13 या 14 सितंबर कब है गणेश चतुर्थी? जानें मूर्ति स्थापना का शुभ मुहूर्त और विधि

13 या 14 सितंबर कब है गणेश चतुर्थी? जानें मूर्ति स्थापना का शुभ मुहूर्त और विधि

भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाने वाला गणेश चतुर्थी का महापर्व देश भर में अत्यंत श्रद्धा, उमंग और वैदिक परंपरा के अनुसार मनाया जा रहा है। शास्त्रों के अनुसार भगवान श्री गणेश का प्राकट्य भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के मध्याह्न काल में हुआ था, इसलिए इसी पावन बेला में गणपति बप्पा की प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा और पूजन का सर्वोच्च विधान है। इस वर्ष गणेश उत्सव पर अद्भुत संयोग निर्मित हो रहा है क्योंकि चतुर्थी तिथि सोमवार के दिन पड़ रही है। सोमवार भगवान देवाधिदेव महादेव का प्रिय वार है और इसी दिन उनके पुत्र प्रथम पूज्य श्री गणेश की आराधना होना ज्योतिषीय दृष्टि से सर्वार्थ सिद्धि और अमृत योग का महासंयोग बना रहा है। महाराष्ट्र के मुंबई, पुणे से लेकर उत्तर भारत के दिल्ली-एनसीआर, लखनऊ, वाराणसी, जयपुर और पटना के प्रमुख बाजारों में गणपति बप्पा के स्वागत की भव्य तैयारियां चरम पर हैं।

13 या 14 सितंबर कब है गणेश चतुर्थी: पंचांग और तिथि का निर्णय

पंचांग गणना को लेकर श्रद्धालुओं के मन में 13 और 14 सितंबर की तारीखों को लेकर असमंजस रहता है। वैदिक ज्योतिष के स्पष्ट नियमानुसार भगवान गणेश का जन्मोत्सव उसी दिन मान्य होता है जिस दिन मध्याह्न काल यानी दोपहर के समय चतुर्थी तिथि विद्यमान हो। 13 सितंबर को तृतीया तिथि रहेगी, जबकि चतुर्थी तिथि का शुभारंभ 14 सितंबर को प्रातः काल से हो रहा है। मध्याह्न व्यापिनी चतुर्थी तिथि का संपूर्ण विस्तार 14 सितंबर को ही प्राप्त हो रहा है, जिसके कारण 14 सितंबर को ही पूरे विधि-विधान के साथ गणेश चतुर्थी का व्रत और प्रतिमा स्थापना का महापर्व संपन्न किया जाएगा।

  • चतुर्थी तिथि प्रारंभ: 14 सितंबर को प्रातः 07:06 बजे

  • चतुर्थी तिथि समाप्त: 15 सितंबर को प्रातः 07:44 बजे

  • व्रत एवं जन्मोत्सव पर्व: 14 सितंबर (सोमवार)

गणेश प्रतिमा स्थापना और मध्याह्न पूजन का सर्वश्रेष्ठ शुभ मुहूर्त

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गणपति जी की मूर्ति स्थापना और मुख्य षोडशोपचार पूजन सदैव स्थिर लग्न और शुभ चौघड़िया युक्त मध्याह्न काल में ही किया जाना फलदायी होता है। मध्याह्न काल दोपहर का वह समय है जब ब्रह्मांड में गणेश तत्व की ऊर्जा अपने उच्चतम शिखर पर होती है।

  • मध्याह्न गणेश पूजन व स्थापना मुहूर्त: 14 सितंबर को सुबह 11:00 बजे से दोपहर 01:30 बजे तक

  • मुहूर्त की कुल अवधि: 2 घंटे 30 मिनट

  • शुभ ज्योतिषीय योग: सर्वार्थ सिद्धि योग एवं अमृत योग का दुर्लभ संयोग

इस ढाई घंटे की शुभ अवधि में घर, कार्यस्थल अथवा सार्वजनिक पंडालों में मिट्टी के गणपति की प्राण-प्रतिष्ठा करना सुख, समृद्धि और समस्त विघ्नों के निवारण की दृष्टि से सर्वोत्तम रहेगा।

किस दिशा में और कैसे करें गणेश प्रतिमा की स्थापना

गणेश जी की प्रतिमा स्थापित करने के लिए वास्तु शास्त्र और धर्म शास्त्रों में सटीक नियम निर्धारित किए गए हैं। घर अथवा पूजा स्थल के ईशान कोण यानी उत्तर-पूर्व दिशा अथवा पूर्व दिशा को सबसे पवित्र माना गया है। ईशान कोण को देव दिशा कहा जाता है, जहां सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह सबसे सघन होता है।

सर्वप्रथम पूजा स्थल को गंगाजल छिड़ककर पूर्णतः शुद्ध और पवित्र करें। एक सुंदर लकड़ी की चौकी रखें और उस पर नया लाल या पीला रेशमी वस्त्र बिछाएं। चौकी पर अक्षत से अष्टदल कमल बनाएं। शास्त्रों के अनुसार घर में हमेशा प्राकृतिक चिकनी मिट्टी से निर्मित, बैठी हुई मुद्रा वाली और बाईं ओर मुड़ी हुई सूंड (वाममुखी) प्रतिमा ही लानी चाहिए। प्रतिमा को चौकी पर स्थापित करते समय उसका मुख पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर रखें। चौकी के समीप तांबे या पीतल के कलश में शुद्ध जल, गंगाजल, सुपारी, सिक्का और आम के पल्लव डालकर उस पर लाल वस्त्र में लिपटा हुआ जटाधारी नारियल स्थापित करें।

संपूर्ण षोडशोपचार पूजा विधि और आवश्यक पूजन सामग्री

प्रतिमा स्थापना के पश्चात हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर व्रत एवं गणेश आराधना का संकल्प लें। इसके पश्चात "ॐ गं गणपतये नमः" अथवा "ॐ वक्रतुंडाय हुम्" मंत्र का उच्चारण करते हुए भगवान गणेश का पंचामृत (गाय का दूध, दही, घी, शहद और शर्करा) तथा शुद्ध गंगाजल से प्रतीकात्मक अभिषेक करें।

गणपति बप्पा को लाल चंदन, कुमकुम, हल्दी, रोली और अक्षत का तिलक लगाएं। उन्हें नवीन जनेऊ और पीले या लाल वस्त्र अर्पित करें। भगवान गणेश को सबसे प्रिय 21 गांठ हरी दूर्वा (दूब घास) और लाल गुड़हल का पुष्प अवश्य चढ़ाएं। इसके बाद धूप और गाय के शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें। नैवेद्य के रूप में मोदक अथवा 21 बेसन और मोतीचूर के लड्डू, ऋतु फल और पान-सुपारी अर्पित करें। अंत में परिवार सहित खड़े होकर कपूर जलाकर श्रद्धापूर्वक आरती गाएं और ज्ञात-अज्ञात भूलों के लिए क्षमा प्रार्थना करें।

चंद्र दर्शन निषेध: मिथ्या कलंक से बचने के लिए जरूरी नियम

गणेश चतुर्थी के पावन दिन रात्रि के समय चंद्र दर्शन को पूर्णतः वर्जित माना गया है। पौराणिक धर्मग्रंथों में वर्णित कथा के अनुसार, इसी पावन तिथि पर चंद्र देव ने भगवान गणेश के स्वरूप को देखकर उनका उपहास किया था, जिस पर रुष्ट होकर गणपति ने चंद्रमा को श्राप दिया था। इसी कारण भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी की रात्रि में चंद्रमा के दर्शन करने से व्यक्ति पर झूठा आरोप अथवा मिथ्या कलंक लगने का भय रहता है। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण पर भी इसी तिथि को अनजाने में चंद्र दर्शन हो जाने के कारण स्यमंतक मणि की चोरी का मिथ्या कलंक लगा था। अतः श्रद्धालुओं को विशेष सावधानी बरतते हुए इस रात सीधे चंद्रमा की ओर देखने से बचना चाहिए। यदि भूलवश नजर पड़ जाए, तो स्यमंतक मणि की कथा का श्रवण अथवा पाठ करना चाहिए।

कब होगा गणेश विसर्जन: अनंत चतुर्दशी की सही तारीख

गणेश चतुर्थी के साथ ही समूचे देश में दस दिवसीय गणेशोत्सव की अनुपम छटा बिखर जाती है। श्रद्धालु अपनी श्रद्धा, संकल्प और कुल परंपरा के अनुसार डेढ़ दिन, तीन दिन, पांच दिन, सात दिन अथवा पूरे दस दिनों तक बप्पा को अपने घर में विराजमान रखते हैं और उनकी नित्य सेवा करते हैं। इस महापर्व का पूर्णाहुति समापन अनंत चतुर्दशी के पावन अवसर पर होगा।

  • अनंत चतुर्दशी (मूर्ति विसर्जन): 25 सितंबर (शुक्रवार)

25 सितंबर को अनंत चतुर्दशी के दिन भक्तजन ढोल-नगाड़ों, गुलाल और "गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ" के गगनभेदी जयकारों के साथ भगवान श्री गणेश की प्रतिमा का किसी पवित्र नदी, सरोवर या पर्यावरण अनुकूल कृत्रिम जलकुंड में विसर्जन करेंगे।

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