दशहरे पर शमी के पत्तों को ‘सोना’ मानकर क्यों बांटते हैं लोग? जानिए इस पावन परंपरा के पीछे छिपी महाभारत और कुबेर की रहस्यमयी कथा
विजयादशमी यानी दशहरे का पावन पर्व बुराई पर अच्छाई और अधर्म पर धर्म की जीत का प्रतीक माना जाता है। इस दिन जहां देश भर में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के विशाल पुतलों का दहन कर खुशियां मनाई जाती हैं, वहीं शाम के समय एक बेहद अनूठी और आत्मीय परंपरा निभाई जाती है। लोग सज-धजकर एक-दूसरे के घर जाते हैं, बड़ों के चरण स्पर्श कर उनका आशीर्वाद लेते हैं और आदरपूर्वक उन्हें शमी के पत्ते भेंट करते हैं। इन हरी-भरी पत्तियों को केवल एक सामान्य पत्ता नहीं, बल्कि साक्षात 'सोना' यानी स्वर्ण मानकर सौंपा जाता है और लोग भी इसे अपने माथे से लगाकर बड़े जतन से अपनी तिजोरी, बही-खातों या पूजा स्थल पर रखते हैं। मध्य भारत, महाराष्ट्र, गुजरात और उत्तर भारत के कई अंचलों में इसे 'सोना लूटना' या 'सोना बांटना' भी कहा जाता है। आखिर इस साधारण से दिखने वाले कांटेदार पेड़ की पत्तियों का सोने जैसी कीमती धातु से क्या अटूट संबंध है और क्यों विजयादशमी के दिन इसका आदान-प्रदान सुख-समृद्धि का सबसे बड़ा प्रतीक बन जाता है, इसके पीछे दो बेहद चमत्कारी और ऐतिहासिक पौराणिक कथाएं जुड़ी हुई हैं।
महर्षि वरतंतु, शिष्य कौत्स और धनकुबेर के सोने की वर्षा का पौराणिक रहस्य
शमी के पत्तों को स्वर्ण मानने की सबसे प्रसिद्ध पौराणिक कथा प्राचीन काल के ऋषि वरतंतु और उनके निष्ठावान शिष्य कौत्स से जुड़ी हुई है। कथा के अनुसार, जब कौत्स ने महर्षि वरतंतु के आश्रम में अपनी चौदह विधाओं की शिक्षा पूरी कर ली, तो उन्होंने गुरु से दक्षिणा मांगने का विनीत आग्रह किया। महर्षि वरतंतु अपने शिष्य के ज्ञान और विनम्रता से इतने प्रसन्न थे कि वे कोई दक्षिणा नहीं लेना चाहते थे, लेकिन शिष्य के बार-बार हठ करने पर उन्होंने कौत्स की परीक्षा लेने के लिए चौदह विधाओं के बदले 14 करोड़ स्वर्ण मुद्राओं की भारी गुरुदक्षिणा मांग ली। एक निर्धन ब्राह्मण बालक के लिए इतनी विशाल मात्रा में सोने की मुद्राएं जुटाना असंभव सा था। कौत्स अपनी इस गुरुदक्षिणा को पूरा करने के लिए तत्कालीन पराक्रमी और दानवीर अयोध्या नरेश राजा रघु के दरबार में पहुंचे। राजा रघु ने उस समय 'विश्वजीत' नामक एक विशाल महायज्ञ किया था, जिसमें उन्होंने अपना सारा राजकोष और धन-दौलत ब्राह्मणों और गरीबों में दान कर दी थी। राजा के पास देने के लिए कोई स्वर्ण मुद्रा शेष नहीं थी, लेकिन एक याचक ब्राह्मण को अपने द्वार से खाली हाथ लौटाना रघुवंश की मर्यादा के विरुद्ध था।
शमी के पेड़ पर जब कुबेर ने बरसाई थी 14 करोड़ सोने की अशर्फियां
राजा रघु ने कौत्स को खाली हाथ भेजने के बजाय उनसे तीन दिन का समय मांगा और मन ही मन देवताओं के कोषाध्यक्ष धन के स्वामी कुबेर पर चढ़ाई करने का संकल्प ले लिया। जब धनकुबेर को इस बात की भनक लगी कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के पूर्वज और परम प्रतापी राजा रघु केवल एक शिष्य की गुरुदक्षिणा पूरी करने के लिए उन पर आक्रमण करने आ रहे हैं, तो वे अत्यंत भयभीत हो गए। युद्ध से बचने और राजा रघु के धर्म की रक्षा करने के लिए कुबेर ने दशहरे की रात अयोध्या के बाहर स्थित एक विशाल शमी के वृक्ष पर चौदह करोड़ से भी अधिक स्वर्ण मुद्राओं की मूसलाधार बारिश कर दी। अगली सुबह जब कौत्स और राजा रघु वहां पहुंचे, तो पूरा शमी का वृक्ष और उसके आसपास की धरती सोने की चमकती अशर्फियों से ढकी हुई थी। राजा रघु ने कौत्स से कहा कि वे यह सारा सोना अपने साथ ले जाएं, लेकिन ज्ञानी कौत्स ने केवल वही 14 करोड़ मुद्राएं लीं जो उनके गुरु ने मांगी थीं, एक भी सिक्का अधिक नहीं छुआ। वहीं राजा रघु ने भी अतिरिक्त स्वर्ण को अपने पास रखने से मना कर दिया और अयोध्या की समस्त प्रजा को बुलाकर वह बचा हुआ सोना खुले हाथों से बांट दिया। नगरवासियों ने खुशी-खुशी उस शमी के वृक्ष की पत्तियों को भी सोने के रूप में तोड़कर एक-दूसरे को भेंट किया। यही कारण है कि उस ऐतिहासिक दिन की स्मृति में हर साल विजयादशमी पर शमी के पत्तों को सोने का प्रतीक मानकर एक-दूसरे को बांटा जाता है।
महाभारत काल: जब पांडवों ने शमी के गर्भ में छुपाए थे अपने दिव्य अस्त्र-शस्त्र
शमी के वृक्ष का दूसरा सबसे बड़ा और गौरवशाली संबंध महाभारत काल के पांडवों से जुड़ा हुआ है। जब जुए में अपना सब कुछ हार जाने के बाद पांडवों को बारह वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास मिला, तो उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि अज्ञातवास के दौरान वे अपने अस्त्र-शस्त्र कहां छिपाएं। उस समय गांडीव धारी अर्जुन और महाबली भीम के हथियार ऐसे थे जिन्हें देखते ही कोई भी पहचान सकता था, और यदि अज्ञातवास के दौरान उनकी पहचान उजागर हो जाती तो उन्हें दोबारा बारह साल का वनवास काटना पड़ता। तब अर्जुन ने विराट नगर के पास एक श्मशान के निकट खड़े घने और विशाल शमी के वृक्ष को अपने दिव्य गांडीव धनुष और बाकी सभी पांडवों के अस्त्रों को छुपाने के लिए चुना। पांडवों ने शमी के वृक्ष की विधिवत पूजा की और उनसे प्रार्थना की कि वे उनके हथियारों की रक्षा करें। शमी के पेड़ ने अपने कंटीले और घने पत्तों के आवरण में पूरे एक साल तक उन दिव्य अस्त्रों की सुरक्षा की। जब अज्ञातवास का समय पूरा हुआ, तो विजयादशमी के ही दिन अर्जुन ने उस शमी के वृक्ष से अपने अस्त्र वापस निकाले, वृक्ष की परिक्रमा कर विजय का आशीर्वाद मांगा और कौरव सेना को विराट युद्ध में पराजित कर धर्म की रक्षा की। इसी विजय के कारण दशहरे के दिन शमी पूजन और शस्त्र पूजन की अटूट परंपरा सनातन धर्म में स्थापित हो गई।
भगवान श्रीराम का रावण वध से पहले शमी पूजन और विजय का वरदान
शमी वृक्ष का धार्मिक महत्व रामायण काल से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। महर्षि वाल्मीकि और तुलसीदास रचित प्रसंगों के अनुसार, लंकापति रावण का वध करने के लिए लंका पर अंतिम चढ़ाई करने से पूर्व प्रभु श्रीराम ने भी शमी के वृक्ष की पूजा-अर्चना की थी। देवताओं के संकेत पर श्रीराम ने शमी वृक्ष के समक्ष शीश नवाकर विजय का संकल्प लिया था और इसके बाद ही उन्होंने रावण की विशाल आसुरी सेना पर विजय प्राप्त की थी। यही वजह है कि राजा-महाराजाओं के दौर में भी क्षत्रिय योद्धा दशहरे के दिन अपने राज्य की सीमा लांघकर 'सीमोल्लंघन' करते थे और शमी वृक्ष के पास पहुंचकर अपनी विजय पताका फहराते थे। माना जाता है कि शमी का दर्शन और इसकी पूजा मनुष्य को हर तरह के भय, शत्रु बाधा और जीवन के संघर्षों से मुक्ति दिलाकर विजय का मार्ग प्रशस्त करती है।
शनिदेव की कृपा और वैज्ञानिक दृष्टिकोण: शमी घर में लगाने के चमत्कारिक फायदे
ज्योतिष शास्त्र में शमी के वृक्ष को अत्यंत शुभ और मंगलकारी माना गया है क्योंकि इसका सीधा संबंध कर्मफलदाता शनिदेव से है। ऐसा माना जाता है कि शमी के वृक्ष में शनिदेव का वास होता है, और जो व्यक्ति नियमित रूप से शनिवार या विजयादशमी के दिन शमी के पौधे के नीचे तिल या सरसों के तेल का दीपक जलाता है, उसकी कुंडली से शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या और राहु-केतु के अशुभ प्रभाव हमेशा के लिए शांत हो जाते हैं। इसके साथ ही वैज्ञानिक दृष्टि से भी शमी (Prosopis cineraria) जिसे राजस्थान और थार मरुस्थल में 'खेजड़ी' कहा जाता है, एक अत्यंत जीवनदायी वृक्ष है। यह भीषण गर्मी और कम पानी में भी हरा-भरा रहता है, हवा को शुद्ध करने में भारी मात्रा में ऑक्सीजन उत्सर्जित करता है और इसके तने, छाल और पत्तों में एंटी-बैक्टीरियल गुण पाए जाते हैं जो कई तरह के चर्म रोगों और पेट की बीमारियों को दूर करने की आयुर्वेदिक क्षमता रखते हैं। दशहरे के दिन जब लोग शमी की पत्तियां बांटते हैं, तो इसके पीछे का मूल संदेश केवल भौतिक सोना देना नहीं, बल्कि यह मंगलकामना होती है कि आपके जीवन में सोने जैसी चमक, सकारात्मक ऊर्जा और पांडवों जैसी विजय हमेशा बनी रहे।