत का संकल्प लें।
घर के पूजा स्थल पर एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएं और उस पर भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। बप्पा का गंगाजल और पंचामृत से अभिषेक करें। इसके पश्चात उन्हें रोली, चंदन और सिंदूर का तिलक लगाएं, क्योंकि सिंदूर गणेश जी को अत्यंत प्रिय है। गणपति बप्पा को 21 दूर्वा दल (दूब घास) गांठ बनाकर अर्पित करें और उनके प्रिय मोदक, बेसन के लड्डू या ऋतु फल का भोग लगाएं। इसके बाद शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित कर संकष्टी चतुर्थी की व्रत कथा का पाठ करें अथवा सुनें और अंत में गणपति जी की आरती उतारें।
रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य देने के विशेष नियम
रात में जब गगनमंडल पर चंद्रमा के दर्शन हों, तब पूजा की थाली में एक तांबे या चांदी के लोटे में शुद्ध जल, थोड़ा कच्चा दूध, अक्षत, रोली और सफेद पुष्प डालें। चंद्रमा के सामने खड़े होकर दोनों हाथों को सिर से ऊपर उठाकर धीरे-धीरे जल की धार छोड़ते हुए तीन बार अर्घ्य समर्पित करें।
अर्घ्य देते समय "ॐ सों सोमाय नमः" या चंद्र देव के मंत्रों का जप करें और मन ही मन अपनी मनोकामना कहें। अर्घ्य अर्पित करने के बाद चंद्रमा की दिशा में खड़े होकर तीन बार परिक्रमा करें और हाथ जोड़कर प्रणाम करें। इसके बाद पूजा स्थल पर जाकर भगवान गणेश का आशीर्वाद लें और प्रसाद ग्रहण करके व्रत का पारण करें। इस प्रकार श्रद्धा से किया गया व्रत जीवन के सभी संकटों को दूर कर घर में रिद्धि-सिद्धि और अखंड सौभाग्य की स्थापना करता है।