करवा चौथ की पूजा में 7 बार ही क्यों फेरा जाता है करवा? जानिए 7 फेरों और 7 वचनों से जुड़ा यह गहरा रहस्य
सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति में कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाने वाला करवा चौथ का पावन पर्व प्रत्येक सुहागिन महिला के जीवन में असीम श्रद्धा और भावनात्मक महत्व रखता है। अपने पति की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य, संकटों से रक्षा और अखंड सौभाग्य की मंगल कामना के साथ सुहागिनें सूर्योदय से पूर्व सरगी ग्रहण कर पूरे दिन अन्न-जल का त्याग करते हुए निर्जला उपवास रखती हैं। शाम के समय शुभ मुहूर्त में सोलह श्रृंगार कर भगवान शिव, माता पार्वती, भगवान श्री गणेश और कार्तिकेय जी का विधि-विधान से पूजन किया जाता है। इस पूरे अनुष्ठान के केंद्र में मिट्टी या धातु का वह पावन करवा होता है जिसमें पवित्र जल, दूध और रक्षा सूत्र बांधकर सींकें लगाई जाती हैं। करवा चौथ की इस संध्याकालीन पूजा में सबसे विशिष्ट और अनिवार्य विधान 'करवा फेरने' या 'करवा बदलने' का होता है।
धार्मिक मान्यताओं और लोक परंपराओं के अनुसार करवा फेरने की यह रस्म केवल एक सामान्य रीति-रिवाज नहीं है, बल्कि इसके बिना करवा चौथ की पूजा को शास्त्रीय दृष्टि से पूर्ण फलदायी नहीं माना जाता है। जब समूह में महिलाएं एकत्र होकर पूजा की थाली और करवे को हाथों में लेकर एक-दूसरे को सौंपती हैं, तो यह दृश्य आपसी सौहार्द, पारिवारिक एकता और सुहाग के प्रति अटूट निष्ठा को प्रदर्शित करता है। कई क्षेत्रों में करवे के साथ-साथ पूजा की थाली को भी घुमाने का प्रचलन है, लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में जो बात सबसे ज्यादा ध्यान खींचती है, वह है करवे को ठीक 7 बार ही फेरने का कड़ा नियम। आखिर सनातन परंपरा में सात की संख्या का ऐसा क्या आध्यात्मिक और लौकिक रहस्य है जिसे करवा चौथ की पूजा में इतनी सख्ती और आस्था के साथ निभाया जाता है।
शादी के सात फेरे, सात वचन और सात जन्मों के अटूट बंधन का साक्षात प्रतीक है यह परंपरा
सनातन हिंदू धर्म में 'सात' (7) के अंक को अत्यंत दिव्य, पूर्ण, शुभ और आध्यात्मिक रूप से संपूर्ण माना गया है। वैवाहिक जीवन की नींव ही सात की संख्या पर टिकी होती है, जहां अग्नि को साक्षी मानकर वर और वधू सात फेरे लेते हैं और जीवनपर्यंत एक-दूसरे का साथ निभाने के लिए सात पवित्र वचन स्वीकार करते हैं। सात फेरों के माध्यम से दो आत्माएं सात जन्मों के पवित्र वैवाहिक बंधन में बंधती हैं। करवा चौथ की पूजा के दौरान करवे को ठीक सात बार घुमाना वास्तव में उसी पावन विवाह संस्कार के सात वचनों और सात फेरों का पुनः स्मरण और नवीनीकरण है।
हर बार जब करवा एक हाथ से दूसरे हाथ में जाता है, तो वह सुहागिन महिला के मन में अपने दांपत्य धर्म, त्याग, समर्पण और पति की दीर्घायु के संकल्प को और अधिक दृढ़ करता है। ऋषियों और आचार्यों के अनुसार सात की संख्या ब्रह्मांडीय संतुलन का भी द्योतक है—जैसे सप्तर्षि, सात सुर, सात समुद्र और सात लोक। इसलिए जब महिलाएं सात बार करवा फेरती हैं, तो वे संपूर्ण ब्रह्मांड की सकारात्मक और शुभ ऊर्जाओं को अपने वैवाहिक जीवन में सुख, शांति और सौभाग्य के रूप में आमंत्रित करती हैं। यह रस्म पति-पत्नी के रिश्ते में आने वाली किसी भी नकारात्मक ऊर्जा या संकट को दूर कर रिश्ते को सात जन्मों तक अटूट बनाए रखने का आध्यात्मिक सुरक्षा कवच मानी जाती है।
'ले सुहागन ले करवा, दे सुहागन दे करवा': जानिए इस रस्म को निभाने की सही वैदिक विधि
करवा फेरने की पारंपरिक विधि बेहद रोचक, आध्यात्मिक और मंगलकारी भावनाओं से भरी होती है। पूजा की चौकी के सामने जब सभी व्रती महिलाएं गोलाकार घेरे में बैठती हैं, तो वे अपने-अपने करवे को अपनी दाईं ओर बैठी दूसरी सुहागिन महिला की ओर बढ़ाती हैं। इस दौरान करवा बदलते हुए सुहागिनें मधुर और श्रद्धा भरे स्वर में पारंपरिक लोक मंत्र का उच्चारण करती हैं—'ले सुहागन ले करवा, दे सुहागन दे करवा, सदा सुहागन रहे तू, अखंड रहे तेरा सुहाग।' यह पंक्ति केवल एक संवाद नहीं है, बल्कि एक-दूसरे के सुहाग की रक्षा और अखंड सौभाग्य के लिए की जाने वाली सामूहिक मंगल प्रार्थना है।
यह क्रम लगातार सात बार दोहराया जाता है, जिससे हर महिला का करवा चक्राकार रूप में सात बार घूमकर अंततः अपने मूल स्थान पर आ जाता है। करवा फेरने की इस पावन प्रक्रिया के समय ही घर की बुजुर्ग महिला या कथा वाचक द्वारा करवा चौथ व्रत की पौराणिक कथा का श्रवण कराया जाता है। कथा पूरी होने और सात बार करवा फेरने के बाद करवे को सम्मानपूर्वक पूजा स्थल पर स्थापित कर दिया जाता है। इसके पश्चात महिलाएं रात में आकाश में चंद्र देव के उदय होने की प्रतीक्षा करती हैं, ताकि छलनी से पति और चंद्रमा का दर्शन कर उन्हें करवे के पावन जल से अर्घ्य समर्पित किया जा सके।
यदि अकेले कर रही हैं पूजा तो कैसे करें करवा फेरने का विधान? शास्त्रों में है सरल उपाय
आज के आधुनिक दौर में कई महिलाएं महानगरों या विदेश में एकल परिवारों में रहती हैं, जहां आसपास अन्य सुहागिन महिलाओं का समूह उपलब्ध नहीं हो पाता। ऐसे में कई महिलाओं के मन में यह संशय उत्पन्न होता है कि वे अकेले पूजा करते समय सात बार करवा फेरने की रस्म को कैसे विधिपूर्वक निभाएं। ज्योतिष और कर्मकांड के विद्वानों के अनुसार इस परिस्थिति में भी पूजा की पूर्णता के लिए शास्त्रों में बेहद सरल और फलदायी विकल्प बताए गए हैं।
यदि कोई महिला अकेले व्रत और पूजन कर रही है, तो वह पूजा की चौकी पर दो करवे स्थापित करे—एक करवा स्वयं के लिए और दूसरा करवा माता पार्वती और भगवान श्री गणेश के निमित्त। पूजा के समय महिला माता गौरी और गणपति जी को साक्षी मानकर अपने दोनों करवों को आपस में सात बार स्थान परिवर्तित करते हुए बदल सकती है। इस दौरान मन में माता पार्वती से अपने अखंड सौभाग्य और पति की लंबी उम्र की प्रार्थना करनी चाहिए और करवा चौथ व्रत कथा का सस्वर पाठ करना चाहिए। ईश्वर के सम्मुख भाव का महत्व सबसे ऊपर होता है, इसलिए शुद्ध अंतःकरण और पूर्ण श्रद्धा से अकेले किया गया यह विधान भी सामूहिक पूजन के समान ही संपूर्ण और मनोवांछित फल प्रदान करने वाला होता है।