विजयादशमी 2026 पर कब करें अस्त्र-शस्त्र पूजन? नोट करें 46 मिनट का सबसे शुभ विजय मुहूर्त और संपूर्ण विधि

विजयादशमी 2026 पर कब करें अस्त्र-शस्त्र पूजन? नोट करें 46 मिनट का सबसे शुभ विजय मुहूर्त और संपूर्ण विधि

अधर्म पर धर्म और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक विजयादशमी (दशहरा) 20 अक्टूबर 2026 (मंगलवार) को मनाया जा रहा है। शास्त्रों के अनुसार, आश्विन शुक्ल दशमी तिथि पर अपराह्न काल में विजय मुहूर्त के दौरान शस्त्र, उपकरण और शमी वृक्ष की पूजा करने का विशेष विधान है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम ने रावण का संहार किया था और मां भगवती दुर्गा ने महिषासुर का वध कर धर्म की रक्षा की थी। महाभारत काल में पांडवों ने भी अज्ञातवास समाप्त होने पर शमी वृक्ष से अपने दिव्य अस्त्र-शस्त्र निकालकर उनकी पूजा-अर्चना की थी। वर्तमान में इस दिन सैनिक, पुलिसकर्मी, सुरक्षाबल अपने हथियारों की और आम नागरिक अपनी आजीविका चलाने वाले औजारों, मशीनों, कलम-दवात, इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स और वाहनों की पूजा कर उन्नति का आशीर्वाद मांगते हैं।

दशहरा 2026: शस्त्र पूजा एवं विजय मुहूर्त का सटीक समय

हिंदू पंचांग के अनुसार, दशमी तिथि 20 अक्टूबर को दोपहर 12:50 बजे से शुरू होकर 21 अक्टूबर को दोपहर 2:11 बजे तक प्रभावी रहेगी। चूंकि शस्त्र पूजन और अपराजिता पूजा हमेशा अपराह्न काल (दोपहर) में दशमी तिथि रहने पर की जाती है, इसलिए उत्तर और मध्य भारत में इसका मुख्य अनुष्ठान 20 अक्टूबर को ही संपन्न होगा।

  • दशमी तिथि प्रारंभ: 20 अक्टूबर 2026, दोपहर 12:50 बजे

  • दशमी तिथि समाप्त: 21 अक्टूबर 2026, दोपहर 02:11 बजे

  • अपराह्न पूजा काल: दोपहर 01:19 बजे से दोपहर 03:37 बजे तक

  • सबसे शुभ 'विजय मुहूर्त' (शस्त्र पूजन के लिए श्रेष्ठ): दोपहर 01:59 बजे से 02:45 बजे तक (कुल अवधि: 46 मिनट)

  • रावण दहन समय (प्रदोष काल): शाम 05:40 बजे के बाद (सूर्यास्त उपरांत)

(नोट: स्थानीय सूर्योदय व देशांतर के अनुसार विभिन्न शहरों में समय में कुछ मिनटों का अंतर संभव है।)

विजयादशमी शस्त्र पूजन की संपूर्ण विधि

शस्त्र पूजन को मर्यादा, सुरक्षा और सात्विक भाव से संपन्न करना चाहिए। घर या कार्यस्थल पर पूजन करते समय निम्नलिखित विधि अपनाएं:

  • शुद्धिकरण व तैयारी: सुबह स्नानादि के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल पर एक साफ चौकी बिछाकर उस पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं।

  • शस्त्रों की स्वच्छता: जिन अस्त्र-शस्त्रों, सुरक्षा उपकरणों, औजारों, कार्य से जुड़े यंत्रों या वाहनों की पूजा करनी है, उन्हें गंगाजल या शुद्ध जल से अच्छी तरह साफ कर पोंछ लें।

  • प्रतिष्ठापन: सभी अस्त्रों/उपकरणों को चौकी पर व्यवस्थित रूप से रखें। उनके पास भगवान गणेश, प्रभु श्रीराम और मां दुर्गा की प्रतिमा अथवा चित्र स्थापित करें।

  • तिलक व अर्चन: सभी शस्त्रों और उपकरणों पर रोली, चंदन और हल्दी से स्वास्तिक या तिलक लगाएं। इसके बाद उन पर अक्षत (अखंडित चावल) और ताजे पुष्प अर्पित करें।

  • रक्षासूत्र (मौली): प्रत्येक शस्त्र व उपकरण पर कलावा (मौली) बांधें।

  • धूप-दीप व नैवेद्य: गाय के शुद्ध घी का दीपक और सुगंधित धूप प्रज्वलित करें। मां दुर्गा और प्रभु श्रीराम के साथ शस्त्रों को फल, मिष्ठान या खीर का भोग अर्पित करें।

  • मंत्रोच्चार: पूजा के दौरान मां दुर्गा के नवार्ण मंत्र "ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे" अथवा "ॐ दुं दुर्गायै नमः" का कम से कम 21 या 108 बार जाप करें।

  • शमी व अपराजिता पूजन: शस्त्र पूजा के बाद शमी वृक्ष की पत्तियों और अपराजिता के पुष्पों की पूजा करें और शमी के पत्ते आदरपूर्वक एक-दूसरे को भेंट करें।

  • आरती व क्षमा याचना: अंत में मां जगदंबा और भगवान श्रीराम की आरती उतारें। हाथ जोड़कर प्रार्थना करें कि ये शस्त्र और उपकरण सदैव धर्म, न्याय, सुरक्षा और परिवार की प्रगति के साधन बनें।