2026 में कब-कब लगे सूर्य ग्रहण? जानें 2027 के पहले व सबसे बड़े 'सदी के ग्रहण' की तारीख, समय और भारत में दृश्यता की पूरी डिटेल
खगोलीय विज्ञान और वैदिक ज्योतिष के जानकारों के लिए साल 2026 ग्रहणों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण रहा है। वर्ष 2026 में कुल मिलाकर दो सूर्य ग्रहणों की घटना दर्ज की गई। पहला सूर्य ग्रहण 17 फरवरी 2026 को लगा था, जो कि एक 'वलयाकार सूर्य ग्रहण' (Annular Solar Eclipse) यानी रिंग ऑफ फायर के रूप में सामने आया। यह ग्रहण मुख्य रूप से अंटार्कटिका, दक्षिणी चिली, अर्जेंटीना और दक्षिणी अफ्रीका के सुदूर हिस्सों में ही देखा गया। इसके बाद साल का दूसरा और सबसे प्रमुख सूर्य ग्रहण 12 अगस्त 2026 को घटित हुआ, जो कि एक 'पूर्ण सूर्य ग्रहण' (Total Solar Eclipse) था। इस ऐतिहासिक पूर्ण सूर्य ग्रहण का विहंगम दृश्य ग्रीनलैंड, आइसलैंड, स्पेन और आर्कटिक महासागर के क्षेत्रों में पूरी भव्यता के साथ दिखाई दिया।
वैज्ञानिक और ज्योतिषीय दृष्टिकोण से राहत की बात यह रही कि साल 2026 में लगे ये दोनों सूर्य ग्रहण भारत की भौगोलिक सीमा में दृश्यमान नहीं थे। हिंदू पंचांग और धर्मशास्त्रों के स्थापित नियमों के मुताबिक, ग्रहण का सूतक काल, धार्मिक प्रतिबंध और मंदिरों के कपाट बंद करने जैसे नियम केवल उन्हीं क्षेत्रों में मान्य होते हैं जहां ग्रहण को नग्न आंखों या सीधे तौर पर देखा जा सके। भारत में दिखाई न देने के कारण देश के नागरिकों और सनातन धर्मावलंबियों पर 2026 के दोनों सूर्य ग्रहणों का कोई भी सूतक या धार्मिक प्रभाव लागू नहीं हुआ।
2027 का पहला सूर्य ग्रहण कब लगेगा? तारीख, प्रकार और क्षेत्र
वर्ष 2026 के ग्रहण चक्र की समाप्ति के बाद अब खगोलविदों और आम लोगों की नजरें नए साल 2027 के पहले सूर्य ग्रहण पर टिकी हैं।
नासा (NASA) और अंतरराष्ट्रीय खगोलीय वेधशालाओं के आधिकारिक कैलेंडर के अनुसार, वर्ष 2027 का पहला सूर्य ग्रहण 6 फरवरी 2027 को लगने जा रहा है। यह भी एक 'वलयाकार सूर्य ग्रहण' (Annular Solar Eclipse) होगा। इस दौरान चंद्रमा पृथ्वी से थोड़ी अधिक दूरी पर रहेगा, जिसके चलते वह सूर्य के मध्य भाग को ढक लेगा लेकिन बाहरी किनारों को पूरी तरह नहीं छिपा पाएगा, जिससे आसमान में सोने की अंगूठी जैसा एक चमकीला छल्ला यानी 'रिंग ऑफ फायर' नजर आएगा।
यह वलयाकार सूर्य ग्रहण मुख्य रूप से दक्षिणी गोलार्ध के देशों में दिखाई देगा। इसका वलयाकार पथ (Path of Annularity) दक्षिण अमेरिका के दक्षिणी चिली और अर्जेंटीना के इलाकों से होकर गुजरेगा। वहीं, इसका आंशिक स्वरूप (Partial Eclipse) दक्षिण अमेरिका के अधिकांश देशों, पश्चिमी अफ्रीका और अंटार्कटिका के कुछ तटीय क्षेत्रों में देखा जा सकेगा।
क्या 2027 का पहला सूर्य ग्रहण भारत में दिखेगा?
भारत के संदर्भ में 6 फरवरी 2027 को लगने वाले इस पहले सूर्य ग्रहण की स्थिति की बात करें, तो यह ग्रहण भारत में दृश्यमान नहीं होगा। जिस समय दक्षिणी गोलार्ध और लैटिन अमेरिका में यह ग्रहण घटित हो रहा होगा, उस वक्त भारतीय उपमहाद्वीप में रात्रि या देर शाम का समय रहेगा और सूर्य क्षितिज के नीचे स्थित होगा।
चूंकि यह ग्रहण भारत में नहीं दिखेगा, इसलिए इसका कोई भी सूतक काल (जो अमूमन सूर्य ग्रहण से 12 घंटे पहले शुरू होता है) भारत में मान्य नहीं होगा। देश के सभी मंदिरों में दैनिक पूजा-पाठ, अनुष्ठान और मांगलिक कार्य सामान्य दिनों की तरह ही निर्बाध रूप से संपन्न होंगे। गर्भवती महिलाओं, बच्चों या बुजुर्गों के लिए भी किसी प्रकार के खान-पान या बाहर निकलने संबंधी पाबंदियों का पालन करने की आवश्यकता नहीं होगी।
2027 का दूसरा सूर्य ग्रहण: 'सदी का सबसे बड़ा पूर्ण ग्रहण' (Eclipse of the Century)
साल 2027 के पहले ग्रहण से भी कहीं अधिक चर्चा और उत्सुकता इसके दूसरे सूर्य ग्रहण को लेकर है, जो 2 अगस्त 2027 को घटित होने वाला है। खगोलविदों ने 2 अगस्त 2027 के इस ग्रहण को 'सदी का सबसे अद्भुत पूर्ण सूर्य ग्रहण' (The Great Eclipse of 2027) का नाम दिया है।
इसकी सबसे बड़ी खगोलीय विशेषता इसकी असाधारण समयावधि होगी। मिस्र (Egypt) के लक्सर और आसपास के रेगिस्तानी इलाकों में पूर्ण अंधकार (Totality) की अवधि 6 मिनट 22 सेकंड से अधिक की दर्ज होगी, जो पिछले कई दशकों में जमीन पर दिखने वाला सबसे लंबा पूर्ण सूर्य ग्रहण होगा। यह ग्रहण दक्षिणी स्पेन, मोरक्को, अल्जीरिया, ट्यूनीशिया, लीबिया, मिस्र और सऊदी अरब से होकर गुजरेगा। सबसे खास बात यह है कि इसका आंशिक प्रभाव मध्य एशिया और भारत के उत्तर-पश्चिमी हिस्सों में भी मामूली रूप से महसूस किया जा सकता है।
ग्रहण के दौरान वैज्ञानिक और ज्योतिषीय दृष्टिकोण: क्या करें और क्या न करें?
वैज्ञानिक दृष्टि से सूर्य ग्रहण एक अत्यंत स्वाभाविक और सुंदर खगोलीय घटना है, जब चंद्रमा सूर्य और पृथ्वी के बीच से गुजरते हुए सूर्य के प्रकाश को कुछ समय के लिए रोक लेता है। वैज्ञानिकों की एकमात्र कड़ी चेतावनी यही रहती है कि किसी भी प्रकार के सूर्य ग्रहण को कभी भी नंगी आंखों, सामान्य चश्मों या मोबाइल कैमरे से सीधे नहीं देखना चाहिए, क्योंकि इससे निकलने वाली तीव्र पराबैंगनी किरणें रेटिना को हमेशा के लिए नुकसान पहुंचा सकती हैं। इसे देखने के लिए हमेशा प्रमाणित सोलर फिल्टर या ग्रहण वाले चश्मों (ISO 12312-2 प्रमाणित) का ही उपयोग करना चाहिए।
वहीं दूसरी ओर, भारतीय वैदिक परंपरा में ग्रहण के समय को आध्यात्मिक शुद्धि और मानसिक एकाग्रता का सर्वोत्तम काल माना गया है। जिन देशों में ग्रहण प्रभावी होता है, वहां लोग ग्रहण काल के दौरान भजन, ध्यान, गायत्री मंत्र का जप और ग्रहण समाप्ति के बाद स्नान व दान-पुण्य की परंपरा का पालन करते हैं। 2027 के पहले ग्रहण (6 फरवरी) के समय भारत के लोगों को किसी भी प्रकार की चिंता या दिनचर्या बदलने की जरूरत नहीं है, क्योंकि इसका भौगोलिक प्रभाव भारतीय सीमाओं से हजारों मील दूर रहेगा।