जब पार्टी तोड़ने वाले ही बन बैठे असली हकदार: अखिलेश यादव को भी ऐसे ही मिली थी सपा; पिता मुलायम से छिनी थी 'साइकिल'

जब पार्टी तोड़ने वाले ही बन बैठे असली हकदार: अखिलेश यादव को भी ऐसे ही मिली थी सपा; पिता मुलायम से छिनी थी 'साइकिल'

भारतीय लोकतंत्र और राजनीति के इतिहास में ऐसे कई अध्याय दर्ज हैं जहां खून के रिश्तों और वैचारिक निष्ठाओं पर सत्ता की लालसा भारी पड़ी है। जब भी किसी राजनीतिक दल के भीतर आंतरिक कलह या बगावत की चिंगारी सुलगती है, तो सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि पार्टी के नाम और उसके चुनाव चिह्न का असली हकदार कौन है—पार्टी को अपने खून-पसीने से सींचकर खड़ा करने वाला संस्थापक या फिर संगठन के विधायकों व सांसदों के संख्याबल का दम दिखाने वाला बागी गुट? हाल के वर्षों में शिवसेना में एकनाथ शिंदे बनाम उद्धव ठाकरे और एनसीपी में अजित पवार बनाम शरद पवार के टकराव में चुनाव आयोग ने बहुमत के आधार पर पार्टी और सिंबल बागी गुटों को सौंपकर इस परिपाटी को मजबूत किया। लेकिन इस सियासी खेल की सबसे चर्चित और ऐतिहासिक पटकथा उत्तर प्रदेश में लिखी गई थी, जब अखिलेश यादव ने अपने ही पिता और समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव से पूरी पार्टी और उसका प्रतिष्ठित 'साइकिल' चुनाव चिह्न छीन लिया था।

2016-17 का यादव परिवार का दंगल और तख्तापलट की शुरुआत

साल 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से ठीक पहले समाजवादी पार्टी और यादव परिवार के भीतर सत्ता के वर्चस्व की जंग अपने चरम पर पहुंच गई थी। एक तरफ पार्टी के संस्थापक व राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव और उनके भाई शिवपाल सिंह यादव थे, तो दूसरी तरफ तत्कालीन युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और उनके रणनीतिकार चाचा प्रो. रामगोपाल यादव खड़े थे। टिकट बंटवारे और संगठन में नियंत्रण को लेकर शुरू हुआ यह पारिवारिक टकराव तब खुली बगावत में तब्दील हो गया जब 1 जनवरी 2017 को लखनऊ के जनेश्वर मिश्र पार्क में अखिलेश गुट ने पार्टी का राष्ट्रीय अधिवेशन बुला लिया। इस अधिवेशन में मुलायम सिंह यादव को हटाकर अखिलेश यादव को सर्वसम्मति से समाजवादी पार्टी का नया राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित कर दिया गया। पार्टी के संस्थापक रहे 'नेताजी' को महज एक मार्गदर्शक की भूमिका में सीमित कर दिया गया, जिससे देश की सियासत सन्न रह गई थी।

जब चुनाव आयोग की चौखट पर पहुंचा 'साइकिल' की मिल्कियत का विवाद

अखिलेश यादव के इस सियासी तख्तापलट के बाद पार्टी दो फाड़ हो चुकी थी। मुलायम सिंह यादव ने इस अधिवेशन को असंवैधानिक करार दिया और मामला सीधे भारत निर्वाचन आयोग (ECI) की अदालत में पहुंच गया। दोनों पक्षों ने पार्टी के नाम और उसके अमर चुनाव चिह्न 'साइकिल' पर अपना-अपना दावा ठोक दिया। मुलायम सिंह यादव का तर्क था कि उन्होंने 1992 में इस पार्टी की स्थापना की थी और साइकिल का निशान उनकी पहचान है। वहीं, अखिलेश यादव के खेमे ने चुनाव आयोग के समक्ष पार्टी के 229 में से 205 विधायकों, 68 विधान पार्षदों में से 56 एमएलसी और अधिकांश सांसदों व राष्ट्रीय प्रतिनिधियों के हस्ताक्षरित हलफनामे पेश कर दिए। यह संख्याबल यह साबित करने के लिए पर्याप्त था कि पार्टी का वास्तविक नियंत्रण अब पिता के बजाय बेटे के हाथों में है।

'सादिक अली केस' बना नजीर, आयोग ने अखिलेश को सौंपा पार्टी का ताज

चुनाव आयोग ने 16 जनवरी 2017 को 42 पन्नों का ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए 1971 के प्रसिद्ध 'सादिक अली बनाम चुनाव आयोग' मामले की नजीर दी। आयोग ने स्पष्ट किया कि जब किसी दल में विभाजन होता है, तो पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न उस गुट को दिया जाता है जिसके पास विधायी और संगठनात्मक स्तर पर स्पष्ट बहुमत होता है। इस कसौटी पर अखिलेश यादव का पलड़ा पूरी तरह भारी था। चुनाव आयोग ने आधिकारिक तौर पर घोषणा की कि अखिलेश यादव के नेतृत्व वाला गुट ही असली 'समाजवादी पार्टी' है और पार्टी का 'साइकिल' चुनाव निशान भी अखिलेश गुट को ही आवंटित किया जाता है। यह भारतीय राजनीति का एक ऐसा दुर्लभ और अभूतपूर्व क्षण था जहां पार्टी तोड़ने वाले बागी को ही पूरी पार्टी का वैधानिक मालिक मान लिया गया और पार्टी के जनक को खाली हाथ रहना पड़ा।

महाराष्ट्र में दोहराया गया यूपी का इतिहास: शिंदे और अजित बने नए उदाहरण

अखिलेश यादव का यह मामला आने वाले वर्षों में भारतीय राजनीति के लिए एक ऐसा मिसाल बन गया जिसका असर हाल ही में महाराष्ट्र की राजनीति में भी देखने को मिला।

  • एकनाथ शिंदे बनाम उद्धव ठाकरे: जून 2022 में एकनाथ शिंदे ने शिवसेना के अधिकांश विधायकों के साथ बगावत की। चुनाव आयोग ने संख्याबल के उसी सिद्धांत को दोहराते हुए बालासाहेब ठाकरे द्वारा स्थापित शिवसेना का नाम और 'धनुष-बाण' चुनाव चिह्न उद्धव ठाकरे से छीनकर एकनाथ शिंदे को सौंप दिया।

  • अजित पवार बनाम शरद पवार: ठीक इसी तर्ज पर जुलाई 2023 में अजित पवार ने अपने चाचा शरद पवार के खिलाफ बगावत कर दी। शरद पवार ने 1999 में एनसीपी का गठन किया था, लेकिन चुनाव आयोग ने विधायकों के भारी समर्थन के दम पर अजित पवार गुट को असली एनसीपी माना और 'घड़ी' चुनाव चिह्न उन्हें दे दिया।

इन सभी सियासी उलटफेरों ने यह साफ कर दिया कि संसदीय लोकतंत्र में भावनाओं, अतीत के त्याग और रिश्ते-नातों से कहीं ज्यादा अहमियत विधानसभा और संसद के भीतर मौजूद सिरों की गिनती (संख्याबल) की होती है।

Latest Posts