हरतालिका तीज कब है? जानें सही तारीख, प्रदोष काल का सबसे शुभ मुहूर्त और संपूर्ण पूजा विधि
भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाने वाला अखंड सौभाग्य का महापर्व हरतालिका तीज सुहागिन महिलाओं के साथ-साथ कुंवारी कन्याओं के लिए भी विशेष आध्यात्मिक महत्व रखता है। यह व्रत कठिन तप और गहरी आस्था का प्रतीक है, जिसमें महिलाएं चौबीस घंटे तक निर्जला रहकर भगवान शिव, माता पार्वती और प्रथम पूज्य भगवान श्री गणेश की आराधना करती हैं। पौराणिक मान्यता के अनुसार, इसी कठोर तपस्या के बल पर माता पार्वती ने देवाधिदेव महादेव को अपने पति रूप में प्राप्त किया था। उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश और झारखंड सहित पूरे उत्तर भारत के शहरों जैसे लखनऊ, वाराणसी, पटना, जयपुर और दिल्ली-एनसीआर के प्रमुख बाजारों में तीज को लेकर विशेष उमंग और श्रद्धा का माहौल देखा जा रहा है। महिलाएं इस दिन सोलह श्रृंगार कर अपने पति की लंबी उम्र, सुखी दांपत्य जीवन और परिवार की खुशहाली की मंगल कामना करती हैं।
हरतालिका तीज 2026 कब है: तिथि और शुभ संयोग
हिंदू पंचांग की गणना के अनुसार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि का आरंभ और समापन शास्त्रों में अत्यधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। शास्त्रों का स्पष्ट मत है कि जिस दिन सूर्योदय काल में तृतीया तिथि विद्यमान हो और शाम के समय प्रदोष काल का संयोग बन रहा हो, उसी दिन हरतालिका तीज का पावन पर्व विधि-विधान से मनाया जाना श्रेष्ठ फलदायी होता है। हस्त नक्षत्र और रवियोग जैसे अत्यंत मंगलकारी योगों के संयोग से इस व्रत का पुण्यफल कई गुना बढ़ जाता है। सुहागिनों के लिए यह केवल एक व्रत नहीं, बल्कि समर्पण, त्याग और वैवाहिक मर्यादा का सजीव अनुष्ठान है। कुंवारी युवतियां भी मनचाहा और सदाचारी जीवनसाथी पाने के लिए पूरी श्रद्धा के साथ इस व्रत के कठिन नियमों का पालन करती हैं।
हरतालिका तीज पूजा का सटीक शुभ मुहूर्त और प्रदोष काल
हरतालिका तीज पर भगवान शिव और मां पार्वती की पूजा प्रदोष काल में करना सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। सूर्यास्त के बाद के लगभग ढाई घंटे का समय प्रदोष काल कहलाता है, जिसमें की गई उपासना तत्काल फल प्रदान करती है। हालांकि, सुबह के समय भी स्थिर लग्न में पूजा-अर्चना का विधान है।
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प्रातः काल पूजा मुहूर्त: सुबह 06:05 बजे से सुबह 08:35 बजे तक (अमृत और शुभ चौघड़िया में पूजन फलदायी)
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प्रदोष काल पूजा का श्रेष्ठ मुहूर्त: सायं 06:20 बजे से रात्रि 08:45 बजे तक
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तृतीया तिथि प्रारंभ: भाद्रपद शुक्ल तृतीया तिथि का आरंभ दोपहर से
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तृतीया तिथि समाप्त: अगले दिन प्रातः काल
स्थानीय सूर्योदय और सूर्यास्त के समय के अनुसार विभिन्न शहरों में समय में 10 से 15 मिनट का अंतर हो सकता है, इसलिए संध्या काल में सूर्यास्त के तुरंत बाद पूजा की चौकी सजाकर संकल्प लेना उत्तम रहता है।
हरतालिका तीज पूजन सामग्री की पूरी सूची
पूजा शुरू करने से पहले समस्त आवश्यक सामग्री को एकत्रित कर लेना चाहिए ताकि अनुष्ठान के समय कोई बाधा न आए:
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शुद्ध काली मिट्टी या गंगा किनारे की बालू रेत (भगवान शिव, माता पार्वती और श्री गणेश की प्रतिमा बनाने के लिए)
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पीले, लाल और हरे रंग का रेशमी वस्त्र, लकड़ी की चौकी, केले के पत्ते
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बेलपत्र, धतूरा, आंकड़े का फूल, शमी पत्र, दूर्वा, सफेद चंदन, जनेऊ, भस्म
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माता पार्वती के लिए संपूर्ण सोलह श्रृंगार सामग्री (सिंदूर, बिंदी, महावर, चूड़ियां, मेंहदी, चुनरी, काजल, दर्पण, बिछिया)
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पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल), गाय का कच्चा दूध, मौसमी फल, मिष्ठान, खीर
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पूजा की सुपारी, लौंग, इलायची, धूप, दीप, अगरबत्ती, कपूर, रोली, अक्षत, कलश और नारियल
घर पर कैसे करें बालू या मिट्टी के शिवलिंग का निर्माण और स्थापना
हरतालिका तीज के दिन बाजार से लाई गई धातु की मूर्ति के स्थान पर अपने हाथों से बालू या शुद्ध मिट्टी से प्रतिमाएं बनाने की सदियों पुरानी परंपरा है। सुबह स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ रेशमी या सूती लाल वस्त्र धारण करें। इसके बाद नदी की बालू या शुद्ध पवित्र मिट्टी को गंगाजल से छान लें। उस मिट्टी से भगवान शिव का शिवलिंग, माता पार्वती और भगवान गणेश की सुंदर प्रतिमा तैयार करें। घर के उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) भाग को अच्छी तरह साफ करके वहां केले के खंभों और पत्तों से एक भव्य मंडप बनाएं। लकड़ी की चौकी रखकर उस पर लाल या पीला नया वस्त्र बिछाएं। इसके ऊपर अष्टदल कमल बनाकर भगवान गणेश, शिवजी और माता पार्वती की बनाई गई प्रतिमाओं को विधिपूर्वक स्थापित करें। पास ही एक कलश में जल भरकर उसके मुख पर आम के पत्ते और जटाधारी नारियल रखें।
हरतालिका तीज की सरल और प्रामाणिक पूजा विधि
प्रतिमा स्थापना के पश्चात हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर व्रत का संकल्प लें। सबसे पहले प्रथम पूज्य भगवान श्री गणेश का पूजन करें, उन्हें दूर्वा, रोली, चंदन और मोदक अर्पित करें। इसके बाद भगवान शिव का गंगाजल, पंचामृत और कच्चे दूध से अभिषेक करें। शिवलिंग पर चंदन का त्रिपुंड लगाएं, भस्म चढ़ाएं और क्रमशः बेलपत्र, शमी पत्र, धतूरा, आंकड़ा और जनेऊ अर्पित करें। इसके पश्चात माता गौरी का ध्यान करते हुए उन्हें रोली, सिंदूर, अक्षत और संपूर्ण सुहाग की पिटारी अर्पित करें। दीपक प्रज्वलित करें और धूप-दीप दिखाते हुए हरतालिका तीज की पावन व्रत कथा का श्रवण या वाचन करें। कथा के बिना इस व्रत की पूजा अधूरी मानी जाती है। पूजा के अंत में भगवान शिव और माता पार्वती की कपूर से भावपूर्ण आरती उतारें। रात के समय जागरण करने का विधान है, जिसमें महिलाएं समूह में बैठकर भजन-कीर्तन करती हैं।
हरतालिका तीज व्रत के जरूरी नियम और पारण का समय
हरतालिका तीज का व्रत अत्यंत कठिन होता है क्योंकि यह निर्जला और निराहार रखा जाता है। इस व्रत को लेकर शास्त्रों में कुछ विशेष नियम बताए गए हैं:
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निर्जला उपवास: तृतीया तिथि के सूर्योदय से लेकर अगले दिन चतुर्थी तिथि के सूर्योदय तक अन्न और जल का पूर्ण त्याग किया जाता है। अस्वस्थ महिलाओं या गर्भवती स्त्रियों को फलाहार के साथ व्रत रखने की विशेष छूट मान्य है।
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शयन निषेध: शास्त्रों के अनुसार इस पावन रात्रि में सोना वर्जित माना गया है। रात्रि में चार प्रहर की पूजा करना और जागरण करते हुए शिव पंचाक्षर मंत्र "ॐ नमः शिवाय" का जप करना परम कल्याणकारी होता है।
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क्रोध और वाणी संयम: व्रत के दौरान मन में किसी के प्रति ईर्ष्या, द्वेष या कटु वाणी का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
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पारण विधि: अगले दिन सुबह स्नान के बाद पुनः विधिवत पूजा-अर्चना करें। ब्राह्मण या सुहागिन महिला को सुहाग सामग्री, फल और मिष्ठान का दान दें। इसके पश्चात बनाए गए मिट्टी के विग्रहों का आदरपूर्वक किसी पवित्र जलस्रोत या गमले में विसर्जन करें। विसर्जन के बाद ककड़ी, जल या मीठे प्रसाद से व्रत का पारण करें।
हरतालिका तीज नारी शक्ति, निष्ठा और अखंड सुहाग का एक ऐसा पावन उत्सव है जो परिवार में शांति, सौहार्द और दांपत्य जीवन में अमर प्रेम का संचार करता है।