नवरात्रि में हवन के तुरंत बाद क्या करें? पूर्णाहुति से लेकर प्रसाद वितरण तक न भूलें ये 5 सबसे जरूरी शास्त्रीय नियम

नवरात्रि में हवन के तुरंत बाद क्या करें? पूर्णाहुति से लेकर प्रसाद वितरण तक न भूलें ये 5 सबसे जरूरी शास्त्रीय नियम

शारदीय अथवा चैत्र नवरात्रि की अष्टमी और नवमी तिथि पर घर में हवन करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। शास्त्रों के अनुसार, नौ दिनों के उपवास, जप और पाठ की आध्यात्मिक ऊर्जा को अग्नि देव के माध्यम से मां जगदंबा तक पहुंचाने का सबसे श्रेष्ठ साधन हवन ही है। हालांकि, कई बार लोग हवन सामग्री की अंतिम आहुति देने के तुरंत बाद उठ जाते हैं या पूजा समाप्त मान लेते हैं। सनातन परंपरा में हवन केवल आहुतियां डालने तक सीमित नहीं है, बल्कि उसके तुरंत बाद किए जाने वाले पांच शास्त्रीय चरण ही इस अनुष्ठान को सिद्ध और फलदायी बनाते हैं। यदि इन नियमों का सही ढंग से पालन न किया जाए, तो अनुष्ठान अधूरा माना जाता है। आइए जानते हैं हवन कुंड के समक्ष किए जाने वाले वे पांच जरूरी नियम जो आपके घर में सुख, शांति और समृद्धि का वास सुनिश्चित करते हैं।

नियम 1: शास्त्रसम्मत पूर्णाहुति का विधान और नारियल अर्पण

हवन के मुख्य मंत्रों की आहुतियां समाप्त होते ही सबसे पहला और अनिवार्य कदम 'पूर्णाहुति' देना होता है। बिना पूर्णाहुति के कोई भी वैदिक या पौराणिक यज्ञ पूर्ण नहीं माना जाता। इसके लिए एक सूखे नारियल के गोले के ऊपरी हिस्से को काटकर उसमें थोड़ा शुद्ध गाय का घी, लौंग का जोड़ा, बताशा, इलायची, मखाना और बची हुई पवित्र हवन सामग्री भरें। इस गोले पर कलावा (मौली) या लाल कपड़ा अच्छी तरह लपेट लें। इसके बाद परिवार के सभी सदस्य अपने स्थान पर खड़े होकर दोनों हाथों से इस नारियल को स्पर्श करें और "ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥ ॐ स्वाहा।" मंत्र का सस्वर उच्चारण करते हुए इसे शांत भाव से प्रज्वलित अग्नि कुंड के मध्य में अर्पित करें। यह आहुति इस बात का प्रतीक है कि आपने अपना संपूर्ण अहंकार और साधना मां के चरणों में समर्पित कर दी है।

नियम 2: कपूर से मां भगवती की सपरिवार महाआरती

पूर्णाहुति समर्पित करने के ठीक बाद सभी परिजनों को खड़े होकर मां दुर्गा की विधिवत आरती करनी चाहिए। एक सुंदर पीतल या तांबे की थाली में कपूर और गाय के घी का दीपक प्रज्वलित करें। इसमें रोली, अक्षत और ताजे पुष्प भी रखें। सबसे पहले अग्नि देव की आरती उतारें और फिर मां दुर्गा, भगवान गणेश और अपने कुलदेवता की स्तुति करते हुए मधुर स्वर में आरती गाएं। आरती की थाली को हमेशा घड़ी की दिशा (क्लॉकवाइज) में सात बार घुमाना शुभ माना जाता है। आरती संपन्न होने के बाद दोनों हाथों से उस पावन ज्योति का स्पर्श अपने मस्तक और दोनों नेत्रों पर करें। ऐसा करने से वातावरण में मौजूद दिव्य तरंगें शरीर और मन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती हैं।

नियम 3: त्रुटियों के निवारण के लिए क्षमा याचना और प्रदक्षिणा

इंसान गलतियों का पुतला है, और नौ दिनों की पूजा या हवन के दौरान उच्चारण, सामग्री या विधि-विधान में कोई न कोई अनजानी भूल होना स्वाभाविक है। इसलिए आरती के तुरंत बाद हाथ जोड़कर देवी मां से क्षमा याचना अवश्य करनी चाहिए। इसके लिए दुर्गा सप्तशती का प्रसिद्ध क्षमा प्रार्थना श्लोक "अपराधसहस्त्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया। दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वरि॥" बोलें। यदि संस्कृत श्लोक याद न हो, तो सरल मातृभाषा में कहें कि "हे करुणामयी मां, पूजा या आहुति में जाने-अनजाने जो भी त्रुटि हुई हो, उसे क्षमा कर इस यज्ञ को स्वीकार करें।" इसके बाद अपने ही स्थान पर खड़े होकर तीन बार दाहिनी ओर घूमते हुए प्रदक्षिणा (परिक्रमा) करें, जिससे चारों दिशाओं के दोष शांत हो जाते हैं।

नियम 4: हवन कुंड की पवित्र भस्म से रक्षा तिलक

हवन कुंड की अग्नि जब स्वतः शांत और ठंडी हो जाए, तो उसकी भस्म (राख) को कभी भी यूं ही न छोड़ें। यह भस्म कोई साधारण राख नहीं, बल्कि देवताओं को समर्पित हविष्य और वैदिक मंत्रों की अभिमंत्रित ऊर्जा होती है। परिवार के मुखिया या बड़े-बुजुर्ग को इस पवित्र भस्म को अनामिका उंगली से लेकर परिवार के सभी सदस्यों के मस्तक, कंठ और नाभि पर रक्षा तिलक के रूप में लगाना चाहिए। धार्मिक मान्यता है कि यह भस्म एक अभेद्य सुरक्षा कवच का काम करती है, जो व्यक्ति को नजर दोष, नकारात्मक शक्तियों, भय और मानसिक तनाव से बचाती है। बची हुई भस्म को संभालकर रखें और घर के कोनों में छिड़कें।

नियम 5: कन्या पूजन, दक्षिणा और सात्विक प्रसाद का वितरण

हवन की पूर्णता का अंतिम और सबसे मंगलकारी चरण प्रसाद वितरण और कन्या पूजन है। यदि आपने हवन से पहले कन्याओं को भोजन नहीं कराया है, तो हवन समाप्त होते ही तुरंत नौ कन्याओं और एक बटुक (बालक) को आदरपूर्वक बुलाकर उनके चरण धोएं। उन्हें मां के प्रिय भोग हलवा, पूरी और काले चने का भोजन कराएं तथा सामर्थ्य अनुसार फल, चुनरी और दक्षिणा देकर उनके चरण स्पर्श करें। इसके बाद ही घर के सभी सदस्यों, पड़ोसियों और आगंतुकों में हवन का बचा हुआ प्रसाद, चरणामृत और फल वितरित करें। अंत में परिवार के सभी लोग मिलकर सात्विक भोजन ग्रहण करें और मां का आभार व्यक्त करते हुए अपने व्रत का पारण करें।